जब लीक तंत्र की अक्षमता की सज़ा 15 करोड़ निर्दोषों को मिले
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
जब लीक तंत्र की अक्षमता की सज़ा 15 करोड़ निर्दोषों को मिले
परीक्षाओं की शुचिता किसी भी राष्ट्र के भविष्य की नींव होती है, लेकिन जब यह नींव बार-बार दरकने लगे और राज्य अपनी नाकामी को छुपाने के लिए नागरिकों के अधिकारों पर ही बुलडोजर चला दे, तो लोकतंत्र में सवाल पूछना लाजिमी हो जाता है। राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET-UG 2026) के दोबारा आयोजन (Re-exam) के दौरान हुआ पेपर लीक और उसके बाद सरकार द्वारा उठाया गया कदम—देश के प्रशासनिक और नीतिगत दिवालियापन की एक और बानगी पेश करता है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की नाक के नीचे और केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की निगरानी में पेपर लीक हुआ, लेकिन इसकी सज़ा किसे मिली? उन अपराधियों को नहीं जो इस तंत्र को दीमक की तरह चाट रहे हैं, बल्कि देश के 15 करोड़ निर्दोष टेलीग्राम (Telegram) उपभोक्ताओं को, जिन्हें एक झटके में डिजिटल ब्लैकआउट का सामना करना पड़ा।
# कुतर्क की बैसाखियों पर टिकी प्रशासनिक कार्रवाई
सरकार और NTA का यह तर्क कि 'टेलीग्राम पर नकल माफियाओं ने NEET का पर्चा फैलाया, इसलिए पूरे प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगा दिया गया', न केवल हास्यास्पद है बल्कि प्रशासनिक अपरिपक्वता का प्रमाण भी है। यह कुछ वैसा ही है कि किसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर कोई जघन्य अपराध हो जाए, और पुलिस अपराधियों को पकड़ने के बजाय उस पूरी सड़क को ही हमेशा के लिए बंद कर दे। अपराधी तो पगडंडियों और खेतों से रास्ता बनाकर निकल जाएंगे, लेकिन सज़ा उन लाखों राहगीरों को भुगतनी पड़ेगी जिनका जीवन उस सड़क से चलता था।
इस प्रतिबंध की निरर्थकता को रेखांकित करते हुए टेलीग्राम के सीईओ पावेल डुरोव (Pavel Durov) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर स्पष्ट लिखा: "भारत के आईटी मंत्रालय ने टेलीग्राम को सिर्फ इसलिए प्रतिबंधित कर दिया क्योंकि कुछ उपयोगकर्ताओं ने लीक सामग्री साझा की थी। इसने उन इनसाइडर्स (अंदरूनी सूत्रों) को नहीं रोका जिन्होंने पेपर लीक किया, बल्कि 15 करोड़ आम भारतीयों को सज़ा दी। प्रतिबंध से कुछ नहीं रुका, लीक्स दूसरे ऐप्स पर चले गए।"
डुरोव का यह दावा कि टेलीग्राम खुद भारत सरकार के सहयोग से ऐसे सैकड़ों चैनलों को हटा रहा था, यह दर्शाता है कि सरकार के पास संकट से निपटने की न तो कोई दीर्घकालिक रणनीति थी और न ही तकनीकी समझ। यह कार्रवाई 'समस्या के समाधान' से ज्यादा 'जवाबदेही से ध्यान भटकाने' का एक हताश प्रयास प्रतीत होती है।
# संवैधानिक मर्यादा और ताक पर कानून
इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) द्वारा उठाए गए कानूनी सवाल इस पूरे प्रकरण को और गंभीर बनाते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 69A सरकार को विशिष्ट (Specific) और अवैध सामग्री को ब्लॉक करने का अधिकार देती है, न कि पूरे के पूरे संचार माध्यम या प्लेटफॉर्म को ठप करने का। सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक 'श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ' मामले में अभिव्यक्ति की आज़ादी और डिजिटल अधिकारों की सुरक्षा को लेकर यही व्याख्या की थी।
इतना ही नहीं, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) द्वारा टेलीग्राम पर लगाए गए इस प्रतिबंध का मूल आदेश और समीक्षा समिति के तर्क आज भी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। यह गोपनीयता सुप्रीम कोर्ट के ही 'अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ' मामले के दिशा-निर्देशों का खुला उल्लंघन है, जिसमें कहा गया था कि इंटरनेट या किसी प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाने का सरकारी आदेश पारदर्शी और न्यायिक समीक्षा के योग्य होना चाहिए। जो सरकार अपने आदेश को छुपा रही हो, वह न्याय की कसौटी पर कैसे खरी उतर सकती है?
