05 जून, पर्यावरण दिवस का हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


05 जून, पर्यावरण दिवस का हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं 

प्रकृति : ईश्वर का दृश्य स्वरूप और मानवता की अंतिम शरण

मनुष्य ने सभ्यताएँ बनाई हैं, नगर बसाए हैं, गगनचुंबी इमारतें खड़ी की हैं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का निर्माण किया है, और ब्रह्मांड की गहराइयों तक अपनी दृष्टि पहुँचाई है। किंतु जितना अधिक वह प्रकृति से दूर हुआ है, उतना ही अपने भीतर की शांति से भी दूर होता गया है।


विज्ञान हमें यह बता सकता है कि बीज कैसे अंकुरित होता है, पर वह यह नहीं बता सकता कि एक छोटे-से बीज में विशाल वटवृक्ष बनने का स्वप्न किसने बोया। वह हमें इंद्रधनुष बनने का सूत्र समझा सकता है, पर उसके रंगों में छिपे सौंदर्य का रहस्य नहीं समझा सकता। वह पक्षियों के उड़ने का विज्ञान बता सकता है, पर उनकी उड़ान में समाई स्वतंत्रता का आनंद नहीं माप सकता। यही वह स्थान है जहाँ विज्ञान समाप्त नहीं होता, बल्कि विनम्र हो जाता है; और जहाँ अध्यात्म आरम्भ होता है। भारतीय ऋषियों ने प्रकृति को कभी जड़ पदार्थ नहीं माना। उन्होंने उसे माता कहा, देवता कहा, और अंततः ईश्वर का प्रत्यक्ष स्वरूप माना।


अथर्ववेद में उद्घोष है— "माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" यह पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ।


यह केवल काव्यात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय पर्यावरण-दर्शन का मूल सिद्धांत है। जिस धरती को हम माता मानते हैं, उसका शोषण नहीं करते; उसकी सेवा करते हैं।


इसी प्रकार "ईशोपनिषद्" कहता है— "ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।" अर्थात् यह समस्त जगत ईश्वर से व्याप्त है।


यदि यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर का ही विस्तार है, तो किसी वृक्ष को काटना केवल लकड़ी काटना नहीं है; वह उस दिव्य उपस्थिति के एक रूप को नष्ट करना भी है। किसी नदी को प्रदूषित करना केवल जल को दूषित करना नहीं है; वह जीवन की धारा को कलुषित करना है।


भारतीय संस्कृति में नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं रहीं; वे गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा और कावेरी बनकर मातृरूप में पूजित हुईं। वृक्ष केवल वनस्पति नहीं रहे; वे पीपल, वट और अशोक बनकर आराध्य बने। पर्वत केवल पत्थरों के ढेर नहीं रहे; वे हिमालय बनकर तप, धैर्य और दिव्यता के प्रतीक बने। क्योंकि हमारे पूर्वज जानते थे कि जब तक मनुष्य प्रकृति को पवित्र मानता रहेगा, तब तक वह उसका विनाश नहीं करेगा।


आज मानव इतिहास एक विचित्र मोड़ पर खड़ा है। एक ओर तकनीकी विकास की चकाचौंध है, दूसरी ओर सूखती नदियाँ हैं। एक ओर आर्थिक प्रगति के आंकड़े हैं, दूसरी ओर कटते वन हैं। एक ओर आधुनिकता का अभिमान है, दूसरी ओर प्रदूषित वायु और बदलती जलवायु का संकट है।


* हमने पृथ्वी को संसाधन समझ लिया, जबकि वह संबंध थी।

* हमने जंगलों को केवल लकड़ी माना, जबकि वे हमारी साँसें थे।

* हमने नदियों को जल-भंडार समझा, जबकि वे सभ्यताओं की धड़कन थीं।

* और हमने प्रकृति को जीतने का प्रयास किया, जबकि वास्तव में हमें उसके साथ जीना सीखना था।


सत्य यह है कि मनुष्य प्रकृति के बिना जीवित नहीं रह सकता, पर प्रकृति मनुष्य के बिना भी अपना संतुलन बना सकती है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण कोई राजनीतिक विषय नहीं है, न ही केवल वैज्ञानिक विमर्श। यह मानव अस्तित्व का प्रश्न है। यह हमारे बच्चों के भविष्य का प्रश्न है। यह हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता और हमारी आध्यात्मिक चेतना की रक्षा का प्रश्न है।


जब कोई व्यक्ति एक वृक्ष लगाता है, तो वह केवल पौधा नहीं रोपता; वह भविष्य में छाया, प्राणवायु, वर्षा और जीवन की संभावना रोपता है।


* जब कोई नदी को स्वच्छ रखने का प्रयास करता है, तो वह केवल जल नहीं बचाता; वह आने वाली पीढ़ियों की प्यास बचाता है।

* जब कोई पक्षियों के लिए दाना और जल रखता है, तो वह केवल दया नहीं दिखाता; वह सह-अस्तित्व के धर्म का पालन करता है।

* और जब कोई प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होता है, तब वह वास्तव में ईश्वर के प्रति कृतज्ञ होता है।


आज विश्व पर्यावरण दिवस पर हमें केवल पौधारोपण का संकल्प नहीं लेना चाहिए; हमें दृष्टिकोण बदलने का संकल्प लेना चाहिए।


प्रकृति हमारे लिए नहीं बनी है; हम प्रकृति का एक छोटा-सा हिस्सा हैं।


* हम उसके स्वामी नहीं, उसके संरक्षक हैं।

* हम उसके उपभोक्ता नहीं, उसके उत्तराधिकारी हैं।


और हमें यह पृथ्वी अपने पूर्वजों से विरासत में नहीं मिली; हमने इसे अपनी आने वाली पीढ़ियों से उधार लिया है।


"वृक्षों में वाणी ईश्वर की, नदियों में उसका गान,

पर्वत उसकी धैर्य-छवि, सागर उसका ध्यान।

पुष्पों में उसकी मुस्कान है, पवन में उसका प्यार,

प्रकृति में ही बसता है वह अनंत, अखंड, अपार।"


धरती केवल मिट्टी नहीं, जीवन का आधार, इसके कण-कण में छिपा हुआ है सृष्टा का विस्तार। जो प्रकृति का मान रखे, वही सच्चा ज्ञानी है— क्योंकि पृथ्वी को बचाना ही मानवता की सबसे बड़ी कहानी है।


* यदि प्रकृति बचेगी, तो संस्कृति बचेगी।

* यदि संस्कृति बचेगी, तो सभ्यता बचेगी।

* और यदि पृथ्वी मुस्कुराती रहेगी, तो मानवता का भविष्य भी मुस्कुराता रहेगा।