जब कविता से डरने लगे संस्थान

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


जब कविता से डरने लगे संस्थान

किसी शिक्षक पर केवल इसलिए प्राथमिकी दर्ज कर देना कि उसने अपने व्हाट्सऐप स्टेटस पर एक उर्दू कविता साझा की थी, और फिर अदालत को यह कहना पड़े कि उस कविता में न घृणा थी, न हिंसा का आह्वान, न सांप्रदायिक उकसावा — यह घटना केवल एक कानूनी भूल नहीं है। यह हमारे समय की उस गहरी प्रशासनिक और सामाजिक मानसिकता का दर्पण है, जिसमें अभिव्यक्ति को समझने से अधिक नियंत्रित करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।

लोकतंत्र केवल चुनावों से जीवित नहीं रहता। वह भाषा, विचार, कला, व्यंग्य, कविता, असहमति और सांस्कृतिक विविधता की खुली साँसों से जीवित रहता है। जिस दिन राज्य और समाज किसी कविता को “संदेह” की दृष्टि से देखने लगें, उस दिन खतरा केवल किसी एक नागरिक की स्वतंत्रता पर नहीं होता; उस दिन लोकतांत्रिक चेतना की आत्मा घायल होती है।

सबसे भयावह बात यह नहीं कि सोशल मीडिया पर नफ़रत फैलाने वाले लोग मौजूद हैं। हर समाज में अतिवाद और उन्माद के तत्व रहे हैं। सबसे भयावह बात यह है कि अब प्रशासनिक संस्थाएँ भी भाषा और संस्कृति को संदेह की निगाह से देखने लगी हैं। उर्दू कविता, व्यंग्य, आलोचना, राजनीतिक टिप्पणी, इतिहास, नाटक, फिल्म — सब कुछ धीरे-धीरे निगरानी के दायरे में आता जा रहा है।

जब अदालत को यह स्पष्ट करना पड़े कि “सिर्फ एक कविता साझा करना अपराध नहीं हो सकता”, तब यह प्रश्न केवल न्यायपालिका का नहीं रह जाता; यह प्रश्न उस प्रशासनिक विवेक का बन जाता है जो किसी रचना को पढ़ने से पहले उसे “खतरा” मान लेता है।

यहाँ चिंता का विषय केवल एक एफआईआर नहीं है। चिंता का विषय वह मनोविज्ञान है जिसमें पुलिस, शिकायतकर्ता और सत्ता-संरचनाएँ मिलकर यह तय करने लगती हैं कि कौन-सी भाषा “सुरक्षित” है और कौन-सी “संदिग्ध”। और जब ऐसा होने लगता है, तब नागरिकों के भीतर धीरे-धीरे एक अदृश्य भय जन्म लेता है।


वह भय कहता है—

* क्या लिखें?

* क्या पढ़ें?

* क्या साझा करें?

* किस शेर को पसंद करें?

* कौन-सी किताब अलमारी में रखें?

* किस बात पर चुप रहें?

लोकतंत्र का सबसे खतरनाक क्षरण वही होता है, जहाँ सेंसरशिप कानून से पहले मन के भीतर स्थापित हो जाती है। जब नागरिक स्वयं अपने विचारों को व्यक्त करने से डरने लगें, तब राज्य को दमन के लिए हमेशा कठोर कानूनों की भी आवश्यकता नहीं रहती। भय स्वयं सबसे प्रभावी नियंत्रण-तंत्र बन जाता है।

यह घटना इसलिए भी गंभीर है क्योंकि इसमें उर्दू भाषा का प्रश्न निहित है। उर्दू केवल एक भाषा नहीं, भारतीय सांस्कृतिक इतिहास की साझा विरासत है। उसमें ग़ालिब की उदासी है, फ़ैज़ की प्रतिरोध चेतना है, फ़िराक़ की संवेदना है, साहिर की बेचैनी है और कैफ़ी की सामाजिक दृष्टि है। यदि किसी समाज में उर्दू कविता को सहज साहित्यिक अभिव्यक्ति की जगह “संदेहास्पद सामग्री” की तरह देखा जाने लगे, तो यह केवल भाषाई संकट नहीं, सांस्कृतिक स्मृति के क्षरण का संकेत है।👆🏻

और यह भी उतना ही चिंताजनक है कि समाज का एक हिस्सा अब ऐसी कार्रवाइयों को सामान्य मानने लगा है। प्रशासनिक अतिरेक को “देशहित”, “व्यवस्था” या “सतर्कता” के नाम पर स्वीकार करने की आदत धीरे-धीरे लोकतांत्रिक संस्कृति को भीतर से खोखला कर देती है। लोकतंत्र केवल राज्य की संरचना नहीं, नागरिक समाज की संवेदनशीलता पर भी टिका होता है। यदि समाज स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर हो रहे अतिक्रमण के प्रति उदासीन हो जाए, तो संविधान की आत्मा अकेली पड़ जाती है।

विडंबना यह है कि जिस कविता का स्वभाव मनुष्य को अधिक मानवीय बनाना है, उसी कविता से संस्थाएँ असुरक्षित महसूस करने लगें। जबकि इतिहास गवाह है कि कविता ने समाजों को तोड़ा नहीं, उन्हें बचाया है। सत्ता के उन्माद के समय कविता ही मनुष्य के भीतर बची हुई करुणा, प्रतिरोध और विवेक को जीवित रखती है।

दरअसल किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की परिपक्वता का परीक्षण इस बात से नहीं होता कि वह प्रशंसा को कितना सहन करती है; उसका वास्तविक परीक्षण इस बात से होता है कि वह असहमति, व्यंग्य, आलोचना और सांस्कृतिक विविधता के साथ कितना सहज रह पाती है। जो राज्य हर स्वतंत्र आवाज़ में संभावित शत्रु खोजने लगे, वह अंततः अपने ही नागरिकों से भयभीत राज्य बन जाता है।

इसीलिए इस निर्णय का महत्व केवल एक एफआईआर रद्द होने तक सीमित नहीं है। यह निर्णय हमें याद दिलाता है कि भारतीय संविधान नागरिक को केवल बोलने का अधिकार नहीं देता; वह उसे भयमुक्त होकर सोचने, पढ़ने, लिखने और अभिव्यक्त होने का भी अधिकार देता है और किसी भी लोकतंत्र के लिए यह अधिकार केवल कानूनी प्रावधान नहीं, उसकी नैतिक आत्मा होता है।