‘ठीहा’ बदलने का दंश और सिंदूर की सीमा-रेखा : "ब्याह के मंडप में विसर्जित होता बहनों का आत्मीय संसार"
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
‘ठीहा’ बदलने का दंश और सिंदूर की सीमा-रेखा : "ब्याह के मंडप में विसर्जित होता बहनों का आत्मीय संसार"
भारतीय समाज में विवाह को प्रायः एक मंगलमय आरम्भ, एक नवजीवन, दो परिवारों के मिलन और मर्यादा-सम्पन्न उत्सव के रूप में देखा जाता है। निस्संदेह विवाह जीवन का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण संस्कार है। परन्तु इस आलोकपूर्ण दृश्य के भीतर एक ऐसी मौन पीड़ा भी छिपी होती है, जिसे समाज अक्सर देखना नहीं चाहता। यह पीड़ा केवल किसी एक लड़की के ब्याह की नहीं होती, बल्कि उसके बचपन, उसकी स्मृतियों, उसकी सहेलीनुमा बहनों और उस आत्मीय संसार की भी होती है जो विवाह के साथ धीरे-धीरे हाशिए पर चला जाता है।
चचेरी, ममेरी, मौसेरी और फुफेरी बहनें—ये केवल रिश्तों के शब्द नहीं हैं। ये एक लड़की के बचपन की जीवित धड़कनें हैं। वे साथ हँसती हैं, साथ झगड़ती हैं, साथ संवरती हैं, साथ रोती हैं, और जीवन के पहले अनुभवों को एक-दूसरे की हथेलियों पर रखकर देखती हैं। उनके बीच कोई औपचारिकता नहीं होती; वहाँ सहजता होती है, अपनापन होता है, और वह अदृश्य लेकिन मजबूत रिश्ता होता है जो रक्त से भी आगे जाकर स्मृति और स्नेह की भाषा में रचा जाता है।
इसीलिए जब किसी लड़की का विवाह होता है, तब वह केवल अपने मायके से ससुराल नहीं जाती; वह अपने उस दुनिया-भर के आत्मीय सहचर्यों से भी एक लंबी दूरी पर चली जाती है। और यही दूरी आगे चलकर एक सामाजिक स्वीकृति का रूप ले लेती है—मानो विवाह के बाद इन बहनों से मिलना अब जीवन की अनिवार्यताओं में नहीं, अतिरिक्तताओं में गिना जाने लगा हो।
## बचपन की साझी भूमि
इन रिश्तों का संसार बहुत रंगीन होता है। सावन में साथ मेहँदी रचाना, कंघी छीनकर एक-दूसरे की चोटियाँ गूंथना, तीज-त्योहार पर एक-दूसरे के कपड़े और सैंडल पहनना, चाट के ठेले पर रुक जाना, बाज़ार में मैचिंग चुन्नियों के लिए देर तक भटकना, उमस भरी दोपहरों में दुनिया-जहाँ की बातें करना—यह सब किसी साधारण पारिवारिक गतिविधि का नाम नहीं। यह एक लड़की के भावनात्मक निर्माण की प्रक्रिया है।
वही बहनें उसके बचपन की राजदार होती हैं। वे जानती हैं कि किस बात पर वह हँसेगी, किस बात पर रुठेगी, और किस क्षण उसकी आँखें भीग जाएँगी। कभी वे एक-दूसरे की नकल उतारती हैं, कभी चेहरे बनाती हैं, कभी रात भर खुसर-पुसर करती हैं। बचपन उनके साथ इतना पूरा लगता है कि मानो वही बचपन असल बचपन हो।
इस संबंध में कोई बड़ा घोषणा-पत्र नहीं होता, कोई शपथ नहीं होती। फिर भी एक मौन समझ होती है—हम साथ हैं। यही साथ आगे चलकर स्त्री के जीवन की अनेक कठिनाइयों में ढाल बनता है।
## विवाह : उत्सव भी, विस्थापन भी
फिर विवाह आता है। ढोल-नगाड़े बजते हैं, हल्दी लगती है, माँगर-माटी होती है, नेग-चार होते हैं, जयमालाएँ सजती हैं, और वह ही लड़की, जो कल तक इस साझा संसार की केन्द्र थी, आज दुल्हन बनकर किसी और आँगन की ओर चली जाती है।
विदाई का क्षण अत्यन्त भावुक होता है। इस समय रोती हुई वही बहनें सबसे आगे होती हैं—जो जयमाला में सबसे अधिक हँसी-मज़ाक करती थीं, जूता-चुराई में सबसे अधिक दाँव लगाती थीं, और दुल्हन के रूप में अपनी बहन को देखकर गर्व से फूल जाती थीं। पर जब विदा का समय आता है, तो वही खिलखिलाहट टूट जाती है। उस क्षण ऐसा लगता है जैसे किसी दीप का विसर्जन हो रहा हो—जिसके साथ केवल एक व्यक्ति नहीं, एक पूरा भावजगत डूब रहा हो।
विवाह के बाद जीवन की प्राथमिकताएँ बदलती हैं, यह सच है। गृहस्थी, पति, बच्चे, सास-ससुर, ननद, कर्तव्य, समय-सारिणी—इन सबके बीच स्त्री का जीवन एक नई संरचना में ढलता है। परंतु प्रश्न यह है कि क्या इस ढलान की कीमत उसके आत्मीय रिश्तों की विस्मृति होनी चाहिए?