# छात्रों पर दोहरी मार: सपनों की डिजिटल मॉब लिंचिंग
इस प्रतिबंध की टाइमिंग (समय) पर गौर कीजिए। यह प्रतिबंध NEET परीक्षा के ठीक उन आखिरी दिनों में लगाया गया, जब देश के सुदूर इलाकों में बैठे लाखों परीक्षार्थी टेलीग्राम के स्टडी ग्रुप्स, डाउट-क्लियरिंग सेशंस और साझा किए गए पीडीएफ नोट्स पर पूरी तरह निर्भर थे।
* अपराधी सुरक्षित: जिन्होंने पेपर लीक किया, वे तकनीक के माहिर खिलाड़ी हैं, वे तुरंत दूसरे कूटबद्ध (encrypted) ऐप्स पर स्थानांतरित हो गए।
* छात्र असहाय: जो छात्र दिन-रात एक कर के पढ़ रहे थे, उनके वर्चुअल क्लासरूम्स और ग्रुप्स एक झटके में गायब हो गए।
यह किसी एक ऐप के बंद होने का मामला नहीं है। यह बिहार या उत्तर प्रदेश के किसी छोटे शहर या गांव के उस लड़के और लड़की के सपनों का सवाल है, जिसकी माँ ने अपने गहने बेचकर कोचिंग की फीस भरी थी। जब परीक्षा की घड़ी सबसे नज़दीक थी, तब राज्य ने अपराधियों को पकड़ने के बजाय उस छात्र की उम्मीदों का डिजिटल गला घोंट दिया।
# वो सुलगते सवाल, जिनसे बच रही है सत्ता
साल 2024 में भी NEET विवादों के घेरे में रही और अब 2026 में भी इतिहास ने खुद को और बदतर तरीके से दोहराया है। दो साल में दो बार देश की सबसे बड़ी चिकित्सा प्रवेश परीक्षा का तार-तार होना यह साबित करता है कि समस्या 'बाहरी तत्वों' में नहीं, बल्कि 'भीतरी तंत्र' में है।
1. अंदरूनी मिलीभगत पर चुप्पी क्यों? पेपर NTA के मजबूत लॉकरों और सर्वरों से लीक हुआ। टेलीग्राम तो सिर्फ एक डाकिया था, चिट्ठी तो विभाग के भीतर से लिखी गई। उस इनसाइडर का नाम सामने क्यों नहीं आया?
2. नैतिक जवाबदेही कहाँ है? लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में शीर्ष पदों पर बैठे लोग नैतिक जिम्मेदारी लेते हैं। दो बार देश के करोड़ों युवाओं का भविष्य दांव पर लगाने के बाद भी शिक्षा मंत्री अपने पद पर कैसे बने हुए हैं?
3. सज़ा का हक़दार कौन? जो संस्था परीक्षा की शुचिता नहीं बचा सकती, उसे दोबारा परीक्षा कराने का नैतिक अधिकार किसने दिया? और अपराधियों को ढूंढने में नाकाम सरकार 15 करोड़ नागरिकों को सज़ा देकर अपनी पीठ कैसे थपथपा सकती है?
यह महज तकनीक, टेलीग्राम या किसी एक ऐप का सवाल नहीं है; यह इस देश के नागरिकों और राज्य के बीच के सामाजिक अनुबंध (Social Contract) का सवाल है। जब कोई सरकार व्यवस्थागत खामियों को सुधारने के बजाय नागरिक अधिकारों को बंधक बनाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि शासन का इकबाल खत्म हो चुका है। परीक्षा का पर्चा लीक होना प्रशासनिक विफलता है, लेकिन अपराधियों के बदले देश के युवाओं और नागरिकों को सज़ा देना एक वैचारिक और नैतिक अपराध है। इस देश का युवा कागजों पर लीक हो रहे अपने भविष्य को देख रहा है, और इतिहास इस खामोशी और अक्षमता का हिसाब जरूर मांगेगा।
