चौथा स्तम्भ या केवल प्रतिध्वनि? पत्रकारिता के अवसान का कड़वा सच

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला


चौथा स्तम्भ या केवल प्रतिध्वनि? पत्रकारिता के अवसान का कड़वा सच

लोकतंत्र के विशाल प्रासाद को थामने वाले चार स्तंभों में से तीन—कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका—को संविधान से शक्ति और वैधता प्राप्त है। लेकिन 'चौथा स्तम्भ' यानी मीडिया, अपनी शक्ति देश के नागरिकों के विश्वास और निष्पक्षता की नैतिक बुनियाद से पाता है। जब यह बुनियाद ही दरकने लगे, तो पूरे लोकतांत्रिक ढांचे का डगमगाना अवश्यंभावी है। आज भारतीय पत्रकारिता जिस चौराहे पर खड़ी है, वहाँ से उठने वाले सवाल किसी एक राजनीतिक दल या सरकार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे पूरी लोकतांत्रिक चेतना को कटघरे में खड़ा करते हैं।


विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (World Press Freedom Index) में 180 देशों के बीच भारत का 159वें से 161वें पायदान के आस-पास बने रहना केवल एक सांख्यिकीय गिरावट नहीं है। यह इस कटु सत्य की आधिकारिक गवाही है कि देश में जनसरोकार की पत्रकारिता वेंटिलेटर पर है।


1. कॉरपोरेट चंगुल और 'गोदी विमर्श' की विद्रूपता


आज की पत्रकारिता का सबसे कड़वा और नग्न सत्य इसका अभूतपूर्व कॉरपोरेटाइजेशन (Corporateization) है। जब मीडिया घराने स्वतंत्र वैचारिक संस्थान न रहकर बड़े औद्योगिक घरानों के मुनाफे का जरिया बन जाएं, तो खबरें 'उत्पाद' और जनसरोकार 'टीआरपी (TRP) का खेल' बन जाते हैं।


* मुद्दों का विचलन: बेरोजगारी, गिरती अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, शिक्षा और ग्रामीण भारत की बदहाली जैसे बुनियादी सवाल मुख्यधारा के विमर्श से गायब कर दिए गए हैं।

* दरबारी संस्कृति: तीखे प्रति-प्रश्न पूछने की जो विधा पत्रकारिता की रीढ़ हुआ करती थी, उसकी जगह अब सत्ता की चारण-वंदना और अंध-समर्थन ने ले ली है। इसी स्थिति ने समाज में 'गोदी मीडिया' जैसे अत्यंत कटु और अपमानजनक शब्दों को जन्म दिया है, जो पूरी बिरादरी की साख पर एक गहरा धब्बा है।


2. सत्ता का संकोच और एकतरफा संवाद का नया मॉडल


लोकतंत्र में जवाबदेही कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्य शर्त है। हालिया वर्षों में शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व द्वारा पारंपरिक, खुली और अनस्क्रिप्टेड प्रेस कॉन्फ्रेंस से लगातार दूरी बनाना एक चिंताजनक प्रवृत्ति है।


# प्रति-प्रश्न का अभाव: सोशल मीडिया, 'मन की बात' या प्रायोजित साक्षात्कारों के जरिए सीधे जनता से जुड़ने का दावा सुनने में आधुनिक लग सकता है, लेकिन यह 'एकतरफा संवाद' (One-way communication) है। लोकतंत्र विज्ञापन से नहीं, जवाबदेही से चलता है। जब तक किसी नीति या दावे को पत्रकारों के तीखे प्रति-प्रश्नों की कसौटी पर न कसा जाए, तब तक उसे पारदर्शी शासन नहीं माना जा सकता। सत्ता का सवालों से यह संकोच ही आलोचकों को यह कहने का अवसर देता है कि सरकार के पास छिपाने के लिए बहुत कुछ है।


3. कानूनी शिकंजा और भय का वातावरण


वैश्विक सूचकांकों में भारत की रैंकिंग गिरने का एक बड़ा और अकाट्य कारण खोजी पत्रकारों और स्वतंत्र आवाजों पर कसता कानूनी शिकंजा है।


* कठोर कानूनों का प्रयोग: मामूली असहमतियों या प्रशासनिक कमियों को उजागर करने पर पत्रकारों के खिलाफ यूएपीए (UAPA), राजद्रोह या मानहानि जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज करना अब एक आम प्रशासनिक चलन बन गया है।

* जमीनी हकीकत: महानगरों के वातानुकूलित स्टूडियो से दूर, देश के छोटे कस्बों और गांवों में ग्राउंड रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार आज सबसे अधिक असुरक्षित हैं। उन्हें न केवल स्थानीय प्रशासन के कोप का भाजन बनना पड़ता है, बल्कि भू-माफिया और अपराधियों से उनकी जान को भी खतरा बना रहता है।


## सूचकांकों का सच: पूर्वाग्रह बनाम आईना


यह तर्क आंशिक रूप से सही हो सकता है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के पैमानों में 'पश्चिमी पूर्वाग्रह' (Western Bias) होता है और उनका सैंपल साइज भारत जैसी विशाल विविधता को पूरी तरह नहीं समेट पाता। लेकिन इस विधिक और तकनीकी तर्क की आड़ में हम अपने भीतर के खोखलेपन को नहीं छुपा सकते। यदि हमारी जमीन साफ होती, तो कोई भी विदेशी सूचकांक हमारी छवि को धूमिल नहीं कर पाता। कड़वा सच यही है कि मुख्यधारा के मीडिया ने खुद ही अपनी साख का सौदा किया है।


## निष्कर्ष और आत्ममंथन


पत्रकारिता का काम सत्ता के लिए 'चीयरलीडर' बनना नहीं, बल्कि समाज के लिए 'वॉचडॉग' (Watchdog) की भूमिका निभाना है। यदि चौथा स्तंभ केवल सत्ता की प्रतिध्वनि बनकर रह जाएगा, तो जनता का सिस्टम पर से विश्वास उठ जाएगा।


यह समय केवल सरकारों को दोष देने का नहीं है, बल्कि यह मीडिया घरानों के लिए आत्ममंथन का और देश के जागरूक नागरिकों के लिए आत्म-चेतना का क्षण है। जब तक समाज विषाक्त और चाटुकार सामग्री का बहिष्कार कर स्वतंत्र पत्रकारिता का आर्थिक और नैतिक संबल नहीं बनेगा, तब तक लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ पतन की ओर अग्रसर रहेगा। सच को स्वीकार करना ही सुधार की पहली सीढ़ी है।