भविष्य की भव्य बयानबाजी और वर्तमान की हताशा: संकट में देश की युवा पीढ़ी

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


भविष्य की भव्य बयानबाजी और वर्तमान की हताशा: संकट में देश की युवा पीढ़ी

किसी भी राष्ट्र की नियति उसकी अगली पीढ़ी के कंधों पर टिकी होती है। जब राजनीतिक नेतृत्व मंचों से 'देश के भविष्य' और 'विकसित भारत' की रूपरेखा तैयार करता है, तो उसमें युवा शक्ति का आह्वान सबसे प्रमुख होता है। सत्ताधारी दल अक्सर आने वाले दशकों में देश के कायाकल्प का श्रेय अपनी नीतियों को देता है। परंतु, जब हम इस चमकीले भविष्य के दावों के पीछे छिपे यथार्थ को देखते हैं, तो एक गंभीर और डरावना विरोधाभास सामने आता है। आज देश का सबसे बड़ा और बुनियादी सवाल यह होना चाहिए कि "नीतियों और प्राथमिकताओं के इस दौर में हमारा युवा कहाँ खड़ा है?" क्या वह राष्ट्र-निर्माण का मुख्य घटक है, या वह केवल प्रशासनिक अदूरदर्शिता और व्यवस्थागत विसंगतियों का शिकार बनकर रह गया है?


## संस्थागत पतन और नैतिक जवाबदेही का शून्य


हाल ही में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) में सामने आया प्रश्नपत्र लीक मामला केवल एक परीक्षा की शुचिता का उल्लंघन नहीं है, बल्कि यह हमारी पूरी परीक्षा प्रणाली के सड़ चुके ढांचे का जीवंत प्रमाण है।


* गहरे तंत्र की मिलीभगत: केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की जांच में नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की पेपर सेटिंग कमेटी की सदस्य रहीं शिक्षिका मनीषा मंधारे की संलिप्तता ने यह साबित कर दिया है कि यह किसी बाहरी अपराधी का काम नहीं, बल्कि भीतर से प्रायोजित एक सुसंगत गिरोह (Cartel) का कारनामा है। जो व्यक्ति पांच-छह वर्षों से प्रश्नपत्र तैयार कर रहा हो, उसकी मिलीभगत एक गहरे संस्थागत सड़न की ओर इशारा करती है।

* जवाबदेही से परहेज़: यह विडंबना ही है कि इतने बड़े पैमाने पर लाखों छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ होने के बावजूद शिक्षा मंत्रालय के शीर्ष स्तर से नैतिक आधार पर इस्तीफ़े की कोई पेशकश नहीं की गई। मध्य प्रदेश के कुख्यात 'व्यापमं घोटाले' की यादें आज भी ताज़ा हैं, जहाँ जांच के नाम पर मामले को इस तरह उलझा दिया गया कि अंततः पीड़ितों को न्याय नहीं मिला।


# सबसे दर्दनाक पहलू: इस पूरी त्रासदी का सबसे वीभत्स रूप वह अवसाद है, जिसने कई होनहार छात्रों को आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम उठाने पर मजबूर कर दिया। देश के मुखिया की ओर से इन मौतों पर संवेदना और सांत्वना के दो शब्द न आना यह दर्शाता है कि सत्ता का शीर्ष संवेदनशीलताओं से कितना दूर हो चुका है। सरकार युवाओं को यह भरोसा दिलाने में पूरी तरह नाकाम रही है कि उनका भविष्य सुरक्षित है।


## राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता बनाम राष्ट्रीय संकट


विपक्ष (जिसमें राहुल गांधी सहित तमाम प्रमुख नेता शामिल हैं) जब इस मुद्दे पर सरकार को घेरता है, तो उसे अमूमन एक सामान्य राजनीतिक तू-तू मैं-मैं के रूप में खारिज कर दिया जाता है। सरकार का रवैया हमेशा की तरह रक्षात्मक और उपेक्षापूर्ण है, मानो यह देश के भविष्य का नहीं बल्कि राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई का कोई अखाड़ा हो।


सच्चाई यह है कि पेपर लीक के शिकार बच्चे या उनके अभिभावक किसी एक राजनीतिक दल के 'वोट बैंक' नहीं हैं; वे इस देश का आने वाला कल हैं। यदि विपक्ष इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठा रहा है, तो एक लोकतांत्रिक और उदार सरकार को इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने के बजाय, विपक्ष को साथ लेकर परीक्षा प्रणाली में आमूलचूल सुधार (Systemic Reform) का खाका खींचना चाहिए था। दुर्भाग्य से, पिछले एक दशक से देश यह देख रहा है कि चाहे किसान हों, मजदूर, महिलाएं, आदिवासी या छात्र—जब भी किसी वर्ग ने अपनी पीड़ा को सड़क पर लाया, उसे सहानुभूति के बजाय व्यवस्था के दमन का सामना करना पड़ा।


