शब्दों का संसार और अभिव्यक्ति की मर्यादा
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
शब्दों का संसार और अभिव्यक्ति की मर्यादा
"जब ‘औषधि’ और ‘घाव’ के बीच झूलती हो राष्ट्रीय चेतना"
“शब्द संभाले बोलिए, शब्द के हाथ न पांव।
एक शब्द औषधि करै, एक करत है घाव॥” — कबीरदास
कबीर की यह वाणी केवल नीति-पाठ नहीं, बल्कि मनुष्य-जीवन के सबसे सूक्ष्म और सबसे प्रखर सत्य का उद्घोष है। शब्द आकार में छोटे हो सकते हैं, पर उनका प्रभाव पर्वत से भी भारी होता है। वे क्षणभर में संबंध जोड़ सकते हैं और उसी क्षण संबंध तोड़ भी सकते हैं। वे आश्वस्ति दे सकते हैं, और वही शब्द क्रूरता का आवरण भी बन सकते हैं। वे संस्कार गढ़ते हैं, चेतना को दिशा देते हैं, और कभी-कभी पूरे समाज की दिशा ही मोड़ देते हैं।
आज जब सार्वजनिक जीवन में वाणी की मर्यादा निरंतर क्षीण होती जा रही है, तब शब्दों के इस संसार पर गंभीरता से विचार करना केवल साहित्यिक या भाषाशास्त्रीय आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय, सामाजिक और नैतिक अनिवार्यता बन जाता है। क्योंकि जब शब्द अपनी मर्यादा खोते हैं, तब संवाद टूटता है; और जब संवाद टूटता है, तब लोकतंत्र के भीतर अविश्वास, क्रोध और विघटन की जड़ें गहरी होने लगती हैं।
## शब्द: केवल ध्वनि नहीं, चेतना का उपकरण
मनुष्य ने सभ्यता की यात्रा में सबसे पहले उपकरण नहीं, अर्थ गढ़ा। और अर्थ को वह शब्दों के माध्यम से ही आकार देता आया। शब्द केवल उच्चरित ध्वनियाँ नहीं हैं; वे मनुष्य की भीतरी चेतना के वाहक हैं। वे स्मृति हैं, संकल्प हैं, संकेत हैं, और कभी-कभी सामाजिक यथार्थ के निर्मातृ भी।
शब्दों का जीवन बड़ा विचित्र है। वे रचे जाते हैं, गढ़े जाते हैं, मढ़े जाते हैं, लिखे जाते हैं, पढ़े जाते हैं, बोले जाते हैं, तौले जाते हैं, टटोले जाते हैं और खँगाले जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में वे केवल भाषा के अंग नहीं रहते, वे सभ्यता की नस-नाड़ियों में बहने वाली जीवित शक्ति बन जाते हैं। कोई शब्द किसी को हँसा देता है, कोई मन को सांत्वना देता है, कोई टूटे हुए हृदय को जोड़ देता है। फिर वही शब्द व्यंग्य बनकर चुभ भी सकता है, अपमान बनकर घाव भी दे सकता है, और घृणा का हथियार बनकर समाज को बाँट भी सकता है; इसीलिए शब्दों का संसार जितना सुंदर है, उतना ही उत्तरदायी भी।
## शब्दों की दो धाराएँ: औषधि और घाव
कबीर ने शब्दों के इसी द्वैत को अत्यंत सूक्ष्मता से पकड़ा। एक शब्द औषधि है, दूसरा घाव। एक शब्द करुणा का दीपक है, दूसरा क्रूरता की चिंगारी। एक शब्द मनुष्य को अपने भीतर लौटा सकता है, दूसरा उसे स्वयं से भी दूर कर सकता है।
जब शब्द विवेक, संवेदना और सत्य से उत्पन्न होते हैं, तब वे औषधि बन जाते हैं। वे भीतर की पीड़ा को कम करते हैं, टूटे संबंधों को जोड़ते हैं, और निराश मन में आशा का संचार करते हैं। पर जब शब्द अहंकार, लोभ, सत्ता-लालसा या घृणा से जन्म लेते हैं, तब वे घाव बन जाते हैं। वे न केवल व्यक्ति को, बल्कि समुदायों, संस्थाओं और राष्ट्रों तक को चोट पहुँचा सकते हैं।
यही कारण है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ अभिव्यक्ति की मर्यादा भी अनिवार्य है। स्वतंत्रता यदि विवेक से वंचित हो जाए, तो वह उच्छृंखलता बन जाती है। और उच्छृंखल वाणी बहुत जल्दी हिंसा की मानसिकता में बदल सकती है।
## जब शब्द बिकने लगते हैं
आज के समय की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक यह है कि शब्दों का मूल्य गिरता जा रहा है। वे विचार के वाहक कम, प्रभाव के औजार अधिक बनते जा रहे हैं। जो शब्द कल तक सत्य के लिए प्रयुक्त होते थे, वे आज कई बार प्रचार, प्रपंच और ध्रुवीकरण के साधन बन जाते हैं। शब्दों का यह पतन केवल भाषा का संकट नहीं; यह नैतिकता के क्षरण का लक्षण है।
जब शब्द बिकने लगते हैं, तब सत्य को चोट पहुँचती है। तब प्रश्न अपराध समझा जाने लगता है। तब असहमति को शत्रुता कह दिया जाता है। तब आलोचना को देशद्रोह, और विवेक को विद्रोह की भाषा में परिभाषित करने की प्रवृत्ति जन्म लेती है। ऐसी स्थिति में वाणी का तेज ज्ञान का दीपक नहीं रहता; वह पक्षपात का शोर बन जाता है।
