जय श्रीमन्नारायण विवाह: धर्मसंस्कार की मर्यादा बनाम आधुनिक प्रहसन "धर्मे च अर्थे च कामे च इमं नातिचरामि" — विवाहमंत्र, ऋग्वेद
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
जय श्रीमन्नारायण
विवाह: धर्मसंस्कार की मर्यादा बनाम आधुनिक प्रहसन
"धर्मे च अर्थे च कामे च इमं नातिचरामि" — विवाहमंत्र, ऋग्वेद
विवाह केवल एक सामाजिक अनुबंध नहीं, अपितु वैदिक धर्म का एक अत्यंत पवित्र, सात्त्विक एवं आध्यात्मिक संस्कार है, जो मानव को धर्मपथ पर अग्रसर करता है। यह वही संस्कार है जो व्यक्ति को गृहस्थाश्रम में प्रवेश कराकर यज्ञ, दान, सेवा, संतति-पालन और मोक्षप्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर करता है।
कन्यादान: परम पुण्य की संकल्पना
विवाह संस्कार में कन्यादान को "महादान" कहा गया है। मनुस्मृति में कहा गया है: "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।" — मनुस्मृति 3.56
अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता वास करते हैं। जब कन्या का दान किया जाता है, तब वह एक पवित्र संकल्प होता है। उस क्षण "अघोरचक्षुरपतिघ्न्येधि" जैसे वैदिक मंत्रों के उच्चारण से वर कन्या को पहली बार देखता है — वह भी यज्ञाग्नि साक्षी होकर, देवताओं के समक्ष।
यह प्रथा आज भी हमारे भारतवर्ष में चली आ रही है — जहाँ विवाह से पूर्व वर-कन्या का संवाद, संसर्ग अथवा मिलन वर्जित माना गया है। वैदिक काल से लेकर वर्तमान तक, विशेषकर ब्राह्मण कुलों में यह मर्यादा कठोर रूप से पालन की जाती रही है। क्षत्रियों के महाकाव्य चरित्रों में कुछ अपवाद स्वरूप उल्लेख मिलते हैं, किंतु ब्राह्मण परंपरा में विवाह से पूर्व संपर्क का कोई प्रमाण प्राप्त नहीं होता।
आधुनिक प्रवृत्तियाँ: वैदिक मर्यादा पर प्रश्नचिह्न
वर्तमान में विवाह को एक धार्मिक संस्कार के स्थान पर एक प्रदर्शन बना दिया गया है। 'एंगेजमेंट', 'प्रि-वेडिंग फोटोशूट', 'जयमाला' जैसे कार्यक्रम वैदिक संस्कृति से पूर्णतः विपरीत हैं। युवक-युवती एक-दूसरे को अंगूठियाँ पहनाते हैं, चित्र खिंचवाते हैं, साथ समय बिताते हैं — और फिर भी कन्यादान का नाटक किया जाता है।
जब वर, कन्या को स्पर्श कर चुका हो, पत्नीवत व्यवहार कर चुका हो, तब उस कन्यादान की शुद्धता, अर्थ और वैधता क्या शेष रहती है?
शास्त्रों में कहा गया है:
"दत्तं हि कन्यां पतये विधिवत् यः प्रयच्छति।
स लोके सुखमेधत्ते प्रेत्य चानुत्तमं सुखम्॥"
— गृह्यसूत्र
जिस कन्या को विधिपूर्वक, पवित्रता सहित दान किया गया हो, वही दान पुण्यफल देने वाला होता है। अन्यथा नहीं।
विवाह को पुनः धर्म का स्वरूप दें:
आज आवश्यकता है कि जो स्वयं को "वैदिक" कहने का साहस रखते हैं, वे पहले इस वैदिक परंपरा की मर्यादा को समझें और उसका पालन करें। विवाह के नाम पर किए जा रहे आधुनिक ‘नाटकों’ से इस संस्कार की गरिमा को ठेस पहुँच रही है।
विवाह वही पवित्र होता है जहाँ विवाह पूर्व व्रत, कन्यादान की पवित्रता, सप्तपदी के संकल्प और धर्मारंभ की भावना विद्यमान हो।
"सप्तपदी त्वा सख्यं ते गमेयम्।" — ऋग्वेद 10.85.36
"इन सात कदमों के साथ मैं तुझसे सखा भाव से संबंध स्थापित करता हूँ।"
विवाह केवल उत्सव नहीं, यह संस्कार है, यह धर्म का प्रवेशद्वार है। इसे एक फैशन या मनोरंजन का माध्यम बनाकर नष्ट न करें।