क्या ब्याह का अर्थ यह होना चाहिए कि चचेरी, ममेरी, मौसेरी बहनें अब लगभग पराई हो जाएँ?
## “सगी हो तो समझ आता है” — एक चयनात्मक सामाजिक दृष्टि
समाज में यह तर्क अक्सर सुनाई देता है कि सगी बहन से मिलने जाना स्वाभाविक है, पर चचेरी-ममेरी रिश्तों के लिए इतनी दूर कौन जाए। यह तर्क सुनने में व्यावहारिक लग सकता है, पर भीतर से अत्यन्त सीमित और संवेदनहीन है। क्योंकि इसमें प्रेम की वास्तविकता को रक्त के औपचारिक मानकों में बाँध दिया जाता है।
रिश्ते केवल एक पेट से पैदा होने पर ही नहीं बनते। कई बार बचपन की साझी मिट्टी, साझा हँसी, साझा पीड़ा और साझा स्मृतियाँ उन्हें कहीं अधिक गहरा बना देती हैं। जो बहनें एक समय दुल्हन के रूप में साथ खड़ी थीं, जो जीजा के नाम पर छेड़ती थीं, देवरों पर चुहल करती थीं, और जयमाला के समय सजी-धजी अपनी बहन के लिए तालियाँ बजाती थीं—उन्हें केवल इसलिए दूर मान लेना कि वे सगी नहीं हैं, एक भावनात्मक अन्याय है।
दुर्भाग्य से इस अन्याय का सबसे अधिक भार स्त्री ही उठाती है। विवाह के बाद उससे अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी नई भूमिका में इतनी पूरी तरह ढल जाए कि पुराने रिश्ते केवल स्मृति बनकर रह जाएँ। यदि वह पीहर की बहनों से मिलने का मन बनाए, तो उसे कई बार गैर-जिम्मेदार, भावुक या अतिरिक्त संवेदनशील समझ लिया जाता है।
कभी-कभी तो स्थिति और भी करुण हो जाती है। बहनें स्वयं मिलने से बचती हैं, इस डर से कि कहीं उनके बुलाने से दूसरी बहन के घर-परिवार में असुविधा न हो, पति न नाराज़ हो जाएँ, ससुराल वाले नाक-भौं न सिकोड़ें, या बच्चों के साथ आने-जाने की मशक्कत कोई बोझ न बन जाए। इस प्रकार प्रेम रहते हुए भी दूरी की स्वीकृति पैदा हो जाती है। और यही वह मौन क्षरण है जो सम्बन्धों को धीरे-धीरे ठंडा कर देता है।
## पुनर्मिलन का अद्भुत क्षण
फिर कभी कोई पीहर का ब्याह आता है, कोई तीज-त्योहार, कोई बर-बिहाव, कोई ऐसा अवसर जब बरसों बाद ये बहनें फिर से एक जगह मिलती हैं। कोई बच्चों की परीक्षा निपटाकर आई होती है, कोई सास के ऑपरेशन के बाद समय चुराकर, कोई ननद की डिलीवरी के बीच कुछ दिन निकालकर। वे सूटकेस, बैग और बच्चों की उँगलियाँ थामे हरे मंडप तले प्रवेश करती हैं, और फिर अचानक पहचान की गर्माहट लौट आती है।
गले मिलते ही बरसों की दूरी पिघलने लगती है। शरीर का आलिंगन उस भाव को पकड़ने की कोशिश करता है जिसे शब्द नहीं कह पाते। तब एक-दूसरे के चेहरे में उम्र दिखाई देती है, थकान दिखाई देती है, पर साथ ही वह पुरानी चमक भी दिखती है जो कभी बचपन में थी। वे बच्चों को संभालती हैं, गिरते पल्ले ठीक करती हैं, और आँखों-आँखों में एक-दूसरे के हालात तौल लेती हैं।
फिर शुरू होती हैं पुरानी बातें—किसकी शादी में क्या हुआ था, किसने क्या पहना था, किसकी साड़ी कहाँ छूट गई थी, कौन किस पर हँसी थी, कौन किस दिन सबसे अधिक रोई थी। ऐसा लगता है जैसे वर्षों से बंद कोई खिड़की अचानक खुल गई हो और भीतर पुरानी हवा लौट आई हो।
पर विवाह के चार दिन बड़े निर्दयी होते हैं। नेग-चार, बन्ना-बन्नी, रिश्तेदारों की भागदौड़, बच्चों की जिम्मेदारियाँ—सब मिलकर पुनर्मिलन को फिर अलविदा के तट पर पहुँचा देते हैं।
