प्रदीप्त मस्तक, प्रज्वलित चिता: झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का अंतिम महासंग्राम
लखनऊ डेस्क प्रदीप shukla
प्रदीप्त मस्तक, प्रज्वलित चिता: झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का अंतिम महासंग्राम
इतिहास जब पने सबसे क्रूर पन्नों को पलटता है, तो कुछ गाथाएँ अक्षरों से नहीं, बल्कि रक्त, अश्रु और अदम्य स्वाभिमान की आग से लिखी जाती हैं। यह वृत्तांत भारतवर्ष की उस परम प्रतापी वीरांगना का है, जिसने पराधीनता की बेड़ियों को अपने संकल्प से पिघला दिया। जिसने जीते जी कभी गोरे फिरंगियों के सामने मस्तक नहीं झुकाया, और जिसने मृत्यु के आलिंगन में बंधते समय भी यह सुनिश्चित किया कि उसका पवित्र शरीर शत्रुओं के अपवित्र हाथों का स्पर्श न पा सके। यह कहानी है झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के उस अंतिम महासंग्राम की, जिसकी गवाही आज भी कोटा की सराय और ग्वालियर की माटी अपने सीने में छुपाए बैठी है।
१. वैभव से विस्थापन तक: 'रानी महल' का ओजस्वी एकांत
सन १८५४ का वह दौर, जब कुटिल लाड डलहौजी की 'हड़प नीति' (Doctrine of Lapse) ने एक भरे-पूरे राजपरिवार की खुशियों को निगल लिया। रानी के वैध दत्तक पुत्र दामोदर राव के उत्तराधिकार को अवैध घोषित कर, ईस्ट इंडिया कंपनी ने झाँसी के राजसी किले पर अपना अधिकार जमा लिया। एक स्वाभिमानी राजमाता को अपना ही महल छोड़ना पड़ा। रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी विवशता को कायरता नहीं बनने दिया; उन्होंने झाँसी की गलियों में स्थित एक साधारण, तीन मंजिला 'रानी महल' में शरण ली।
यहीं पर उनका संपर्क ऑस्ट्रेलियाई मूल के निर्भीक वकील जॉन लैंग से हुआ, जो मेरठ से 'मुफ़ुस्सलाइट' नामक समाचार पत्र निकालते थे और ब्रिटिश प्रशासन की आँखों में हमेशा किरकिरी बने रहते थे। जब लैंग झाँसी आ रहे थे, तब रानी ने उनके स्वागत में राजसी मर्यादा की कोई कमी नहीं छोड़ी। आगरा से उन्हें लाने के लिए घोड़ों का एक भव्य रथ भेजा गया। मार्ग में लैंग की सुख-सुविधा का ऐसा प्रबंध था जो उनकी पाश्चात्य आदतों के अनुकूल हो—बर्फ से भरी बाल्टी में पानी, बीयर और चुनिंदा वाइन्स की बोतलें रखी थीं, और एक सेवक पूरे रास्ते उन्हें पंखा झलता आया था।
झाँसी की सीमा पर पहुँचने पर पचास सशस्त्र घुड़सवारों के पहरे में लैंग को एक पालकी में बैठाकर 'रानी महल' लाया गया, जिसके बगीचे में एक विशाल शामियाना तना था। रानी लक्ष्मीबाई उस शामियाने के एक कोने में, एक भारी रेशमी पर्दे के पीछे विराजमान थीं। दोनों के बीच कूटनीतिक और कानूनी बातचीत चल रही थी कि तभी अचानक, बाल-सुलभ चंचलता वश रानी के दत्तक पुत्र दामोदर ने वह पर्दा एक झटके में हटा दिया।
