अंकों का महोत्सव या शिक्षा का भ्रमजाल?

 

अंकों का महोत्सव या शिक्षा का भ्रमजाल?

देश में बोर्ड परीक्षाओं के परिणामों का मौसम फिर लौट आया है। हर तरफ़ 95%, 98%, 99% और “परफेक्ट स्कोर” की चमक बिखरी हुई है। सोशल मीडिया पर मुस्कुराते चेहरे हैं, अख़बारों में टॉपर्स की तस्वीरें हैं, कोचिंग संस्थानों के विज्ञापन हैं और अभिभावकों के भीतर एक विचित्र संतोष कि उनका बच्चा “सफल” हो गया।

लेकिन इस चमक के पीछे एक असहज प्रश्न लगातार खड़ा है—

क्या सचमुच हमारे बच्चे अचानक इतने असाधारण हो गए हैं, या फिर शिक्षा व्यवस्था ने “अंकों” को ही सफलता का पर्याय बना दिया है?


आज स्थिति यह है कि 90 प्रतिशत अंक अब “बहुत अच्छे” नहीं, बल्कि “सामान्य” माने जाने लगे हैं। 95 प्रतिशत लाने वाला छात्र भी असुरक्षित महसूस करता है, क्योंकि उसे पता है कि किसी प्रतिष्ठित कॉलेज की कट-ऑफ उससे भी ऊपर जा सकती है।

यह केवल प्रतिस्पर्धा नहीं; यह एक ऐसा मनोवैज्ञानिक दबाव है जिसने बचपन, सीखने की जिज्ञासा और शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य को धीरे-धीरे निगल लिया है।


## अंक बढ़े हैं, क्या शिक्षा भी बढ़ी है?


यदि ईमानदारी से देखा जाए, तो पिछले कुछ वर्षों में बोर्ड परीक्षाओं के परिणामों में जो “अकल्पनीय उछाल” आया है, वह केवल विद्यार्थियों की प्रतिभा का परिणाम नहीं है। इसके पीछे शिक्षा व्यवस्था की एक गहरी संरचनात्मक राजनीति भी काम कर रही है।


केंद्रीय और राज्य बोर्डों के बीच एक अदृश्य प्रतिस्पर्धा चल रही है। हर बोर्ड यह दिखाना चाहता है कि उसके छात्र अधिक सफल, अधिक मेधावी और अधिक “उच्च प्रदर्शन” वाले हैं। परिणामस्वरूप—


* मूल्यांकन लगातार उदार होता गया,

* मॉडरेशन और ग्रेस मार्क्स सामान्य हो गए,

* प्रश्नपत्रों का स्तर अपेक्षाकृत सरल किया गया,

* और “उच्च परिणाम प्रतिशत” को शिक्षा सुधार का प्रमाणपत्र बना दिया गया।


लेकिन क्या केवल अधिक अंक आ जाना बेहतर शिक्षा का प्रमाण है?


यदि ऐसा होता, तो देश के विश्वविद्यालयों और उद्योगों को बार-बार “स्किल गैप” की शिकायत न करनी पड़ती। वास्तविकता यह है कि आज बड़ी संख्या में विद्यार्थी परीक्षा में उच्च अंक तो ला रहे हैं, पर आलोचनात्मक चिंतन, भाषा कौशल, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और व्यावहारिक समझ के स्तर पर गंभीर चुनौतियाँ बनी हुई हैं।


## शिक्षा नहीं, ‘कट-ऑफ युद्ध’ चल रहा है


इस कृत्रिम अंक-वृद्धि का सबसे बड़ा दुष्परिणाम कॉलेज प्रवेश प्रक्रिया में दिखाई देता है। जब हजारों विद्यार्थी 95 प्रतिशत से ऊपर अंक लाने लगें, तब विश्वविद्यालयों की कट-ऑफ हास्यास्पद स्तर तक पहुँच जाती है। 98%, 99% और कभी-कभी “100 प्रतिशत से अधिक प्रभावी स्कोर” जैसी स्थितियाँ शिक्षा व्यवस्था के भीतर पनप चुके असंतुलन को उजागर करती हैं।


यही वह परिस्थिति थी जिसने कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET) जैसी व्यवस्था को जन्म दिया। उद्देश्य था—बोर्डों के अंकों की असमानता से बाहर निकलकर एक समान अवसर आधारित प्रवेश प्रणाली बनाना। लेकिन भारत में कोई भी परीक्षा बाज़ार से लंबे समय तक बच नहीं पाती।


CUET आते ही कोचिंग उद्योग ने उसे भी एक नए “उत्पाद” में बदल दिया। अब स्कूल शिक्षा के साथ-साथ अलग से CUET की तैयारी, टेस्ट सीरीज़, ऑनलाइन बैच, प्रीमियम कोर्स और लाखों रुपये की कोचिंग फीस एक नया आर्थिक बोझ बन चुकी है।


