अमृत काल में शिक्षा: अधिकार, सेवा या धंधा?
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
अमृत काल में शिक्षा: अधिकार, सेवा या धंधा?
# "जब परीक्षा से बड़ा संकट व्यवस्था पर भरोसे का हो जाए"
किसी भी सभ्य राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी उसके प्राकृतिक संसाधन, सैन्य शक्ति या विदेशी मुद्रा भंडार नहीं होते। उसकी सबसे बड़ी पूँजी उसके बच्चे और युवा होते हैं। यही कारण है कि शिक्षा को केवल एक प्रशासनिक विभाग नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की आधारशिला माना जाता है। लेकिन जब शिक्षा व्यवस्था स्वयं विद्यार्थियों के लिए तनाव, अनिश्चितता और अविश्वास का स्रोत बनने लगे, तब प्रश्न केवल परीक्षा परिणामों का नहीं रह जाता। तब प्रश्न पूरे शासन तंत्र, जवाबदेही और सार्वजनिक नीति का बन जाता है।
हाल के दिनों में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की मूल्यांकन प्रक्रिया, पुनर्मूल्यांकन शुल्क, डिजिटल उत्तरपुस्तिकाओं में कथित त्रुटियों, पोर्टल की तकनीकी समस्याओं और ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली को लेकर उठे विवादों ने एक गंभीर राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया है। यह बहस केवल इस बात की नहीं है कि कुछ छात्रों के अंक गलत आए या कुछ तकनीकी गड़बड़ियाँ हुईं। असली प्रश्न यह है कि क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे विद्यार्थियों के अधिकारों से अधिक संस्थागत सुविधा और व्यावसायिक सोच के इर्द-गिर्द संचालित होने लगी है?
यदि किसी परीक्षा में मूल्यांकन त्रुटि होती है, तो यह निस्संदेह एक गंभीर प्रशासनिक विफलता है। मानव प्रणाली में गलतियाँ हो सकती हैं, लेकिन उन गलतियों को सुधारने की जिम्मेदारी भी उसी संस्था की होनी चाहिए जिसने गलती की है। ऐसे में यदि छात्रों को अपनी ही उत्तरपुस्तिका देखने, अंकों का सत्यापन कराने या पुनर्मूल्यांकन के लिए अतिरिक्त शुल्क देना पड़े, तो यह स्वाभाविक है कि प्रश्न उठेंगे।
* यह केवल आर्थिक बोझ का प्रश्न नहीं है। यह न्याय के सिद्धांत का प्रश्न है।
* यदि गलती छात्र की नहीं, व्यवस्था की है, तो सुधार का खर्च किसे वहन करना चाहिए?
यह बहस किसी एक बोर्ड या किसी एक सरकार तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है जिसमें शिक्षा धीरे-धीरे सार्वजनिक अधिकार से सेवा और सेवा से उत्पाद में परिवर्तित होती दिखाई देती है। प्रवेश परीक्षाओं से लेकर कोचिंग उद्योग तक, निजी विश्वविद्यालयों से लेकर प्रमाणपत्र आधारित पाठ्यक्रमों तक, शिक्षा का एक बड़ा हिस्सा पहले ही बाजार के प्रभाव में आ चुका है। ऐसे में जब सार्वजनिक संस्थाएँ भी विद्यार्थियों से अपनी त्रुटियों को सुधारने के लिए शुल्क लेने लगें, तो यह चिंता और गहरी हो जाती है।
सीबीएसई के हालिया विवाद में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है—तकनीकी आधुनिकीकरण और प्रशासनिक तैयारी का संबंध।
डिजिटल मूल्यांकन, ऑन-स्क्रीन मार्किंग और ऑनलाइन सत्यापन जैसी व्यवस्थाएँ आधुनिक शिक्षा प्रशासन का आवश्यक हिस्सा हैं। दुनिया भर में ऐसी प्रणालियाँ अपनाई जा रही हैं। समस्या तकनीक नहीं है; समस्या तब उत्पन्न होती है जब तकनीक को पर्याप्त परीक्षण, प्रशिक्षण और पारदर्शिता के बिना लागू किया जाता है।
यदि नई प्रणाली के लागू होने के बाद बड़ी संख्या में शिकायतें आती हैं, यदि छात्रों को अधूरी या गलत उत्तरपुस्तिकाएँ प्राप्त होने की शिकायत करनी पड़ती है, यदि पोर्टल निर्धारित समय पर कार्य नहीं करता, और यदि समय-सीमाएँ बार-बार बदलनी पड़ती हैं, तो यह संकेत है कि कहीं न कहीं कार्यान्वयन में गंभीर कमियाँ रही हैं।
