श्री जगन्नाथ स्तोत्रम्

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


॥ श्री जगन्नाथ स्तोत्रम् ॥


नाथ कहो जगन्नाथ कहो तुम, नीलशैल वासी बनवारी।

दारुब्रह्म अवतार लियो प्रभु, उत्कल गावत मंगलकारी ॥१॥


शंख-क्षेत्र पावन सुखधाम, सुभद्रा-बलभद्र संग राजें।

चक्र सुदर्शन धारी प्रभु तुम, पतितपावन रूप बिराजें ॥२॥


कालीधाम तज नील गगन सम, रत्नसिंहासन शोभित सुहाना।

बड़दाँड रथयात्रा विचरें, संग भक्तन प्रीत पुराना ॥३॥


महाप्रसाद जगन्नाथ को सोहे, चित चोरत अनवसर की क्यारी।

वेद पुरान जिनकी महिमा गायें, गीता-गोविंद अमृत सारी ॥४॥


कुरुक्षेत्र तज पुरी धाम आये, विरह वेदना मिटावन हिय से।

भक्तन हेतु हस्त-पाद हीन भये, करुणासिंधु श्रीज्ञान विभूति से ॥५॥


लक्ष्मीप्राण वल्लभ प्यारे, दासिया बाउरी के दुखहर्ता तुम।

जयदेव की लाज बचाई, भक्त सभी के भाग्य विधाता तुम ॥६॥


'चाका डोला' मंत्र महान, कंठ बसे जो प्राण सँवारे।

हरि बिन और न कोउ उपकारी, मन में ध्यावें हर्ष उभारे ॥७॥


कोटि भानु सम तेज विराजत, संग महालक्ष्मी राजत प्यारी।

नीलाद्रिनाथ नाम तुम्हारा, भजत भाव से बहे सुधा धारा ॥८॥


(फलश्रुति):

जो नित भाव से पाठ करे यह, जगन्नाथ स्तोत्र मधुर गुणकारी।

उसके जीवन में हो आनंद, महाप्रभु कृपा हो अति अपारी ॥