मातृ दिवस विशेष आज की विस्मृत माता मदालसा : वह माँ जिसने पालने को उपनिषद बना दिया

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


मातृ दिवस विशेष 

आज की विस्मृत माता मदालसा : वह माँ जिसने पालने को उपनिषद बना दिया

## मातृत्व, आत्मज्ञान और भारतीय चेतना का दिव्य रहस्य

भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं कि यहाँ राजाओं ने बड़े साम्राज्य बनाए, या ऋषियों ने महान ग्रंथ लिखे। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ ज्ञान केवल आश्रमों में नहीं रहा; वह माँ की गोद तक उतर आया। यहाँ वेद केवल यज्ञशाला में नहीं गूँजे; वे लोरी बनकर पालनों में भी झूले और इस परंपरा की सबसे अद्भुत प्रतीक हैं माता मदालसा।


वे केवल एक रानी नहीं थीं। वे केवल एक ज्ञानी स्त्री भी नहीं थीं। वे उस भारतीय मातृत्व की मूर्ति थीं, जिसने समझ लिया था कि संसार का सबसे बड़ा उपकार बच्चे को भोजन देना नहीं, उसे आत्मा का परिचय देना है। आज भी जब हम उनके उपदेश पढ़ते हैं, तो लगता है मानो कोई माँ अपने शिशु को नहीं, स्वयं मानवता को जगा रही हो।


1. आधुनिक माँ और माता मदालसा का अंतर


आज का समाज बच्चे को पैदा होते ही क्या सिखाता है?


* “तुम्हें सफल बनना है।”

* “सबसे आगे निकलना है।”

* “बहुत पैसा कमाना है।”

* “बड़ा घर लेना है।”

* “प्रतिष्ठा कमानी है।”


यानी जन्म लेते ही बच्चे को संसार की दौड़ में धकेल दिया जाता है।


उसकी तुलना शुरू हो जाती है। उसकी रैंक तय होने लगती है। उसके भविष्य की चिंता उसके वर्तमान को खा जाती है। धीरे-धीरे बच्चा स्वयं को अंक, वेतन और उपलब्धियों में मापना सीख जाता है पर माता मदालसा ने अपने पुत्र को सबसे पहले क्या सिखाया?


 “शुद्धोऽसि रे तात…” “हे पुत्र! तू शुद्ध है।”


सोचिए, कितना बड़ा अंतर है। आज की शिक्षा कहती है — “तू अभी अधूरा है, कुछ बन।”


माता मदालसा कहती हैं “तू पहले से पूर्ण है, स्वयं को पहचान।” यही भारतीय दर्शन का मूल है।


2. “तू शरीर नहीं है” — समस्त अध्यात्म का केंद्र


माता मदालसा का पहला उपदेश है — “पंचात्मकं देहमिदं न तेऽस्ति…” “यह पंचभूतों से बना शरीर तू नहीं है।” यही समस्त वेदान्त का सार है। उपनिषद बार-बार कहते हैं —


* “अहं ब्रह्मास्मि”

* “तत्त्वमसि"

 * “अयमात्मा ब्रह्म” 

अर्थात् मनुष्य केवल शरीर नहीं, शुद्ध चैतन्य है पर आधुनिक सभ्यता ने मनुष्य को शरीर तक सीमित कर दिया।


आज मनुष्य अपने चेहरे से प्रेम करता है, आत्मा से नहीं। वह अपने बैंक-बैलेंस को पहचानता है, अपने स्वरूप को नहीं। वह अपनी जाति, धर्म, भाषा, पद, प्रतिष्ठा को “मैं” मान बैठा है इसीलिए वह हर क्षण भय में जीता है।


* क्योंकि जो शरीर को “मैं” मानेगा, वह मृत्यु से डरेगा।

* जो पद को “मैं” मानेगा, वह अपमान से डरेगा।

* जो धन को “मैं” मानेगा, वह हानि से डरेगा।


माता मदालसा बच्चे को जन्म लेते ही इस अज्ञान से मुक्त कर देना चाहती हैं। वे कहती हैं — “तू शरीर नहीं है।” यह वाक्य केवल दर्शन नहीं, मुक्ति का द्वार है।


3. रोता कौन है?