इतिहासकार रेनर जेरॉस्च ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'द रानी ऑफ़ झाँसी, रेबेल अगेंस्ट विल' में जॉन लैंग के संस्मरणों को उद्धृत करते हुए उस ऐतिहासिक क्षण का सजीव चित्रण किया है। लैंग की दृष्टि जब अचानक परदे के पार बैठी रानी पर पड़ी, तो वह स्तब्ध रह गया। लैंग लिखता है: "रानी मध्यम कद की, गठीले बदन की महिला थीं। उनकी युवावस्था का सौंदर्य अब भी उनके चेहरे पर एक अलौकिक आकर्षण के रूप में शेष था। उनका चेहरा थोड़ा अधिक गोल था, लेकिन उनकी आँखें अविश्वसनीय रूप से सुंदर और तीक्ष्ण थीं। नाक का नक्श बेहद नाज़ुक था और रंग गेहुआं-गोरा था। उनके पूरे शरीर पर सोने की मामूली बालियों के सिवा कोई आभूषण नहीं था। उन्होंने श्वेत मलमल की अत्यंत साधारण साड़ी पहन रखी थी। उनके पूरे व्यक्तित्व में एक गजब का राजसी तेज था, जिसे केवल उनकी थोड़ी भारी और फटी हुई आवाज़ प्रभावित करती थी।"
वह भारी आवाज़ वास्तव में किसी विवश अबला की नहीं, बल्कि आने वाले महासंग्राम की उस गर्जना की पूर्वपीठिका थी, जिसे जल्द ही ब्रिटिश सेना को युद्ध के मैदान में सुनना था।
२. कोटा की सराय: दाँतों में लगाम, दोनों हाथों में तलवार
समय बदला और १८५७ के महासमर की ज्वाला धधक उठी। रानी ने अपनी साधारण हवेली को क्रांति के मुख्यालय में बदल दिया। जून १८५८ का वह ऐतिहासिक दिन आया, जब ग्वालियर के पास 'कोटा की सराय' के मैदान में काल बनकर फिरंगियों की सेना खड़ी थी।
ब्रिटिश कैप्टन रॉड्रिक ब्रिग्स वह पहला अंग्रेज अफसर था, जिसने रानी लक्ष्मीबाई को साक्षात् युद्ध के मैदान में संहार करते देखा। वह दृश्य ऐसा था कि ब्रिग्स के रोंगटे खड़े हो गए। "रानी ने अपने घोड़े की लगाम को अपने दाँतों से दबा रखा था, उनके दोनों हाथों में नंगी तलवारें थीं और वे बिजली की गति से अपने दोनों ओर एक साथ वार कर रही थीं।" वे जिस तरफ मुड़तीं, वहाँ गोरे सैनिकों के सिर धड़ से अलग होकर ज़मीन पर गिर रहे थे।
कैप्टन ब्रिग्स ने तय किया कि वह स्वयं आगे बढ़कर रानी पर सीधा प्रहार करेगा। लेकिन जब-जब वह आगे बढ़ने का प्रयास करता, रानी के वफ़ादार, वीर घुड़सवारों का एक सुरक्षा घेरा ब्रिग्स को चारों तरफ से घेर लेता और उसका ध्यान भंग कर देता। रानी के सैनिक अपने प्राणों की आहुति देकर भी अपनी स्वामिनी की रक्षा कर रहे थे।
ब्रिग्स ने अपनी पूरी शक्ति बटोरी, कुछ भारतीय सैनिकों को घायल किया और अपने घोड़े को एड़ लगाकर सीधे रानी की ओर झपटा। ठीक उसी समय, युद्ध के मैदान में ब्रिटिश जनरल रोज़ की उस रिज़र्व टुकड़ी ने प्रवेश किया, जो ऊँटों पर सवार अत्यंत निपुण सैनिकों की थी। इस ताज़ादम टुकड़ी के अचानक रणभूमि में कूदने से थक चुके ब्रिटिश खेमे में फिर से जान आ गई। रानी ने पलक झपकते ही इस आसन्न संकट को भाँप लिया। उनके सैनिक भागे नहीं, परंतु भारी गोलाबारी और ऊँट-सवारों के आक्रमण के कारण उनकी संख्या तेज़ी से घटने लगी।
जॉन हेनरी सिलवेस्टर ने अपनी पुस्तक 'रिकलेक्शंस ऑफ़ द कैंपेन इन मालवा एंड सेंट्रल इंडिया' में इस रोमांचक क्षण को दर्ज करते हुए लिखा है: "अचानक उस धूल और धुएँ के बीच रानी की ओजस्वी आवाज़ गूँजी—'मेरे पीछे आओ!' केवल पंद्रह वफ़ादार घुड़सवारों का एक छोटा सा जत्था उनके पीछे हो लिया। वे इतनी तीव्र गति से आगे बढ़ीं कि ब्रिटिश सैनिकों को स्थिति को समझने में कुछ सेकंड लग गए। तभी अचानक रॉड्रिक ब्रिग्स चिल्लाया—'दैट्स दि रानी ऑफ़ झाँसी, कैच हर! (वही झाँसी की रानी है, उसे पकड़ो!)'"
