कुरुक्षेत्र का महाघोष

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


॥ कुरुक्षेत्र का महाघोष ॥


हे कुन्तीनन्दन! धर्म-हेतु मैं युग-युग में अवतरता हूँ,

असि-धारा बन दुर्मद दानव का गर्व-हरण मैं करता हूँ।

जब-जब भी इस वसुन्धरा पर म्लान हुई शुचि मर्यादा,

बढ़ा अधर्म-कुहासा जग में, बढ़ा पाप का अतिशय आधा;


तब-तब मेरा विकट रूप भूतल के सम्मुख आता है,

काल-पुरुष का महावज्र बन वज्र-नाद कर जाता है।

परित्राण सन्त का करने को, दुष्टों का मद हरने को,

सृष्टि-पटल पर न्याय-ध्वजा की अमित स्थापना करने को!


सुन पार्थ! मनस्वी योगी वह, जो विचलित कभी न होता है,

मोह-जाल के तिमिर-सिंधु में सुध-बुध अपनी खोता है।

बाणों की शय्या पर भी जो मन को एकाग्र चलाता है,

श्रद्धा की पावक ज्वाला में जो अहंकार जलवाता है;


वही भक्त उत्तम योगी है, वही पुरुष है महाप्राण,

जिसने अपनी इस नश्वर चेतना को सौंप दिया भगवान।

वह मिल जाता है मुझमें ही, जैसे सरिता सागर में,

वह लीन हुआ, संयुक्त हुआ, इस महाकाल के गागर में!


उठ खड़ा हो हे गांडीव-धारी! मत देख सामने कौन खड़ा,

यह महाकाल का चक्रव्यूह, इसमें न कोई छोटा न बड़ा।

ये जितने सम्मुख दीख रहे, वे मरण-शरण को प्राप्त हुए,

तू तो केवल निमित्त मात्र, इनके छल-बल सब समाप्त हुए।

मैं ही संहारक, मैं सृजक, मैं ही अनादि अविकारी हूँ,

पहचान मुझे ऐ पार्थ! मैं ही इस सृष्टि का सूत्रधारी हूँ।


जब क्षमा शिथिल हो जाती है, दानव दानवता लाता है,

जब न्याय मौन हो महलों में, केवल रोना ही पाता है;

तब दया-क्षमा को तजकर मैं, कर में सुदर्शन उठाता हूँ,

भीषण रण के तांडव में ही, मैं सच्ची शांति उगाता हूँ।

मेरा वह विविध स्वरूप देख, थर-थर अंबर कंपायमान,

दुष्टों के लहू से लिखता हूँ, मैं नव-युग का अमिट विधान।


भय-मोह-शोक के बंधनों को, छिन्न-भिन्न तू कर अर्जुन,

इस कुरुक्षेत्र की वेदी पर, निज कायरता की आहुति चुन।

जो फल की चिंता छोड़ सदा, रण-पथ पर बढ़ता जाता है,

सुख-दुःख, लाभ और हानि को, जो एक समान पचाता है;

वही श्रेष्ठ धुरंधर महाबाहु, मेरे प्रकाश को पाता है,

मृत्यु की संकुचित सीमाओं से, वो ऊपर उठ जाता है।


श्रद्धा की प्रज्वलित ज्वाला में, जो निज सर्वस्व सुखाता है,

मन की चंचल तरंगों को, जो एकाग्र कराता है;

वही परम योगी, अविचल भक्त, मुझसे सायुज्य बनाता है,

वह मरणधर्मा होकर भी, साक्षात अमर पद पाता है।

लौट आ पार्थ! मुझमें खो जा, मिट जाए द्वैत का सब कुहासा,

मैं ही आदि, मैं अंत वीर! मैं ही जीवन की परिभाषा!