मदालसा कहती हैं — “न वा भवान् रोदिति…” “तू नहीं रोता, यह शरीर रोता है।”


यह कथन अत्यंत गूढ़ है।


भारतीय दर्शन कहता है कि आत्मा साक्षी है। वह देखती है, पर बँधती नहीं। जैसे आकाश में बादल आते-जाते हैं, पर आकाश भीगता नहीं; वैसे ही सुख-दुःख मन और शरीर में आते हैं, आत्मा में नहीं पर मनुष्य भूल गया कि वह आकाश है। वह स्वयं को बादल समझ बैठा। यही अविद्या है।


भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं — “नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।” आत्मा को कोई काट नहीं सकता, जला नहीं सकता। माता मदालसा उसी सत्य को लोरी बनाकर कह रही हैं।


4. भारतीय मातृत्व : केवल पालन नहीं, चेतना का निर्माण


पशु भी अपने बच्चों को भोजन देते हैं। पक्षी भी अपने बच्चों को उड़ना सिखाते हैं। पर मनुष्य की विशिष्टता क्या है?


* चेतना।

* विवेक।

* आत्मबोध।


भारतीय परंपरा में माँ केवल जैविक जननी नहीं थी; वह प्रथम गुरु थी इसलिए कहा गया — “मातृदेवो भव।”


माँ को देवता इसलिए नहीं कहा गया कि वह केवल जन्म देती है, बल्कि इसलिए कि वह चेतना का द्वार खोल सकती है। भारतीय घरों में पहले लोरियाँ भी आध्यात्मिक होती थीं। “सो जा राजकुमारी…” जैसी लोरियों में भी ईश्वर, करुणा, धर्म, प्रकृति और प्रेम का भाव होता था, क्योंकि भारत जानता था कि बच्चा केवल शब्द नहीं सुनता; वह कंपन ग्रहण करता है।


जिस घर में माँ का मन शांत होता है, वहाँ बच्चे के भीतर भी स्थिरता उतरती है। जिस घर में माँ केवल भय, तुलना और लोभ में जीती है, वहाँ वही ऊर्जा बच्चे में जाती है।


5. भोग और दुःख का रहस्य


माता मदालसा कहती हैं — “दुःखानि दुःखापगमाय भोगान्…” मूर्ख मनुष्य भोगों को सुख मानता है, जबकि ज्ञानी जानता है कि वे अंततः दुःख ही बनते हैं। यह अत्यंत गहरा मनोवैज्ञानिक सत्य है। आधुनिक उपभोक्तावादी सभ्यता का पूरा आधार ही इस भ्रम पर है कि वस्तुएँ सुख देंगी।


* नया मोबाइल।

* नई कार।

* बड़ा घर।

* नई उपलब्धि।


कुछ क्षण के लिए उत्तेजना मिलती है, फिर मन खाली हो जाता है। फिर नई इच्छा जन्म लेती है। यही संसार का चक्र है।


* गौतम बुद्ध ने इसे “तृष्णा” कहा।

* अद्वैत वेदान्त इसे “अविद्या” कहता है।

* पतंजलि इसे “क्लेश” कहते हैं।


माता मदालसा अपने बच्चे को शुरुआत में ही बता देती हैं कि संसार का सुख स्थायी नहीं पर ध्यान दीजिए — वे संसार छोड़ने को नहीं कहतीं। वे मोह छोड़ने को कहती हैं। यह भारतीय अध्यात्म का सबसे बड़ा संतुलन है।


6. स्त्री-देह पर कठोर श्लोक का वास्तविक अर्थ


माता मदालसा के कुछ श्लोक आधुनिक संवेदनाओं को कठोर लग सकते हैं, विशेषतः जहाँ वे स्त्री-देह के प्रति वैराग्य की भाषा बोलती हैं पर इन्हें केवल शाब्दिक स्तर पर नहीं समझना चाहिए।


भारतीय सन्यास परंपरा में देह-वैराग्य का उद्देश्य घृणा पैदा करना नहीं था, बल्कि आसक्ति तोड़ना था। ऋषि जानते थे कि मनुष्य सबसे अधिक देह-मोह में बँधता है। इसलिए वे शरीर की वास्तविकता दिखाकर मोह को तोड़ते थे। यह स्त्री-विरोध नहीं, देहाभिमान-विरोध था। उसी भारत में स्त्री को “शक्ति”, “सरस्वती”, “लक्ष्मी”, “जगदंबा” भी कहा गया।