३. नियति का क्रूर चक्र: अड़ियल घोड़ा और विश्वासघाती संगीन
रानी और उनके मुट्ठी भर साथियों ने अभी केवल एक मील की दूरी तय की थी कि ब्रिग्स के घुड़सवार उनके ठीक पीछे पहुँच गए। कोटा की सराय के पास युद्ध नए सिरे से शुरू हुआ। स्थिति अत्यंत विकट थी; रानी के एक-एक सैनिक के मुक़ाबले दो-दो, तीन-तीन ब्रिटिश सैनिक टूट पड़ रहे थे।
तभी अचानक, रानी को अपने बाएँ सीने में एक तीखा, असहनीय दर्द महसूस हुआ, जैसे किसी ज़हरीले साँप ने उन्हें डस लिया हो। एक अंग्रेज सैनिक ने, जिसे रानी अपनी व्यस्तता के कारण देख नहीं पाई थीं, पीछे से आकर उनके सीने में संगीन भोंक दी थी। सिंहनी की तरह दहाड़ते हुए रानी घूमीं और अपने ऊपर हमला करने वाले उस गोरे सैनिक पर पूरी ताक़त से तलवार लेकर टूट पड़ीं। उन्होंने उसे वहीं ढेर कर दिया।
सीने से रक्त का फव्वारा फूट रहा था, परंतु घाव अभी उतना गहरा नहीं था कि उनके इरादों को रोक सके। वे अपने घोड़े को दौड़ाती रहीं। अचानक, दौड़ते-दौड़ते उनके सामने पानी का एक छोटा सा पहाड़ी झरना (नाला) आ गया। रानी के मन में कौंधा कि यदि उनका घोड़ा एक छलांग में इस मटमैले पानी के पार उतर जाए, तो घने जंगलों के बीच फिरंगी उन्हें कभी नहीं ढूँढ पाएंगे।
उन्होंने घोड़े को एड़ लगाई। लेकिन नियति का क्रूर खेल देखिए—उनका पुराना वफ़ादार घोड़ा पहले ही वीरगति को प्राप्त हो चुका था, और यह नया, अप्रशिक्षित घोड़ा था। वह छलांग लगाने के बजाए इतनी तेज़ी से रुका कि रानी करीब-करीब उसकी गर्दन के ऊपर लटक गईं। उन्होंने दोबारा अपनी पूरी ताक़त से घोड़े की पसलियों में पैर मारे, लेकिन घोड़े ने एक इंच भी आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। वह वहीं गोल-गोल घूमने लगा।
उसी क्षण, पीछे से एक राइफ़ल की गोली आई और उनकी दाईं कमर में आकर धंस गई। दर्द की एक भयानक लहर उनके पूरे शरीर में दौड़ गई। चोट इतनी भीषण थी कि रानी के बाएँ हाथ की तलवार छूटकर सीधे धूल में गिर गई। उन्होंने अपने उसी बाएँ हाथ से अपनी कमर से बहते हुए गर्म खून को दबाकर रोकने का निष्फल प्रयास किया।
एंटोनिया फ़्रेज़र अपनी पुस्तक 'द वॉरियर क्वीन' में उस हृदयविदारक क्षण का वर्णन करते हुए लिखती हैं: "तब तक एक अंग्रेज सैनिक रानी के घोड़े की बगल तक पहुँच चुका था। उसने पूरी ताक़त से रानी पर वार करने के लिए अपनी भारी तलवार ऊपर उठाई। होश खो रही रानी ने भी अपने दाहिने हाथ की तलवार से उस वार को रोकने का अंतिम प्रयास किया। लेकिन शरीर शिथिल हो चुका था। उस अंग्रेज की तलवार रानी के मस्तक पर इतनी तेज़ी से लगी कि उनका माथा बीच से फट गया। उनकी एक आँख बाहर आ गई और चारों तरफ से बहते हुए खून के कारण वे लगभग अंधी हो गईं।"
