न्यायिक अनुशासन, यूएपीए और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अग्निपरीक्षा

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


न्यायिक अनुशासन, यूएपीए और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अग्निपरीक्षा

'ज़मानत नियम है और जेल अपवाद'—क्रिमिनल ज्यूरिप्रूडेंस (अपराधिक न्यायशास्त्र) का यह बुनियादी सिद्धांत एक बार फिर देश की शीर्ष अदालत की गलियारों में गूंजा है। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ द्वारा १८ मई को सैयद इफ़्तिख़ार अंद्राबी के मामले में दी गई व्यवस्था और जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर ख़ालिद के प्रकरण पर की गई टिप्पणी ने भारतीय न्यायपालिका के भीतर चल रहे एक गहरे वैचारिक द्वंद्व को सतह पर ला दिया है।

यह घटनाक्रम केवल यूएपीए (UAPA) जैसे कठोर कानून के तहत बंद कुछ आरोपियों की रिहाई का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह कानून के शासन, न्यायिक अनुशासन और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के प्रति शीर्ष अदालत की संस्थागत प्रतिबद्धता की परीक्षा है।

1. न्यायिक अनुशासन बनाम पीठों का अंतर्विरोध

इस पूरे मामले का सबसे गंभीर विधिक पहलू 'न्यायिक अनुशासन' (Judicial Discipline) से जुड़ा है। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने अत्यंत कड़े शब्दों में याद दिलाया कि न्यायशास्त्र का यह स्थापित नियम है कि एक छोटी पीठ (Two-Judge Bench) हमेशा बड़ी पीठ (Three-Judge or Constitution Bench) के फैसलों से बंधी होती है।


* नजीब मामले की नज़ीर: 2021 के ऐतिहासिक भारत संघ बनाम के.ए. नजीब मामले में तीन जजों की पीठ ने स्पष्ट किया था कि यदि मुक़दमे में 'अत्यधिक देरी' हो रही हो, तो यूएपीए की कठोर शर्तों के बावजूद संवैधानिक अदालतें ज़मानत दे सकती हैं।

* जनवरी 2026 का भटकाव: इसके उलट, जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य पीठ ने उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को न केवल ज़मानत देने से इनकार किया, बल्कि उन पर एक साल तक आवेदन करने पर भी रोक लगा दी।

* अदालत का आत्म-मंथन: वर्तमान पीठ का यह कहना कि जनवरी के फैसले के नज़रिए को स्वीकार करना 'कठिन' है, यह दर्शाता है कि सर्वोच्च न्यायालय अपनी ही एक पीठ द्वारा कानून की व्याख्या में की गई विसंगति को सुधारने के प्रति गंभीर है।


2. अनुच्छेद 21 की सर्वोच्चता: यूएपीए से ऊपर संविधान


अक्सर यह दलील दी जाती है कि आतंकवाद या राज्य की सुरक्षा से जुड़े विशेष कानूनों (जैसे यूएपीए) में ज़मानत की शर्तें सामान्य कानूनों से अलग और अत्यंत कठिन होती हैं। यूएपीए की धारा 43D(5) के तहत यदि अदालत को प्रथम दृष्टया आरोप सही लगते हैं, तो ज़मानत नहीं दी जा सकती।


संवैधानिक संतुलन: न्यायपालिका ने बार-बार यह रेखांकित किया है कि कोई भी वैधानिक कानून (Statutory Law) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) से बड़ा नहीं हो सकता।


बिना मुक़दमा शुरू हुए किसी नागरिक को ५ या ६ साल तक सलाखों के पीछे रखना एक तरह से बिना दोषसिद्धि के सजा काटने जैसा है, जो कि त्वरित सुनवाई (Speedy Trial) के अधिकार का हनन है। अदालत का यह रुख साफ करता है कि कानून कितना भी सख्त क्यों न हो, वह प्रक्रियात्मक क्रूरता का औजार नहीं बन सकता।


3. 'गुणात्मक अंतर' और चयनात्मक न्याय का संकट


इस मामले ने एक और गंभीर विमर्श को जन्म दिया है—न्याय की चयनात्मकता। एक ही मामले (दिल्ली दंगा साज़िश) में जब गुलफ़िशा फ़ातिमा और मीरान हैदर जैसी सह-आरोपियों को के.ए. नजीब मामले के आधार पर राहत मिल जाती है, लेकिन उमर ख़ालिद और शरजील इमाम की भूमिका को 'गुणात्मक रूप से अलग' बताकर एक साल के लिए उनके विधिक रास्ते बंद कर दिए जाते हैं, तो न्याय की एकरूपता पर सवाल उठना लाजिमी है। वर्तमान पीठ की टिप्पणियों ने इसी विसंगति पर प्रहार किया है।


## आगे की राह: एक महत्वपूर्ण भूल-सुधार की उम्मीद


अदालत की इस हालिया टिप्पणी को नागरिक अधिकारों के पैरोकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा एक बड़ी वैचारिक जीत के रूप में देखा जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस तरह के मामलों में लंबी कैद को लेकर भारत की लोकतांत्रिक साख पर सवाल उठते रहे हैं।


सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने ही पूर्ववर्ती रुख पर उठाए गए ये सवाल इस बात का संकेत हैं कि न्यायपालिका में आत्म-सुधार की गुंजाइश हमेशा बची रहती है। अब देखना यह होगा कि आने वाले समय में क्या शीर्ष अदालत इस मामले को किसी बड़ी पीठ (Larger Bench) को सौंपकर यूएपीए के तहत लंबे समय से बंद विचाराधीन कैदियों के लिए ज़मानत के नियमों को अंतिम रूप से सुसंगत और मानवीय बनाती है या नहीं। यह निर्णय भविष्य में भारत में नागरिक स्वतंत्रता की दिशा तय करने वाला साबित होगा।