अतः इन श्लोकों का मर्म है — “शरीर में मत अटक, आत्मा तक पहुँच।”


7. माता मदालसा और गीता का संगम


माता मदालसा का उपदेश और भगवद्गीता एक ही सत्य की दो धाराएँ हैं। गीता कहती है — “योगस्थः कुरु कर्माणि।” अर्थात् आत्मबोध में स्थित होकर कर्म करो।


माता मदालसा भी अंत में अपने पुत्र को राज्य चलाने, प्रजा का पालन करने, दान देने और धर्मपूर्वक शासन करने का आदेश देती हैं। यानी ज्ञान का अर्थ संसार से भागना नहीं है। ज्ञान का अर्थ है — संसार में रहकर भी भीतर मुक्त रहना। कमल की तरह। जो जल में रहता है, पर जल से भीगता नहीं।


8. आज की सबसे बड़ी त्रासदी : आत्मा का विस्मरण


आज मानवता की सबसे बड़ी समस्या आर्थिक नहीं, आध्यात्मिक है।


* मनुष्य के पास साधन बहुत हैं, पर शांति नहीं।

* सूचना बहुत है, पर बोध नहीं।

* मनोरंजन बहुत है, पर आनंद नहीं।


* बच्चे अवसाद में हैं।

* युवा दिशाहीन हैं।

* परिवार टूट रहे हैं।

* संबंध खोखले हो रहे हैं।


क्यों?


क्योंकि मनुष्य ने स्वयं को भूल दिया। माता मदालसा की लोरी आज इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि वह मनुष्य को फिर से स्वयं तक लौटने का निमंत्रण देती है।


9. माँ : पहली गुरु, पहला ब्रह्मद्वार


भारत में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया, पर उससे पहले माँ आती है, क्योंकि वही बच्चे के भीतर पहली ध्वनि डालती है। पहला संस्कार डालती है। पहला भय भी वही देती है, और पहला विश्वास भी।


* यदि माँ बच्चे से बार-बार कहे — “तू निकम्मा है” तो बच्चा भीतर से टूट जाता है।

* यदि माँ कहे — “तू दिव्य है” तो उसकी आत्मा खिलने लगती है।


माता मदालसा अपने पुत्र को यही दिव्यता स्मरण करा रही हैं।


10. अंतिम मर्म : पालना या बाजार?


आज प्रश्न केवल इतना नहीं कि बच्चे क्या पढ़ रहे हैं। प्रश्न यह है कि वे अपने बारे में क्या मान रहे हैं।


* क्या वे स्वयं को केवल उपभोक्ता मान रहे हैं?

* या चेतना का अंश?


आज घरों में पालने कम और बाज़ार अधिक हैं। बच्चे जन्म लेते ही विज्ञापनों के संसार में प्रवेश कर जाते हैं।


माता मदालसा हमें याद दिलाती हैं — "यदि अगली पीढ़ी को बचाना है, तो उन्हें केवल करियर नहीं, करुणा भी देनी होगी।"

* केवल तकनीक नहीं, तत्वज्ञान भी देना होगा।

* केवल प्रतिस्पर्धा नहीं, आत्मबोध भी देना होगा।


# जब लोरी वेद बन जाए


कल्पना कीजिए उस दृश्य की।

रात है। एक माँ अपने शिशु को गोद में झुला रही है और वह कह रही है — “हे पुत्र, तू शुद्ध है। तू शरीर नहीं। तू अमर चेतना है।”


उस क्षण केवल एक बच्चा नहीं सो रहा। मानव सभ्यता का सबसे ऊँचा स्वप्न जन्म ले रहा है।


* काश, फिर से ऐसी माताएँ जन्म लें।

* काश, फिर से घरों में ऐसी लोरियाँ गूँजें।

* काश, बच्चे फिर से स्वयं को केवल नाम और शरीर न समझें।


और शायद जिस दिन ऐसा होगा, उसी दिन संसार में हिंसा थोड़ी कम होगी, लोभ थोड़ा कम होगा, और मनुष्य थोड़ा अधिक मनुष्य हो जाएगा।