पैसे का सवाल, सत्ता का सवाल और जवाबदेही का संकट
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
पैसे का सवाल, सत्ता का सवाल और जवाबदेही का संकट
भारतीय राजनीति में “पैसा कहाँ से आता है?” का प्रश्न अक्सर एक नैतिक हथियार की तरह इस्तेमाल होता है। सत्ता पक्ष विपक्ष से विदेशी फंडिंग, कथित नेटवर्क या किसी बड़े दानदाता की कहानी पूछता है; विपक्ष सत्ता से सार्वजनिक कोष, कॉर्पोरेट चंदे और संस्थागत पारदर्शिता का हिसाब माँगता है। समस्या यह नहीं कि सवाल पूछे जाते हैं। समस्या यह है कि सवाल अक्सर चुनिंदा होते हैं—और जवाब देने की समान इच्छाशक्ति किसी तरफ नहीं दिखाई देती। जब तक राजनीतिक वित्त, दान, मीडिया-फंडिंग और सार्वजनिक कोषों का ढाँचा पारदर्शी नहीं होगा, तब तक “कौन किसका आदमी है” जैसी बहसें लोकतांत्रिक विमर्श नहीं, केवल प्रचार-युद्ध रहेंगी। सुप्रीम कोर्ट ने electoral bonds को असंवैधानिक ठहराते हुए स्पष्ट किया था कि अनाम राजनीतिक दान मतदाताओं के सूचना के अधिकार को चोट पहुँचाता है। चुनाव आयोग ने भी 2025 में कहा कि उसके पास राजनीतिक दलों के फंड के स्रोत या मात्रा की जांच का कानूनी अधिकार नहीं है। यही वह संस्थागत खालीपन है जिसमें शोर बहुत है, जवाब कम।
इस संदर्भ में NewsClick मामला सिर्फ एक मीडिया-स्टोरी नहीं, बल्कि राज्य-शक्ति और असहमति के रिश्ते की कसौटी बन गया। दिल्ली उच्च न्यायालय ने NewsClick और इसके संस्थापक के खिलाफ FIR तथा ED कार्यवाही को रद्द करते हुए इसे “gross abuse of law” कहा, और उसके बाद ED ने उस आदेश को चुनौती देने की तैयारी भी की। यह पूरी श्रृंखला बताती है कि कानूनी प्रक्रिया कई बार स्वयं दंड की तरह काम करती है—चाहे अंतिम न्यायिक नतीजा किसी के पक्ष में क्यों न आए। जब पत्रकारिता, डिजिटल मीडिया या वैकल्पिक आवाज़ों पर राज्य-यंत्र इतना भारी पड़ने लगे कि बचाव ही स्थायी अवस्था बन जाए, तब सवाल केवल एक संस्थान का नहीं रहता; सवाल सार्वजनिक संवाद की स्वतंत्रता का होता है।
इसी बीच “कॉक्रोच जनता पार्टी” जैसे व्यंग्यात्मक आंदोलनों ने यह दिखा दिया है कि असंतोष अब केवल पारंपरिक पार्टी-राजनीति की भाषा में नहीं, प्रतीकात्मक प्रतिरोध की नई शैली में भी व्यक्त हो रहा है। हाल के दिनों में बेंगलुरु और जयपुर में इसके कार्यक्रमों को लेकर खबरें आईं; कहीं युवाओं की बड़ी भागीदारी दिखी, कहीं अनुमति पर रोक लगी, और राज्य-प्रशासन की प्रतिक्रिया भी सामने आई। यह केवल एक व्यंग्य नहीं है; यह उस पीढ़ी का संकेत है जो सत्ता, संस्थाओं और मीडिया—तीनों पर भरोसे का संकट झेल रही है। जब विरोध को भी तिरस्कार, “जासूसी” या बदनाम करने की कोशिशों से घेरा जाए, तब आंदोलन का स्वर और तीखा होता है।
यहाँ सबसे अहम बात यह है कि सवाल किसी एक दल से नहीं, पूरे राजनीतिक तंत्र से पूछा जाना चाहिए। यदि विपक्ष के लिए विदेशी फंडिंग, नेटवर्क या “सोरोस” जैसे शब्दों से चरित्र-निर्माण किया जाता है, तो सत्ता को भी अपनी वित्तीय पारदर्शिता, सार्वजनिक कोषों की जवाबदेही और कॉर्पोरेट-राजनीतिक रिश्तों पर उतनी ही खुली बहस के लिए तैयार रहना होगा। PM CARES Fund की अपनी FAQ उसे एक public charitable trust बताती है; फिर भी उसकी पारदर्शिता को लेकर बहस वर्षों से जारी रही है। ऐसी स्थितियाँ यही बताती हैं कि देश में “कानूनी वैधता” और “लोकतांत्रिक पारदर्शिता” एक ही चीज़ नहीं हैं। वैधता पर्याप्त नहीं; जवाबदेही भी चाहिए।
इसलिए “पैसा कौन दे रहा है” का प्रश्न अपने आप में न तो गलत है, न छोटा। गलत है उसका चयनात्मक इस्तेमाल। आज जरूरत किसी पक्ष की निंदा करने की नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक वित्त-तंत्र को खुली रोशनी में लाने की है—चाहे बात पार्टी फंड की हो, सार्वजनिक कोषों की हो, मीडिया पर दबाव की हो, या विरोधी आंदोलनों को बदनाम करने की रणनीति की। जब तक सत्ता, विपक्ष, अदालत, चुनाव-प्रशासन और मीडिया—सभी के लिए एक समान पारदर्शिता-मानक नहीं बनेगा, तब तक यह बहस “कौन पैसे ले रहा है” से आगे नहीं बढ़ेगी। लोकतंत्र की असली मजबूती इसी में है कि सवाल सब पर समान रूप से लागू हों, और जवाब भी।
