अर्थव्यवस्था के असहज प्रश्न और लोकतंत्र की परीक्षा

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला


अर्थव्यवस्था के असहज प्रश्न और लोकतंत्र की परीक्षा

"क्या सवाल पूछना देशद्रोह है, या राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी?" 

किसी भी राष्ट्र का आर्थिक स्वास्थ्य केवल उसके सकल घरेलू उत्पाद (GDP), शेयर बाजार के सूचकांकों या सरकारी विज्ञापनों से नहीं मापा जाता। किसी अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति उसके भीतर और बाहर के निवेशकों के विश्वास, उसकी मुद्रा की स्थिरता, उसके संस्थानों की विश्वसनीयता और उसके नीति-निर्माताओं की पारदर्शिता से निर्धारित होती है।

भारत आज विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। विशाल जनसंख्या, बढ़ता उपभोक्ता बाजार, तकनीकी क्षमता, डिजिटल अवसंरचना और वैश्विक मंच पर बढ़ती उपस्थिति—ये सभी ऐसे तत्व हैं जो भारत को अवसरों का देश बनाते हैं। लेकिन अवसरों के साथ-साथ कुछ ऐसे प्रश्न भी सामने आ रहे हैं जिन्हें न तो राजनीतिक शोर में दबाया जा सकता है और न ही राष्ट्रवाद की भावनात्मक बहसों में विलीन किया जा सकता है।


ये प्रश्न केवल अर्थशास्त्र के नहीं हैं; ये लोकतंत्र, निवेश, शासन और भविष्य की दिशा से जुड़े प्रश्न हैं।


## सबसे पहला प्रश्न है—विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से बाहर क्यों जा रहे हैं?


विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) सामान्यतः उन बाजारों में निवेश करते हैं जहाँ उन्हें दीर्घकालिक वृद्धि, नीति-स्थिरता और लाभ की संभावना दिखाई देती है। यदि लगातार पूंजी बाहर जा रही है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि देश संकट में है, लेकिन यह अवश्य संकेत देता है कि वैश्विक निवेशक कुछ जोखिमों को लेकर आशंकित हैं।


यह आशंका कई कारणों से हो सकती है—वैश्विक ब्याज दरें, भू-राजनीतिक तनाव, मुद्रा जोखिम, मूल्यांकन का अत्यधिक महँगा होना या घरेलू आर्थिक चुनौतियाँ। किंतु जब निकासी एक अस्थायी घटना न लगकर प्रवृत्ति बनने लगे, तब यह केवल बाजार की तकनीकी घटना नहीं रह जाती; यह विश्वास का प्रश्न बन जाती है।


## दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न नेट प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Net FDI) का है।


FDI केवल शेयर बाजार में आने वाला पैसा नहीं होता। यह कारखानों, उत्पादन इकाइयों, अनुसंधान केंद्रों, लॉजिस्टिक नेटवर्क और रोजगार सृजन से जुड़ा निवेश होता है। कोई निवेशक वर्षों के लिए अपना पूंजीगत निवेश तभी करता है जब उसे किसी देश की नीतियों, न्यायिक व्यवस्था, कर ढाँचे, प्रशासनिक दक्षता और आर्थिक स्थिरता पर भरोसा हो।


यदि सकल निवेश आ रहा हो लेकिन शुद्ध निवेश लगातार कमजोर हो रहा हो, तो यह संकेत देता है कि जितनी पूंजी आ रही है, उतनी या उससे अधिक किसी रूप में बाहर भी जा रही है। यह स्थिति नीति-निर्माताओं के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय होनी चाहिए।


## तीसरा प्रश्न भारतीय रुपये पर बढ़ते दबाव का है।


मुद्रा केवल विनिमय का माध्यम नहीं होती; वह किसी राष्ट्र की आर्थिक विश्वसनीयता का प्रतीक भी होती है। रुपये की सीमित और क्रमिक कमजोरी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में सामान्य मानी जा सकती है, लेकिन यदि गिरावट तेज हो या लगातार दबाव बना रहे, तो उसके प्रभाव दूरगामी होते हैं।


