घोटाले बदलते हैं, व्यवस्था नहीं: 1992 से 2026 तक भारत की वित्तीय त्रासदी का इतिहास
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
घोटाले बदलते हैं, व्यवस्था नहीं: 1992 से 2026 तक भारत की वित्तीय त्रासदी का इतिहास
"जब अपराधी लाभ कमाता है, संस्थाएँ चूक जाती हैं और जनता बिल चुकाती है"
भारत स्वयं को 21वीं सदी की सबसे तेज़ गति से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिनता है। हम पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य रखते हैं, वैश्विक निवेश आकर्षित करने की बात करते हैं, और दुनिया को यह विश्वास दिलाने का प्रयास करते हैं कि भारत निवेश के लिए सबसे सुरक्षित और विश्वसनीय गंतव्यों में से एक है।
किन्तु इसी चमकदार कथा के समानांतर एक दूसरी कहानी भी चलती रही है—एक ऐसी कहानी जो हर कुछ वर्षों बाद नए पात्रों, नए नामों और नए आँकड़ों के साथ सामने आती है, लेकिन जिसका कथानक कभी नहीं बदलता।
* 1992 में हर्षद मेहता।
* 2009 में सत्यम।
* 2016 में विजय माल्या।
* 2018 में नीरव मोदी।
* 2022 में एबीजी शिपयार्ड।
* और 2026 में राजेश एक्सपोर्ट्स।
तीन दशक, छह बड़े प्रकरण, हजारों करोड़ रुपये और लाखों प्रभावित नागरिक। प्रश्न यह नहीं है कि घोटाले क्यों हुए। प्रश्न यह है कि "एक ही प्रकार की विफलता बार-बार क्यों दोहराई जाती है?"
# घोटाले नहीं, संस्थागत विफलताओं का इतिहास
भारत में अधिकांश वित्तीय घोटालों का अध्ययन करने पर एक चौंकाने वाला पैटर्न सामने आता है। हर मामले में चार संस्थाएँ मौजूद थीं—
* प्रबंधन (Management)
* ऑडिटर (Auditors)
* नियामक (Regulators)
* निवेशक एवं जनता
लेकिन नुकसान होने के बाद लगभग हर बार एक ही व्यक्ति पकड़ा गया—प्रमोटर। बाकी संस्थाएँ स्वयं को "भ्रमित", "गुमराह" या "जानकारी के अभाव में" बताकर बच निकलती रहीं।
यहीं से समस्या शुरू होती है।
# 1992 : हर्षद मेहता और भारतीय पूँजी बाजार का पहला बड़ा झटका
1992 का प्रतिभूति घोटाला लगभग ₹4000 करोड़ का था। आज के मानकों से यह राशि छोटी लग सकती है, लेकिन उस समय भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह एक भूकंप था। हर्षद मेहता ने बैंकिंग प्रणाली की खामियों, फर्जी बैंक रसीदों और कमजोर निगरानी का लाभ उठाकर शेयर बाजार में कृत्रिम उछाल पैदा किया। प्रश्न यह है—
* यदि बैंक रसीदें फर्जी थीं तो बैंक कहाँ थे?
* यदि लेन-देन असामान्य थे तो आरबीआई कहाँ था?
* यदि शेयरों में अस्वाभाविक तेजी थी तो बाजार नियामक कहाँ था?
इस घोटाले ने पहली बार यह दिखाया कि वित्तीय अपराध केवल अपराधी की वजह से नहीं, बल्कि संस्थागत लापरवाही की वजह से सफल होते हैं।
# 2009 : सत्यम और कॉर्पोरेट भारत का विश्वास संकट
जनवरी 2009 में सत्यम के संस्थापक बी. रामलिंगा राजू ने स्वयं स्वीकार किया कि वर्षों से कंपनी के खातों में हेरफेर किया जा रहा था। करीब ₹7000 करोड़ की वित्तीय अनियमितताएँ सामने आईं। यह केवल एक कंपनी का पतन नहीं था। यह भारतीय कॉर्पोरेट गवर्नेंस मॉडल पर सीधा हमला था। सबसे बड़ा प्रश्न था—
* यदि नकदी अस्तित्व में ही नहीं थी तो ऑडिटर उसे वर्षों तक बैलेंस शीट में कैसे देखते रहे?