इस प्राणघातक प्रहार के बाद भी, उस मरणासन्न अवस्था में वीरांगना ने अपनी बची-खुची आत्मशक्ति को बटोरा और उस अंग्रेज सैनिक पर एक अंतिम जवाबी वार किया। परंतु इस बार प्रहार सटीक नहीं बैठा और वह केवल सैनिक के कंधे को ही घायल कर पाई। इसके तुरंत बाद, झाँसी की वह रानी, जिससे पूरी ब्रिटिश हुकूमत कांपती थी, अचेत होकर घोड़े से नीचे ज़मीन पर गिर पड़ी।
४. "अंग्रेज़ों को मेरा शरीर नहीं मिलना चाहिए"
रणभूमि की धूल में लहूलुहान पड़ी अपनी स्वामिनी को देख, उनके एक वफ़ादार अंगरक्षक ने अपने घोड़े से कूदकर उन्हें अपनी बाहों में उठा लिया। वह उन्हें पास ही स्थित एक बाबा गंगादास की कुटिया और साधुओं के एक छोटे से मंदिर के भीतर ले गया। रानी अभी जीवित थीं, उनकी साँसें उखड़ रही थीं।
मंदिर के वृद्ध पुजारी ने अत्यंत व्याकुलता से उनके सूखे, फटे हुए होठों पर गंगाजल की कुछ बूँदें टपकाईं। माँ भारती की वह लाडली धीरे-धीरे चेतना खो रही थी। बाहर लगातार राइफ़लों की गूँज और घोड़ों की टापें सुनाई दे रही थीं। अंतिम भारतीय सैनिक को मौत के घाट उतारने के बाद, कैप्टन रॉड्रिक ब्रिग्स चिल्लाया—"वे लोग मंदिर के भीतर गए हैं! उन पर हमला करो, रानी अभी ज़िंदा है!"
पुजारियों ने भीतर अंतिम प्रार्थनाएँ पढ़नी शुरू कर दी थीं। रानी की एक आँख पूरी तरह बंद हो चुकी थी। उन्होंने अत्यधिक कष्ट से अपनी दूसरी आँख खोली। धुंधली पड़ती जा रही इस दुनिया के बीच उन्हें केवल अपने पुत्र का चेहरा याद आया। उनके मुख से रुक-रुक कर, अत्यंत क्षीण शब्द निकले: "....दामोदर... मैं उसे तुम्हारी... देखरेख में छोड़ती हूँ... उसे यहाँ से निकालो... छावनी ले जाओ... दौड़ो..."
उन्होंने कांपते हाथों से अपने गले का अनमोल मोतियों का हार उतारकर दामोदर को देने की कोशिश की, लेकिन हाथ उठने से पहले ही वे पुनः अचेत हो गईं। पुजारी ने उनके गले से वह हार उतारा और रोते हुए उनके अंगरक्षक के हाथ में रख दिया—"इसे संभाल कर रखो... दामोदर के लिए।"
रानी के फेफड़ों में खून भर चुका था, जिससे उनकी साँसें अत्यंत तीव्र और कष्टदायक हो गई थीं। वे मृत्यु के महासागर में डूब रही थीं। लेकिन तभी, अचानक जैसे उनकी आत्मा ने मौत को एक पल के लिए ठहरने का आदेश दिया। उनके शरीर में एक अंतिम बार ऊर्जा का संचार हुआ। वे उठ बैठीं और उन्होंने अपना अंतिम आदेश दिया: "अंग्रेज़ों को... मेरा... शरीर... नहीं मिलना चाहिए..."