* और फिर एक और विदाई।
* फिर वही आलिंगन।
* इस बार अधिक देर तक।
* इस बार अधिक मौन।
उस मौन में ही सब कुछ कह दिया जाता है—यादें भी, टीस भी, प्रेम भी, वंचना भी।
## सिंदूर की रेखा : एक प्रतीक, एक सीमा
स्त्री के लिए सिंदूर एक मंगल चिह्न है। पर सामाजिक व्यवहार में वही सिंदूर कई बार एक अदृश्य सीमा-रेखा भी बन जाता है। विवाह के साथ उसके संसार का केन्द्र बदलता है, और उसी के साथ एक प्रकार की भावनात्मक भूगोल-रचना भी बदल जाती है। पुराना आँगन पीछे छूटता है, और नया आँगन अधिकार एवं अपेक्षाओं से भर जाता है।
समस्या विवाह में नहीं है। समस्या उस मानसिकता में है जो विवाह को स्त्री के पिछले सम्बन्धों के विसर्जन की तरह देखने लगती है। यह मान लिया जाता है कि अब उसका पहला कर्तव्य केवल नया घर है, और पुरानी आत्मीयताएँ गौण हैं। लेकिन क्या आत्मीयता को कर्तव्य के विरोध में खड़ा करना उचित है?
किसी स्त्री का गृहस्थ होना उसके पुराने स्नेहों का अंत नहीं होना चाहिए। उसे अपनी ज़िम्मेदारियों के साथ अपने भावनात्मक संसार को भी जीने का अधिकार होना चाहिए। यदि हम यह मानते हैं कि वह गृहस्थी संभाले, बच्चों को पाले, रिश्तों को निभाए—तो हमें यह भी मानना होगा कि उसके भीतर की बहन-प्रेम की दुनिया भी उतनी ही वास्तविक है जितना उसका नया दायित्व।
## गुजरी उम्र की पुकार
एक उम्र के बाद गुजरी हुई उम्र बहुत पुकारती है। तब मन उन चेहरों को याद करता है जिनके साथ जीवन की पहली हँसी, पहली शरारत, पहली झुंझलाहट और पहली प्रतीक्षा जुड़ी थी। तब समझ में आता है कि कुछ रिश्ते जीवन से नहीं, जीवन के अर्थ से जुड़े होते हैं।
चचेरी, ममेरी, मौसेरी, फुफेरी बहनें शायद किसी सामाजिक सूची में सबसे ऊपर न हों, पर स्मृति की दुनिया में वे बहुत ऊपर होती हैं। वे उस आत्मीय संसार की संरक्षक होती हैं, जिसे न तो रक्त का सीधा शाब्दिक बंधन समझा जा सकता है और न ही केवल व्यवहारिकता के तराजू पर तौला जा सकता है।
इसलिए आवश्यक है कि समाज विवाह को स्त्री के बचपन की मृत्यु न बनाए। उसे अपने आत्मीय सम्बन्धों को बचाए रखने का अवसर मिले। उसे अपने पुराने स्नेहों के लिए समय, स्पेस और सम्मान मिले। क्योंकि जो समाज स्त्री की भावनाओं को काट देता है, वह अन्ततः अपने ही कोमल पक्ष को घायल करता है।
ब्याह के मंडप में केवल कन्या का हाथ नहीं थमाया जाता; कई बार उसके बचपन की कई शाखाएँ भी धीरे-धीरे पीछे छूट जाती हैं। चचेरी, ममेरी, मौसेरी बहनों के साथ जो आत्मीय संसार रचा गया था, वह यदि सदा के लिए मौन कर दिया जाए, तो यह केवल निजी क्षति नहीं, एक सामाजिक क्षति है।
हमें यह समझना होगा कि संबंधों का मूल्य केवल “सगी” होने से तय नहीं होता। प्यार, स्मृति, साझापन और संवेदना भी एक रिश्ते की असली भूमि होते हैं। विवाह एक नई यात्रा है, पर उससे पहले की यात्राएँ भी उतनी ही पवित्र हैं।
इसलिए ज़रूरत है कि हम स्त्री के लिए ऐसा समाज रचें जहाँ वह गृहस्थी भी निभा सके और अपनी बहनों के संसार को भी जीवित रख सके। जहाँ सिंदूर मंगल का चिह्न हो, सीमा का नहीं। जहाँ ठीहा बदलने का अर्थ पहचान खोना न हो। और जहाँ बहनों का आत्मीय संसार ब्याह के मंडप में विसर्जित न होकर, नए जीवन में भी अपनी सुगंध बनाए रखे।