* यदि लाभ काल्पनिक था तो स्वतंत्र निदेशक क्या कर रहे थे?
* यदि सब कुछ इतना उत्कृष्ट था तो किसी ने सवाल क्यों नहीं उठाया?
सत्यम ने सिद्ध कर दिया कि कागज़ पर मौजूद लाभ हमेशा वास्तविक नहीं होते।
# 2016 : विजय माल्या और सार्वजनिक बैंकों की विफलता
करीब ₹9000 करोड़ के ऋण। सैकड़ों चेतावनियाँ। लगातार बिगड़ती वित्तीय स्थिति। फिर भी ऋण मिलते रहे।
जब तक कार्रवाई शुरू हुई, तब तक विजय माल्या देश छोड़ चुके थे। इस घटना ने एक अत्यंत असुविधाजनक प्रश्न खड़ा किया— "क्या भारत में बैंक जोखिम का मूल्यांकन करते हैं या प्रभावशाली व्यक्तियों का?"
एक साधारण किसान कुछ हजार रुपये के ऋण के लिए बैंक के चक्कर काटता है। लेकिन हजारों करोड़ रुपये का ऋण बिना पर्याप्त सुरक्षा के कैसे स्वीकृत हो जाता है?
यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है।
# 2018 : नीरव मोदी और निगरानी तंत्र की पराजय
पंजाब नेशनल बैंक के लगभग ₹14000 करोड़ के घोटाले ने भारत की बैंकिंग प्रणाली की कमजोरियों को उजागर कर दिया।
SWIFT संदेश भेजे जाते रहे। गारंटी जारी होती रही। आंतरिक नियंत्रण सोता रहा। ऑडिट होता रहा। लेकिन किसी को कुछ दिखाई नहीं दिया। सब कुछ तब दिखाई दिया जब आरोपी देश छोड़ चुका था। यहाँ भी वही प्रश्न उठता है— "क्या हमारे नियंत्रण तंत्र केवल कागज़ी औपचारिकताएँ हैं?"
# 2022 : एबीजी शिपयार्ड और सार्वजनिक धन की बर्बादी
₹22,842 करोड़।
भारतीय बैंकिंग इतिहास के सबसे बड़े कथित बैंक धोखाधड़ी मामलों में से एक। फॉरेंसिक ऑडिट वर्षों पहले चेतावनी दे चुका था। बैंकों के पास संकेत मौजूद थे। फिर भी कार्रवाई में लंबा विलंब हुआ। अर्थात् समस्या सूचना की कमी नहीं थी। समस्या निर्णय लेने की इच्छा की कमी थी।
# 2026 : राजेश एक्सपोर्ट्स और विश्वास का नया संकट
राजेश एक्सपोर्ट्स कोई साधारण कंपनी नहीं थी। यह फॉर्च्यून ग्लोबल 500 सूची में स्थान प्राप्त कर चुकी थी। सोने के वैश्विक व्यापार में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। 2015 में स्विट्ज़रलैंड की विश्वविख्यात Valcambi रिफाइनरी के अधिग्रहण के बाद इसे भारतीय कॉर्पोरेट सफलता की कहानी माना गया।
फिर SEBI का अंतरिम आदेश आया। रेगुलेटर के अनुसार FY21-FY25 के बीच लगभग ₹15.15 लाख करोड़ के राजस्व को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किए जाने की आशंका व्यक्त की गई।
कंपनी ने आरोपों को अस्वीकार किया है और अंतिम निष्कर्ष अभी शेष है। लेकिन इससे भी बड़ा प्रश्न उभर चुका है। यदि कथित अनियमितताएँ वर्षों तक चलती रहीं तो—
* ऑडिटर कहाँ थे?
