चमकती स्क्रीन की इस चकाचौंध में, दिलों के फासले गहरे हुए हैं,
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
चमकती स्क्रीन की इस चकाचौंध में, दिलों के फासले गहरे हुए हैं,
कि अब इंसान महज़ 'यूज़र' हुआ है, जज़्बातों पर पहरे हुए हैं।
हवा में तैरते हैं लाख संदेश, मगर वो रूह को छूते नहीं हैं,
जो इनबॉक्सों में आकर सो गए, वो ख़त अब जागते-रोते नहीं हैं।
कहाँ वो इंतज़ारों की कशिश थी, कहाँ यह उँगलियों की भागदौड़,
कि अब तो हर इनायत, हर तवज्जो, बनी है एक औपचारिक होड़!
न वो एहसास की गरमाहटें हैं, न वो यादों का कोई कारवां है,
मशीनी वक़्त की इस आंधियों में, परिंदा भावनाओं का धुआँ है।
तुम्हें क्या याद है वो आख़िरी ख़त? जो दिल की धड़कनों ने था लिखा,
मगर इस शोर के बाज़ार में अब, न वो पन्ना बचा, न वो गिला।
बिना आवाज़ के रिश्ते मरे हैं, बिना साए के मंज़र चल रहे हैं,
जिन्हें छूकर कभी रोते थे अपने, वो रिश्ते 'सीन' होकर ढल रहे हैं।
अजब यह दौर है, पहचान गुम है, आदमी बस एक संख्या बन गया है,
मोहब्बत, बेबसी, नाराज़गी सब, महज़ 'नोटिफिकेशन' बन गया है।
इंसान को इंसान से अब रब्त कहाँ है, बस स्क्रीन पर टिकी निगाहें हैं,
अगर नीली न हों ये सुर्ख़ बत्तियाँ, तो सूनी दिलों की हर राहें हैं।