## डिजिटल सुधारों का भ्रम और ज़मीनी हकीकत: CBSE का नया प्रयोग


प्रतियोगी परीक्षाओं की इस बदहाली के समानांतर हमारी स्कूली शिक्षा भी गंभीर प्रयोगों और विसंगतियों के दौर से गुजर रही है। हाल ही में घोषित केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के 12वीं के नतीजे इस बात का स्पष्ट संकेत हैं।


| मुख्य बिंदु | आंकड़े / विवरण |


| उत्तीर्ण प्रतिशत (वर्तमान वर्ष) | 85.20% |

| उत्तीर्ण प्रतिशत (पिछला वर्ष) | 88.39% (लगभग 3% की 

                                               गिरावट)। |

| जांची गई डिजिटल कॉपियां | 98.67 लाख (ऑन स्क्रीन 

                                                मार्किंग - OSM प्रणाली)। |

| छात्रों की शिकायत। | डिजिटल मूल्यांकन में विस्तृत 

                                                उत्तरों का सही आकलन न होना |

| जन-असंतोष। | सोशल मीडिया पर याचिका के 

                                                  माध्यम से 24 घंटे में 10,000+     

                                                  हस्ताक्षर |


CBSE का दावा है कि ऑन स्क्रीन मार्किंग (OSM) से प्रक्रिया तेज़ और त्रुटिरहित हुई। लेकिन विचारणीय विषय यह है कि "क्या डिजिटल रूप से कॉपियां जांचना इस देश की विविधता और विषमता के साथ न्याय करता है?"


* डिजिटल विभाजन (Digital Divide): एक तरफ जहाँ कुछ विशेषाधिकार प्राप्त छात्रों को 'स्मार्ट क्लास' की विलासिता उपलब्ध है, वहीं दूसरी तरफ देश के एक बड़े हिस्से में स्कूलों में बुनियादी ढांचा तक गायब है। ऐसे में सभी बच्चों के उत्तरों को एक ही डिजिटल लाठी से हांकना कहाँ का न्याय है?

* विशेषज्ञों की चिंता: एनसीईआरटी (NCERT) के पूर्व निदेशक कृष्ण कुमार ने बिल्कुल सही रेखांकित किया है कि इस प्रणाली को बिना पर्याप्त तैयारी और शिक्षकों के गहन प्रशिक्षण के, जल्दबाज़ी में लागू किया गया। परिणाम स्वरूप, कॉपियों के मूल्यांकन की विश्वसनीयता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है।


## बड़ों की भूल, बच्चों का भुगतान 


भारतीय शिक्षा व्यवस्था इस समय दोतरफा मार झेल रही है। एक तरफ पाठ्यपुस्तकों को राजनैतिक एजेंडा पूरा करने और वैचारिक बदलाव का जरिया बना दिया गया है, तो दूसरी तरफ बिना सोचे-समझे किए जा रहे प्रशासनिक प्रयोगों का बोझ बच्चों के कोमल मन पर डाला जा रहा है। स्कूलों में पढ़ाई का गिरता स्तर, कम अनुभवी व अप्रशिक्षित शिक्षकों की फौज और उस पर से तथाकथित 'कोचिंग कल्चर' का जानलेवा दबाव—इन सबने मिलकर स्कूली शिक्षा को एक जुआ बना दिया है।


बारहवीं के खराब परिणाम और परीक्षाओं के लगातार निरस्त होने का सीधा असर अब छात्रों के उच्च शिक्षा (स्नातक) में प्रवेश पर पड़ेगा। नीतियां बनाने वाले वातानुकूलित कमरों में बैठकर अपनी पीठ थपथपा सकते हैं, लेकिन अपनी गलतियों और हड़बड़ी का खामियाजा वे देश की उस पीढ़ी से वसूल रहे हैं, जिसे वे कल का 'कर्णधार' बताते हैं। अगर देश का भविष्य इसी हताशा, अवसाद और अनिश्चितता की बुनियाद पर लिखा जाएगा, तो 'विश्वगुरु' या 'महाशक्ति' बनने का स्वप्न केवल एक खोखला नारा बनकर रह जाएगा। समय आ गया है कि सरकार राजनीति से ऊपर उठकर युवाओं के इस मानसिक और संस्थागत संकट को एक 'राष्ट्रीय आपातकाल' की तरह ले और इसमें सुधार की वास्तविक इच्छाशक्ति दिखाए।