* बोर्ड कहाँ था?
* विश्लेषक कहाँ थे?
* निवेश संस्थाएँ क्या देख रही थीं?
* और नियामक को यह सब पाँच वर्ष बाद क्यों दिखाई दिया?
# जनता हर बार क्यों भुगतती है?
यही इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
* घोटालेबाज अक्सर संपत्ति बचा लेते हैं।
* कानूनी प्रक्रिया वर्षों चलती है।
* ऑडिटर समझौते कर लेते हैं।
* अधिकारी सेवानिवृत्त हो जाते हैं।
लेकिन नुकसान किसका होता है?
* निवेशक का।
* पेंशनधारक का।
* बीमाधारक का।
* करदाता का।
* मध्यम वर्ग का।
यानी उस नागरिक का जिसने कोई अपराध नहीं किया। यदि किसी कंपनी में LIC जैसी संस्था निवेश करती है और बाद में गंभीर प्रश्न उठते हैं, तो चिंता केवल शेयर मूल्य की नहीं रहती। वह जनता की बचत और सार्वजनिक विश्वास का प्रश्न बन जाता है।
# समस्या व्यक्ति नहीं, व्यवस्था है
भारत में अधिकांश वित्तीय अपराधों का विश्लेषण बताता है कि समस्या केवल बेईमान व्यक्तियों की नहीं है। समस्या है—
* कमजोर निगरानी
* विलंबित कार्रवाई
* अपर्याप्त जवाबदेही
* ऑडिट की विफलता
* राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव का दबाव
* तथा दंड प्रक्रिया की धीमी गति
जब तक इन संरचनात्मक समस्याओं का समाधान नहीं होगा, तब तक नए नाम आते रहेंगे।
# राष्ट्रहित में क्या किया जाना चाहिए?
* पहला—ऑडिटर और स्वतंत्र निदेशकों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय हो।
* दूसरा—सार्वजनिक धन लगाने वाली संस्थाओं की निवेश समीक्षा पूर्णतः पारदर्शी हो।
* तीसरा—रेगुलेटरी चेतावनियों को सार्वजनिक किया जाए।
* चौथा—बड़े वित्तीय अपराधों के लिए विशेष फास्ट-ट्रैक न्यायाधिकरण बनाए जाएँ।
* पाँचवाँ—धोखाधड़ी सिद्ध होने पर संपत्ति जब्ती और निवेशकों के मुआवज़े की बाध्यकारी व्यवस्था हो।
# विकास का वास्तविक पैमाना
किसी राष्ट्र की महानता केवल उसकी जीडीपी से नहीं मापी जाती। उसकी महानता इस बात से मापी जाती है कि वह अपनी जनता की मेहनत की कमाई की कितनी रक्षा कर पाता है। भारत ने हर्षद मेहता से लेकर राजेश एक्सपोर्ट्स तक बहुत कुछ सीखा है। लेकिन यदि हर दशक में एक नया घोटाला सामने आता है और हर बार वही प्रश्न दोहराए जाते हैं, तो इसका अर्थ है कि हमने घटनाओं को याद रखा, सबक को नहीं।
* राष्ट्रहित का वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि अगला घोटाला कौन करेगा।
* राष्ट्रहित का वास्तविक प्रश्न यह है कि "क्या भारत ऐसी व्यवस्था बना पाएगा जहाँ अगला घोटाला होने से पहले ही पकड़ा जाए?"
क्योंकि किसी भी लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं होती जब अपराधी कानून तोड़ता है। सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है जब संस्थाएँ अपनी जिम्मेदारी निभाना बंद कर देती हैं। और तब कीमत हमेशा जनता को चुकानी पड़ती है।