लोकतंत्र में ऐसी स्थितियों का समाधान आलोचना को खारिज करने से नहीं, बल्कि उसे सुनने से होता है। सरकारों का दायित्व केवल नई योजनाएँ घोषित करना नहीं है; उनका दायित्व यह सुनिश्चित करना भी है कि वे योजनाएँ ज़मीनी स्तर पर सुचारु रूप से लागू हों। किसी भी मंत्री, अधिकारी या संस्था की जवाबदेही केवल सफलता के समय नहीं, बल्कि विफलताओं के समय भी परखी जाती है।
यही कारण है कि दुनिया के परिपक्व लोकतंत्रों में कई बार मंत्री प्रत्यक्ष दोषी न होने के बावजूद नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं। यह दंड नहीं, लोकतांत्रिक परंपरा का हिस्सा होता है। भारत में भी अतीत में ऐसी परंपराएँ रही हैं। हालाँकि आज राजनीतिक संस्कृति बदल चुकी है और इस्तीफे अब अपवाद बनते जा रहे हैं।
फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि किसी भी जांच की विश्वसनीयता तभी बढ़ती है जब वह पूर्णतः स्वतंत्र, पारदर्शी और निष्पक्ष दिखाई दे। यदि किसी नई प्रणाली के ठेकों, निविदाओं या प्रशासनिक निर्णयों को लेकर सार्वजनिक प्रश्न उठ रहे हैं, तो उन प्रश्नों का उत्तर तथ्यों और दस्तावेजों के माध्यम से दिया जाना चाहिए। लोकतंत्र में पारदर्शिता ही विश्वास की सबसे बड़ी आधारशिला होती है। इस पूरे प्रकरण का सबसे दुखद पक्ष यह है कि केंद्र में छात्र नहीं, संस्थाएँ और राजनीति आ गई हैं।
जिस छात्र ने पूरे वर्ष मेहनत की, उसके लिए अंक केवल संख्या नहीं होते। वे उसके भविष्य, आत्मविश्वास, प्रवेश अवसरों और कभी-कभी पूरे परिवार की आकांक्षाओं से जुड़े होते हैं। परिणामों में अनिश्चितता, तकनीकी गड़बड़ियाँ और सूचना की अस्पष्टता उसके मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रभाव डालती हैं। इसलिए शिक्षा व्यवस्था को केवल प्रशासनिक दक्षता से नहीं, मानवीय संवेदनशीलता से भी संचालित किया जाना चाहिए।
इसी संदर्भ में औद्योगिक उत्पादन, रोजगार, कौशल विकास और शिक्षा के व्यापक संबंध को भी समझना आवश्यक है। भारत एक युवा राष्ट्र है। आने वाले दशकों में उसकी आर्थिक शक्ति इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने युवाओं को कितनी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल और अवसर उपलब्ध कराता है। यदि शिक्षा व्यवस्था में भरोसा कमजोर पड़ता है, तो इसका प्रभाव केवल परीक्षा परिणामों तक सीमित नहीं रहता; यह पूरे आर्थिक और सामाजिक विकास को प्रभावित करता है।
आज आवश्यकता आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़ने की है। आवश्यकता है कि शिक्षा मंत्रालय, सीबीएसई, विशेषज्ञ संस्थाएँ, अभिभावक संगठन और छात्र प्रतिनिधि मिलकर इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष समीक्षा करें। यदि तकनीकी त्रुटियाँ हुई हैं तो उन्हें स्वीकार किया जाए। यदि प्रशासनिक चूक हुई है तो उसकी जिम्मेदारी तय की जाए। यदि प्रक्रियाएँ छात्रों के लिए बोझिल हैं तो उन्हें सरल बनाया जाए।
क्योंकि शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों की परीक्षा लेना है, उनके धैर्य और विश्वास की नहीं। और किसी भी लोकतंत्र में यह स्वीकार करना चाहिए कि शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्न उठाना सरकार का विरोध नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य की चिंता है।
आखिरकार, एक राष्ट्र की महानता इस बात से नहीं मापी जाती कि उसकी इमारतें कितनी ऊँची हैं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उसके बच्चे अपनी मेहनत के न्यायपूर्ण मूल्यांकन पर कितना भरोसा कर सकते हैं।