## शिक्षा या संगठित बाज़ार?


भारत में शिक्षा धीरे-धीरे सार्वजनिक अधिकार से निजी बाज़ार में बदलती जा रही है। स्कूल, कोचिंग, टेस्ट सीरीज़, डिजिटल प्लेटफॉर्म, एड-टेक कंपनियाँ, विश्वविद्यालय और भर्ती परीक्षाएँ—सभी मिलकर एक विशाल आर्थिक तंत्र बना चुके हैं, जहाँ विद्यार्थी “सीखने वाला नागरिक” कम और “ग्राहक” अधिक दिखाई देता है।


अभिभावकों की सबसे बड़ी मजबूरी यही है कि वे इस व्यवस्था की खामियों को समझते हुए भी उससे बाहर नहीं निकल सकते।

उन्हें पता है—


* हर नया एग्जाम एक नया खर्च है,

* हर नई कट-ऑफ एक नया दबाव है,

* और हर नया कोर्स एक नई आर्थिक चुनौती।


फिर भी वे भाग रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि यदि उनका बच्चा इस दौड़ में शामिल नहीं हुआ, तो वह पीछे छूट जाएगा।


यही आधुनिक शिक्षा व्यवस्था का सबसे निर्मम पक्ष है— "यह केवल प्रतिस्पर्धा नहीं पैदा करती, बल्कि असफल हो जाने का स्थायी भय भी पैदा करती है।"


## बच्चे छात्र कम, ‘प्रोजेक्ट’ अधिक बनते जा रहे हैं


आज का विद्यार्थी अक्सर बचपन से ही एक “प्रदर्शन मशीन” में बदल दिया जाता है। स्कूल के बाद कोचिंग, कोचिंग के बाद ऑनलाइन टेस्ट, फिर रैंक, प्रतिशत, तुलना और सोशल मीडिया पर उपलब्धियों का सार्वजनिक प्रदर्शन। धीरे-धीरे शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान नहीं, “स्कोर” बन जाता है।


इस प्रक्रिया में सबसे अधिक नुकसान बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य को होता है। वह स्वयं को अंकपत्र से मापने लगता है। 90 प्रतिशत लाने वाला भी दुखी होता है क्योंकि किसी और के 95 प्रतिशत आए हैं। और जो अपेक्षित अंक नहीं ला पाता, वह स्वयं को असफल मानने लगता है। यह स्थिति केवल शैक्षणिक संकट नहीं; यह सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संकट भी है।


## क्या हम ‘सीखने’ की संस्कृति खो रहे हैं?


सबसे दुखद तथ्य यह है कि इस पूरी दौड़ में शिक्षा का मूल तत्व—जिज्ञासा—धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। बच्चे अब प्रश्न पूछने के लिए नहीं, बल्कि “सही उत्तर याद रखने” के लिए प्रशिक्षित किए जा रहे हैं। पढ़ाई का उद्देश्य समझना नहीं, परीक्षा निकालना बन गया है। और जब शिक्षा केवल परीक्षा में सिमट जाए, तब समाज डिग्रीधारी तो पैदा कर सकता है, लेकिन स्वतंत्र विचारक नहीं।


## अंततः यह दौड़ किसके लिए है?


हर वर्ष परिणाम आते हैं, टॉपर बदलते हैं, कोचिंग संस्थान नए विज्ञापन छापते हैं, विश्वविद्यालय नई कट-ऑफ जारी करते हैं और अभिभावक अपने बच्चों को अगले चरण की दौड़ में धकेल देते हैं।

यह चक्र चलता रहता है।


लेकिन कहीं न कहीं हमें रुककर यह पूछना होगा—

* क्या हम सचमुच शिक्षित समाज बना रहे हैं,

* या केवल एक ऐसा समाज बना रहे हैं जहाँ सफलता का अर्थ प्रतिशत और असफलता का अर्थ अवसाद रह गया है?


आज आवश्यकता इस बात की नहीं कि बच्चे और अधिक अंक लाएँ; आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा व्यवस्था बच्चों को सोचने, समझने, असहमति व्यक्त करने और जीवन के वास्तविक कौशल विकसित करने का अवसर दे।


अन्यथा हर वर्ष की तरह इस बार भी हम परिणामों का उत्सव मनाएँगे, कट-ऑफ पर बहस करेंगे, नई कोचिंग खोजेंगे, और फिर उसी अंतहीन “चूहा दौड़” में शामिल हो जाएँगे— "जहाँ जीतने वाले भी अंततः थके हुए ही दिखाई देते हैं।"