हे श्री जगन्नाथ महाप्रभु!

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


हे श्री जगन्नाथ महाप्रभु!

हे नीलाचलाधिपति,

हे दीनबंधु,

हे जगत के नाथ,

हे अनाथों के आश्रयदाता प्रभु श्री जगन्नाथ!


यदि आपके श्रीचरणों में कभी कुछ तोड़ने की इच्छा हो,

तो मेरे अहंकार को तोड़ दीजिए।

उस गर्व को चूर-चूर कर दीजिए

जो मुझे आपसे दूर ले जाता है,

जो मुझे मेरा नहीं, स्वयं को ही सर्वस्व समझने का भ्रम देता है।


यदि कभी कुछ जलाने का मन हो,

तो मेरे भीतर सुलगते क्रोध को जला दीजिए।

उस अग्नि को भस्म कर दीजिए

जो विवेक को धूमिल करती है,

जो प्रेम को राख में बदल देती है।


यदि कभी कुछ बुझाने का मन हो,

तो मेरे मन की घृणा बुझा दीजिए।

द्वेष, ईर्ष्या, कटुता और प्रतिशोध के उन सभी दीपकों को

सदैव के लिए शांत कर दीजिए

जो आत्मा के आकाश को अंधकारमय करते हैं।


यदि कभी कुछ छीनने का मन हो,

तो मेरे भीतर का मोह छीन लीजिए।

यदि कभी कुछ देने का मन हो,

तो अपनी भक्ति, विनय और करुणा दे दीजिए।


और यदि कभी किसी पर प्रेम बरसाने का मन हो,

तो प्रभु, एक क्षण के लिए मेरी ओर भी देख लीजिए।

आपकी एक कृपादृष्टि ही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य होगी।

आपकी एक मुस्कान ही मेरे समस्त दुःखों का अंत कर देगी।


हे प्रभु!


मैं शब्द हूँ, आप अर्थ हैं।

मैं स्वर हूँ, आप संगीत हैं।

मैं दीप हूँ, आप ज्योति हैं।

मैं लहर हूँ, आप सागर हैं।

मैं अंश हूँ, आप पूर्ण हैं।


आपके बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं।

आपके बिना मेरा ज्ञान अज्ञान है,

मेरा वैभव निर्धनता है,

मेरा जीवन भी एक रिक्तता मात्र है।


मैं शब्द, तुम अर्थ;

तुम बिन मैं व्यर्थ।


मेरे मन को ऐसा बना दीजिए

कि वह हर प्राणी में आपका अंश देख सके।

मेरी वाणी को ऐसा बना दीजिए

कि उससे किसी का हृदय न टूटे।

मेरे कर्मों को ऐसा बना दीजिए

कि वे आपकी सेवा का माध्यम बन जाएँ।


हे श्री जगन्नाथ महाप्रभु!


जब जीवन में सफलता मिले,

तो मुझे विनम्र बनाए रखिए।

जब असफलता मिले,

तो मुझे धैर्य दीजिए।

जब मार्ग कठिन हो,

तो मुझे विश्वास दीजिए।

और जब अंतिम यात्रा का समय आए,

तो मेरी चेतना में केवल आपका नाम रह जाए।


हे करुणासागर प्रभु!


मुझे धन नहीं चाहिए,

यश नहीं चाहिए,

प्रतिष्ठा नहीं चाहिए,

यदि कुछ चाहिए तो केवल इतना कि—


**मेरी आत्मा कभी आपके चरणों से विमुख न हो।**


मुझे सदैव अपने श्रीचरण-कमलों की धूल में स्थान दीजिए।

मेरे अंतर्मन में आपकी भक्ति का दीपक जलता रहे।

मेरी प्रत्येक श्वास आपके स्मरण में बीते,

और मेरा समस्त जीवन आपकी कृपा का प्रसाद बन जाए।


जय श्री जगन्नाथ महाप्रभु!

जय नीलाचलाधिपति!

जय दीनबंधु, भक्तवत्सल प्रभु जगन्नाथ! 🙏