तुमसे, हे श्री जगन्नाथ महाप्रभु!
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
तुमसे, हे श्री जगन्नाथ महाप्रभु!
चमन में झिलमिलाती
आरती की हर लौ,
जीवन में जो भी उजियारा है,
सब तुमसे, हे श्री जगन्नाथ महाप्रभु!
श्वासों में जो नाम बसा है,
नयनों में जो स्वप्न खिला है,
हृदय में जो प्रेम उमड़ता है,
सब तुमसे, हे श्री जगन्नाथ महाप्रभु!
नीलाचल के नाथ!
तुम्हारी कृपा की छाया में
यह जीवन अंकुरित हुआ,
यह मन पल-पल पुष्पित हुआ।
जब-जब पथ दुर्गम हुआ,
जब-जब दिशा धुँधली पड़ी,
तब-तब तुम्हारे रथ का ध्वज
क्षितिज पर आशा बनकर लहराया।
गर्व से चलना क्या होता है,
यह जग ने सिखाया होगा,
पर विनम्र होकर झुकना क्या होता है,
यह हमने तुमसे सीखा, प्रभु।
तुम्हारी उँगली तो न थामी कभी,
पर हर मोड़ पर अनुभव किया—
कोई अदृश्य करुणामय हाथ
पीछे से हमें थामे हुए है।
जब संसार ने तिरस्कार दिया,
तुमने अपनापन दिया।
जब अपने भी दूर हुए,
तुमने हृदय में स्थान दिया।
हे दीनबन्धु!
तुम्हारे मंदिर की सीढ़ियों पर
बैठा हुआ एक साधारण भक्त भी
राजाओं से अधिक धनी है,
क्योंकि उसके पास तुम्हारा नाम है।
तुमसे ही भोर की पहली किरण,
तुमसे ही संध्या का अंतिम रंग।
तुमसे ही गंगा की निर्मल धारा,
तुमसे ही जीवन का मधुर प्रसंग।
हे महाप्रभु!
ना मुझे वैकुण्ठ की अभिलाषा,
ना इन्द्रासन की कामना।
ना सिद्धियों का आकर्षण,
ना यश की कोई वासना।
बस इतना वरदान मिले—
जब-जब यह मन भटके,
तुम्हारे चरणों की धूल याद आए।
जब-जब यह आँख नम हो,
तुम्हारी मुस्कान दिखाई दे।
जब-जब यह जीवन थके,
तुम्हारा रथ निकट सुनाई दे।
हे जगत के नाथ!
मुझे धन नहीं चाहिए,
मुझे मान नहीं चाहिए,
मुझे कोई विशेष पहचान नहीं चाहिए।
बस इतना चाहिए—
मेरे हृदय में
तुम्हारे नाम का दीप
अखंड जलता रहे।
मेरी हर धड़कन कहती रहे—
तुमसे प्रभात,
तुमसे साँझ,
तुमसे ही जीवन का हर राज।
तुमसे प्रेम,
तुमसे प्राण,
तुमसे ही मेरी पहचान।
चमन में झिलमिलाती
भक्ति की हर ज्योति,
जीवन में जो भी मंगल है,
सब तुमसे, हे श्री जगन्नाथ!
और जब इस जीवन की
अंतिम संध्या उतर आए,
तब मेरी बुझती हुई दृष्टि में
बस एक ही दृश्य रह जाए—
नीलाचल का धाम,
सुभद्रा-बलभद्र संग विराजे तुम,
और मेरी अंतिम पुकार—
"जय श्री जगन्नाथ!"
"जगन्नाथ स्वामी, नयन-पथ-गामी भवतु मे।" 🙏