यह कहते ही उनका सिर एक ओर लुढ़क गया। उनकी साँसों में एक अंतिम झटका आया, और फिर सब कुछ शांत हो गया। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने मात्र २९ वर्ष की आयु में अपने प्राण मातृभूमि की बलिवेदी पर समिधा की तरह अर्पित कर दिए थे।
५. चिता की लपटें और इतिहास का सूनापन
वहाँ उपस्थित मुट्ठी भर अंगरक्षकों और साधुओं के पास शोक मनाने का समय नहीं था। बाहर फिरंगियों की पदचाप बढ़ रही थी। उन्होंने आनन-फानन में मंदिर के भीतर रखी सूखी लकड़ियाँ, हवन सामग्री और जो कुछ भी मिला, उसे एकत्र किया। रानी के पार्थिव शरीर को उस पर रखा और अग्नि प्रज्वलित कर दी।
बाहर से गोलियों की बौछारें मंदिर की दीवारों को छेद रही थीं। मंदिर के भीतर मौजूद सिर्फ तीन वफ़ादार सैनिकों ने अपनी राइफ़लों से सैकड़ों अंग्रेजों का मुक़ाबला करना शुरू किया ताकि चिता पूरी तरह जल सके। पहले एक राइफ़ल शांत हुई... फिर दूसरी... और अंत में तीसरी राइफ़ल की आवाज़ भी हमेशा के लिए खामोश हो गई।
जब कैप्टन रॉड्रिक ब्रिग्स अपनी सेना के साथ मंदिर का दरवाज़ा तोड़कर अंदर घुसा, तो वहाँ सन्नाटा पसरा था। ज़मीन पर पुजारियों और अंगरक्षकों के रक्तरंजित शव पड़े थे। ब्रिग्स की नज़र कोने में जल रही एक चिता पर पड़ी, जिसकी लपटें अब शांत हो रही थीं। उसने अपने भारी बूटों से उस चिता की लकड़ियों को हटाने का प्रयास किया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वहाँ केवल मानव शरीर के जले हुए अवशेष और राख बची थी। रानी लक्ष्मीबाई ने मरकर भी अपनी प्रतिज्ञा पूरी की थी; अंग्रेजों के हाथ केवल पवित्र राख लगी।
कैप्टन क्लेमेंट वॉकर हेनीज ने बाद में इस अंतिम दृश्य का विवरण देते हुए डायरी में लिखा था: "हमारा विरोध समाप्त हो चुका था। कुछ ही मिनट पहले तक हथियारों से लैस एक महिला अपने सैनिकों में जान फूँकने का प्रयास कर रही थी, वह बार-बार इशारों से हार रहे सैनिकों का मनोबल बढ़ा रही थी। लेकिन हमारे सैनिक की कटार के एक प्रहार ने सब कुछ समाप्त कर दिया। बाद में हमें ज्ञात हुआ कि वह अदभुत महिला कोई और नहीं, बल्कि स्वयं झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई थी।"
६. महासमर की दुखद फलश्रुति
रानी की शहादत के साथ ही स्वतंत्रता के इस प्रथम महासंग्राम की रीढ़ टूट गई। इसके बाद का इतिहास अत्यंत कारुणिक और विश्वासघात की कहानियों से भरा हुआ है।
* दामोदर राव की कंगाली: लेखिका इरा मुखोटी ने अपनी पुस्तक 'हीरोइंस' में लिखा है कि रानी के पुत्र दामोदर राव ने दो वर्षों तक जंगलों में भटकने के बाद १८६० में अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। अंग्रेजों ने उन्हें बहुत मामूली पेंशन दी। जब ५८ वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ, तो वे पूरी तरह कंगाल हो चुके थे। उनके वंशज आज भी इंदौर में अत्यंत सादगी के साथ रहते हैं और गर्व से स्वयं को 'झाँसीवाले' कहते हैं।
* ग्वालियर का भोज और तात्या की फाँसी: रानी की मृत्यु के ठीक दो दिन बाद, ग्वालियर के तत्कालीन शासक जयाजीराव सिंधिया ने अंग्रेजों की इस विजय की प्रसन्नता में जनरल रोज़ और सर रॉबर्ट हैमिल्टन के सम्मान में एक आलीशान शाही भोज का आयोजन किया। नाना साहब किसी तरह बच निकले, लेकिन रानी के परम मित्र और महान सेनानायक तात्या टोपे को उनके अपने ही घनिष्ठ मित्र नरवर के राजा मानसिंह ने धोखा दे दिया। तात्या टोपे सोते हुए पकड़े गए और उन्हें शिवपुरी लाकर एक पेड़ से सरेआम फाँसी पर लटका दिया गया।
इस प्रकार, विश्वासघात के अँधेरे ने शौर्य के उस स्वर्णिम अध्याय को कुछ समय के लिए ढक दिया। परंतु, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की वह जलती हुई चिता भारत की आत्मा में स्वतंत्रता की ऐसी अलख जगा गई, जो १९४७ में देश के आज़ाद होने तक अनवरत धधकती रही। वे केवल एक राज्य की रानी के रूप में नहीं मरीं, बल्कि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए वीरता का एक शाश्वत पैमाना बन गईं।
