जब धरती के माथे पर बारूद की धूल जमने लगे

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला


जब

धरती के माथे पर

बारूद की धूल जमने लगे,

और आकाश

धुएँ की काली चादरों में

अपने सितारे खो दे,


जब

मनुष्य की आँखों में

मनुष्य के लिए करुणा नहीं,

केवल संदेह बचे,

और शब्द

प्रार्थना नहीं,

हथियार बन जाएँ—


तब भी

कहीं न कहीं

एक माँ

अपने बच्चे को

धीमे स्वर में

लोरी सुना रही होती है।


वही लोरी

सभ्यता की अंतिम शरण होती है।


घृणा

कभी अचानक नहीं जन्मती,

वह उगती है

अफवाहों की नमी में,

राजनीति की तपिश में,

और

उन हृदयों में

जहाँ संवाद मर चुका होता है।


पहले

मनुष्य

दूसरे मनुष्य को

सुनना छोड़ता है,

फिर समझना,

और अंततः

उसे मनुष्य मानना भी।


युद्ध

सीमाओं पर बाद में आता है,

पहले

वह आत्माओं में उतरता है।


मैंने देखा है

भीड़ को

नारों में बदलते हुए,

चेहरों को

धर्मों में बँटते हुए,

और सच को

चीखते हुए मरते हुए।


लेकिन

मैंने यह भी देखा है—


एक कवि

तानाशाहियों के विरुद्ध

एक पंक्ति लिखता है,

और पूरी सदी काँप उठती है।


एक चित्रकार

रक्तरंजित समय में

शांति का रंग भरता है,

और इतिहास

कुछ देर के लिए

रोना भूल जाता है।


एक बूढ़ा शिक्षक

बच्चों को सिखाता है—

“मनुष्य होना

सबसे बड़ा धर्म है।”


और तभी

अंधेरे के भीतर

कहीं

एक छोटा-सा दीप जल उठता है।


कितनी विचित्र बात है—

घृणा

बहुत शोर करती है,

पर प्रेम

धीरे बोलता है।


हिंसा

तलवार लेकर चलती है,

पर करुणा

नंगे पाँव आती है।


युद्ध

सिंहासन माँगता है,

पर शांति

केवल

एक संवेदनशील हृदय।


आज

जब दुनिया

स्क्रीन की रोशनी में

अंदर से अंधी होती जा रही है,

जब

उँगलियाँ

सत्य से अधिक

झूठ को साझा करती हैं,

तब

सबसे बड़ा साहस

चिल्लाना नहीं,

सुनना है।


सबसे बड़ा प्रतिरोध

नफ़रत नहीं,

संवाद है।


सबसे बड़ी क्रांति

मनुष्य का

फिर से मनुष्य हो जाना है।


आओ,

हम अपने भीतर

एक छोटा-सा आश्रम बनाएँ,

जहाँ

क्रोध आने से पहले

विवेक प्रवेश करे,

और निर्णय लेने से पहले

करुणा।


आओ,

हम बच्चों को

सीमाएँ नहीं,

संसार सिखाएँ।


आओ,

हम धर्मों के बीच

दीवार नहीं,

दीप जलाएँ।


यदि

इस भयावह समय में भी

कोई कविता लिखी जा रही है,

कोई बाँसुरी बज रही है,

कोई स्त्री

अपने आँगन में तुलसी सींच रही है,

कोई मनुष्य

दूसरे मनुष्य के आँसू पोंछ रहा है—


तो समझो,

पृथ्वी अभी जीवित है।


और जब तक

एक भी हृदय में

प्रेम की अंतिम चिंगारी शेष है,

तब तक

घृणा की सबसे विशाल रात भी

मानवता का सूरज

पूरी तरह निगल नहीं सकती।