यह संकट केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रहता। यह मीडिया, सामाजिक संवाद, संस्थागत व्यवहार, यहाँ तक कि पारिवारिक रिश्तों तक फैल जाता है। जब सार्वजनिक भाषा में संयम घटता है, तब निजी जीवन भी उसकी कीमत चुकाता है। घरों में संवाद कम होता है, समाज में अविश्वास बढ़ता है, और मनुष्य भीतर से अधिक अकेला तथा अधिक असुरक्षित होने लगता है।
## लोकतंत्र और भाषा की नैतिकता
लोकतंत्र केवल मतपत्रों से नहीं चलता; वह भाषा की नैतिकता पर भी टिका होता है। यदि सार्वजनिक शब्दावली दूषित हो जाए, तो लोकतंत्र का व्याकरण बिगड़ने लगता है। तब बहस की जगह तमाशा, तर्क की जगह आरोप, और संवाद की जगह शोर ले लेता है।
लोकतंत्र की आत्मा यह मानती है कि असहमति शत्रुता नहीं है। पर जब भाषा में सौजन्य नहीं रहता, तब असहमति भी अपमान में बदल जाती है। किसी को सुनने की क्षमता जब शब्दों के स्तर पर नष्ट होती है, तब समाज अपने ही भीतर खंडित होने लगता है।
इसलिए शब्दों की मर्यादा केवल शिष्टाचार का प्रश्न नहीं, नागरिकता का प्रश्न है। एक सभ्य राष्ट्र वही है जहाँ वाणी में बल हो, पर क्रूरता न हो; जहाँ आलोचना हो, पर अपमान न हो; जहाँ तर्क हो, पर तिरस्कार न हो; जहाँ तीव्रता हो, पर विष न हो।
## साहित्य ने शब्दों को कैसे बचाया
भारतीय साहित्य और संत परंपरा ने शब्दों को केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं माना, बल्कि उन्हें साधना का अंग बनाया। कबीर, तुलसी, रहीम, सूर, मीरा, विद्यापति, रसखान—इन सबने दिखाया कि शब्द जब भीतर की शुद्धता से निकलते हैं, तब वे कालजयी हो जाते हैं।
कबीर की वाणी में आक्रोश है, पर विष नहीं। तुलसी की भाषा में मर्यादा है, पर कठोरता नहीं। रहीम के दोहों में जीवन की सच्चाई है, पर कटुता नहीं। यह परंपरा हमें सिखाती है कि शब्द तभी सुंदर होते हैं जब वे सत्य के साथ संवेदना भी ले आएँ।
शब्दों की सार्थकता केवल उनके अर्थ में नहीं, उनके संस्कार में है। एक ही बात कोई व्यक्ति गाली बनाकर कह सकता है, और वही बात कोई संत वचन बनाकर कह सकता है। फर्क शब्दों का कम, चेतना का अधिक होता है।
## भाषा का नैतिक पुनर्निर्माण
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने शब्दों की फिर से परीक्षा लें। हर सार्वजनिक वाक्य, हर संस्थागत कथन, हर मीडिया शीर्षक, हर राजनीतिक घोषणा—सभी को इस प्रश्न से गुजरना चाहिए: क्या यह समाज को जोड़ रहा है, या तोड़ रहा है?
शब्दों का पुनर्निर्माण केवल भाषाई शुद्धता से नहीं होगा; वह नैतिक शुद्धता से होगा। उसके लिए आत्मसंयम चाहिए, सहानुभूति चाहिए, और यह समझ चाहिए कि जो वाणी दूसरों को अपमानित करती है, वह अन्ततः स्वयं बोलने वाले को ही छोटा करती है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तभी महान है जब वह उत्तरदायित्व के साथ जुड़ी हो। शब्दों की शक्ति का सम्मान करने का अर्थ है—उन्हें विचार के प्रकाश में, संवेदना के ताप में, और सत्य के अनुशासन में ढालना।
## शब्दों का आत्मसंसार
सच तो यह है कि शब्दों का अपना एक संसार होता है। उस संसार में कोई शब्द दीपक बनता है, कोई तलवार; कोई मरहम, कोई वार; कोई प्रार्थना, कोई प्रहार। इस संसार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ एक ही शब्द अलग मनोभूमि में भिन्न फल देता है। इसलिए शब्द मात्र ध्वनि नहीं, मन की दिशा हैं।
यही कारण है कि वाणी को साधना कहा गया है। साधना का अर्थ केवल मौन नहीं; उसका अर्थ है—सचेत उच्चारण। ऐसा उच्चारण जो किसी का आत्मसम्मान न छीने, किसी की अस्मिता न कुचले, किसी की पीड़ा न बढ़ाए। ऐसी वाणी जो अंधकार को बढ़ाए नहीं, दीप जला दे।
कबीर का यह कथन आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है—शब्द औषधि भी हैं और घाव भी। यह हम पर निर्भर है कि हम उन्हें किस रूप में बरतते हैं। यदि शब्द विवेक से चुने जाएँ, तो वे समाज का उपचार बनते हैं। यदि वे अहंकार से फूटें, तो वही शब्द समाज में विखंडन का कारण बनते हैं।
इसलिए आवश्यक है कि हम शब्दों से खेलें नहीं, उन्हें सोच-समझकर बोलें। शब्दों को केवल गढ़ें नहीं, उनका मान भी रखें। उन्हें केवल उच्चारित न करें, आत्मसात करें। क्योंकि शब्दों की गरिमा ही मनुष्य की गरिमा है; और वाणी की मर्यादा ही सभ्यता की पहचान है।
"शब्दों का सम्मान कीजिए"— क्योंकि शब्द ही वह सेतु हैं जिनसे मनुष्य मनुष्य तक, समाज समाज तक, और अंततः सत्य तक पहुँचता है और जब शब्द मर्यादित होते हैं, तब जीवन औषधि बन जाता है।
