चयनात्मक आहत भावनाएं और राम मंदिर चढ़ावे का अनुत्तरित यक्ष प्रश्न

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


चयनात्मक आहत भावनाएं और राम मंदिर चढ़ावे का अनुत्तरित यक्ष प्रश्न

भारतीय जनमानस में अयोध्या का राम मंदिर आंदोलन केवल एक संरचना के निर्माण की कवायद नहीं था, बल्कि उसे करोड़ों हिंदुओं की सामूहिक चेतना, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और अटूट आस्था के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में स्थापित किया गया। दशकों तक देश की राजनीति की धुरी इसी आंदोलन के इर्द-गिर्द घूमती रही। चुनावों के एजेंडे तय हुए, टीवी स्टूडियोज में धर्म और संस्कृति के नाम पर बयानों के तीर चले, और नेताओं की 'धार्मिक भावनाएं' आए दिन आहत होती रहीं। लेकिन आज जब उसी आस्था के केंद्र—राम मंदिर—के दानपात्र से करोड़ों रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता और गबन का संगीन मामला सामने आया है, तो सार्वजनिक विमर्श के गलियारों में पसरी रहस्यमयी खामोशी कई गंभीर सवाल खड़े करती है।

# सनातन का अपमान: परिभाषाओं का दोहरा पैमाना


लोकतांत्रिक विमर्श में यह विरोधाभास अत्यंत चौंकाने वाला है। देश ने देखा है कि कैसे किसी फिल्म के दृश्य, किसी सोशल मीडिया पोस्ट, किसी पुस्तक की पंक्ति या किसी मंचीय टिप्पणी पर 'सनातन खतरे में है' या 'हिंदू आस्था पर आघात' के नारे गूंजने लगते हैं। जनभावनाओं को इस कदर आंदोलित कर दिया जाता है कि प्राइम-टाइम बहसों का तापमान सातवें आसमान पर पहुंच जाता है।


परंतु, विचारणीय प्रश्न यह है कि "यदि किसी बाहरी व्यक्ति की सतही टिप्पणी से आस्था घायल हो सकती है, तो प्रभु राम के चरणों में समर्पित श्रद्धालुओं के पवित्र धन में कथित सेंधमारी से वह आस्था लहूलुहान क्यों नहीं होती?"

क्या राम मंदिर के चढ़ावे में हेराफेरी सनातन परंपरा का अपमान नहीं है? इस मुद्दे पर उन मुखर आवाजों और टीवी चैनलों की बेचैनी का नदारद होना, जो आमतौर पर धर्म के रक्षक बनकर उभरते हैं, यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या धर्म को लेकर दिखाई जाने वाली संवेदनशीलता पूरी तरह चयनात्मक (Selective) हो चुकी है?


# प्रशासनिक सक्रियता बनाम राजनीतिक मौन

अयोध्या के इस मामले में कानूनी और प्रशासनिक मशीनरी हरकत में है। कई कर्मचारियों की गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, जांच एजेंसियां बही-खातों को खंगाल रही हैं, और ट्रस्ट की आंतरिक निगरानी व्यवस्था पर उंगलियां उठ रही हैं। लेकिन इस पूरी विधिक प्रक्रिया के समानांतर जो राजनीतिक मौन पसरा है, वह अचंभित करने वाला है।


राजनीतिक विश्लेषकों का यह तर्क निराधार नहीं लगता कि जब धर्म से राजनीतिक लाभ की संभावना प्रचुर होती है, तो उसे विमर्श के केंद्र में लाकर राष्ट्रवाद का पर्याय बना दिया जाता है। लेकिन जब बात उसी धार्मिक प्रतीक के प्रबंधन में पारदर्शिता, शुचिता और जवाबदेही की आती है, तो अचानक उसे राजनीति से पृथक कर 'महज एक आपराधिक जांच' का प्रशासनिक चोगा पहना दिया जाता है। यह रुख उस जनविश्वास के साथ छल है, जिसने अपना पेट काटकर मंदिर निर्माण में अपनी गाढ़ी कमाई का अंशदान दिया था।


# विपक्ष की कसौटी और मीडिया का चरित्र


इस मौन को समझने के लिए एक काल्पनिक लेकिन प्रासंगिक आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है। यदि किसी विपक्षी दल शासित राज्य के बड़े या ऐतिहासिक धार्मिक संस्थान में ठीक इसी प्रकार का करोड़ों का कथित घोटाला सामने आया होता, तो मीडिया और सत्ता प्रतिष्ठान की प्रतिक्रिया क्या होती?


* क्या तब भी यह केवल 'थाने का मामला' होता? निश्चित रूप से नहीं। तब इसे 'तुष्टिकरण की राजनीति', 'धार्मिक भ्रष्टाचार' और 'बहुसंख्यक समाज की आस्था पर सुनियोजित हमला' करार देकर एक राष्ट्रीय आपातकाल जैसी बहस का रूप दे दिया गया होता।

* आज का परिदृश्य: चूंकि यह मामला उस व्यवस्था के तहत आ रहा है जिसे राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है, इसलिए सुर बहुत धीमे और नपे-तुले हैं। यह चयनात्मक उग्रता मीडिया के निष्पक्ष चरित्र और राजनीति की शुचिता दोनों को कटघरे में खड़ा करती है।


# केवल धन का नहीं, विश्वास का अवमूल्यन


राम मंदिर का यह चढ़ावा कांड सिर्फ वित्तीय हेरफेर या कुछ कर्मचारियों की लालसा का मामला नहीं है। यह उस व्यवस्था की नैतिक परीक्षा है जो खुद को संस्कृति और धर्म का ध्वजवाहक कहती है।


आस्था की रक्षा का दावा करने वालों को यह समझना होगा कि किसी व्यवस्था की शुचिता का असली इम्तिहान तब नहीं होता जब वह अपने विरोधियों पर उंगली उठाती है, बल्कि तब होता है जब वह अपनी ही कमियों को उतनी ही कठोरता से उजागर करे। करोड़ों श्रद्धालुओं ने राम के नाम पर जो समर्पण किया था, वह पारदर्शिता की उम्मीद रखता था, रहस्यमयी चुप्पी की नहीं। यदि इस बार भी जवाबदेही तय नहीं हुई और इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, तो यह केवल पैसों की चोरी नहीं, बल्कि भारत के आम नागरिक की उस अगाध आस्था की चोरी होगी, जिसके नाम पर इस देश में सत्ता की इमारतें खड़ी की गई हैं।