आयात महंगे होते हैं। ऊर्जा लागत बढ़ती है। विदेशी ऋण का बोझ बढ़ता है। महंगाई पर दबाव बनता है। और सबसे महत्वपूर्ण—निवेशक मुद्रा जोखिम को अपने निर्णयों में शामिल करने लगते हैं।


## चौथा और सबसे संवेदनशील प्रश्न निवेशकों के विश्वास का है।


अर्थव्यवस्था अंततः विश्वास पर चलती है। निवेशक केवल आंकड़ों में निवेश नहीं करते; वे भविष्य की संभावनाओं में निवेश करते हैं। यदि उन्हें यह महसूस हो कि नीति-निर्माण पूर्वानुमेय नहीं है, संस्थागत स्वतंत्रता कमजोर हो रही है, या आलोचना को महत्व नहीं दिया जा रहा, तो निवेश का वातावरण प्रभावित होता है।


* निवेशक कर दरों से पहले नीति की स्थिरता देखते हैं।

* वे प्रोत्साहनों से पहले संस्थागत विश्वसनीयता देखते हैं।

* वे घोषणाओं से पहले शासन की गुणवत्ता देखते हैं।


यहीं से सबसे बड़ा प्रश्न जन्म लेता है— "क्या नीति-निर्माता इन संकेतों को पर्याप्त गंभीरता से ले रहे हैं?" यह प्रश्न किसी सरकार विशेष पर हमला नहीं है। यह हर लोकतांत्रिक व्यवस्था से पूछा जाने वाला वैध प्रश्न है।


* लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह नहीं कि सरकारें निर्णय लेती हैं।

* लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि निर्णयों की समीक्षा भी होती है।


यदि कोई अर्थशास्त्री चिंता व्यक्त करे, कोई निवेशक जोखिमों की ओर संकेत करे, कोई शोध संस्था चेतावनी दे या कोई पत्रकार कठिन प्रश्न पूछे, तो उसका उत्तर तथ्यों से दिया जाना चाहिए, न कि उसकी नीयत पर प्रश्नचिह्न लगाकर।


* आर्थिक बहस में असहमति शत्रुता नहीं होती।

* आलोचना राष्ट्र-विरोध नहीं होती।

* प्रश्न पूछना अविश्वास नहीं होता।


वास्तव में, स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान ही यह है कि वह असुविधाजनक प्रश्नों को भी सुनने का साहस रखता है।


इतिहास बताता है कि आर्थिक संकट अचानक नहीं आते। वे संकेत देकर आते हैं। पहले निवेश धीमा पड़ता है, फिर मुद्रा पर दबाव बढ़ता है, फिर विश्वास कमजोर होता है और अंततः समस्या व्यापक रूप धारण कर लेती है। बुद्धिमान राष्ट्र वे होते हैं जो संकेतों को संकट बनने से पहले पहचान लेते हैं।


भारत के सामने आज भी अपार संभावनाएँ हैं। विशाल युवा आबादी, डिजिटल क्रांति, विनिर्माण विस्तार, सेवा क्षेत्र की ताकत और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में बढ़ती भूमिका भारत को विशिष्ट अवसर प्रदान करती है। लेकिन अवसरों को उपलब्धि में बदलने के लिए केवल घोषणाएँ पर्याप्त नहीं होतीं। इसके लिए नीति की विश्वसनीयता, संस्थागत मजबूती और आलोचना को सुनने की लोकतांत्रिक परिपक्वता आवश्यक होती है।


इसलिए विदेशी निवेश, FDI, रुपये की स्थिति और निवेशकों के विश्वास से जुड़े प्रश्नों को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय राष्ट्रीय हित के दृष्टिकोण से देखना चाहिए। क्योंकि किसी भी राष्ट्र की आर्थिक मजबूती का सबसे बड़ा प्रमाण यह नहीं होता कि उसके बारे में कितनी प्रशंसा लिखी जा रही है।


सबसे बड़ा प्रमाण यह होता है कि वह अपनी कमियों पर कितनी ईमानदारी से चर्चा कर पा रहा है। और किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में ऐसे प्रश्न पूछना देशद्रोह नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का सर्वोच्च रूप माना जाना चाहिए।