नई दिल्ली: युद्ध, तेल और भारतीय लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा
लखनऊ देख प्रदीप शुक्ला
युद्ध, तेल और भारतीय लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा
जब किसी लोकतांत्रिक देश का प्रधानमंत्री जनता से यह कहने लगे कि पेट्रोल-डीज़ल कम इस्तेमाल करें, सोना न खरीदें, विदेश यात्राएँ टाल दें, खाने के तेल में कटौती करें और वर्क फ्रॉम होम को अपनाएँ — तब यह केवल सामान्य आर्थिक सलाह नहीं रह जाती। यह उस आने वाले दबाव की सार्वजनिक स्वीकृति बन जाती है, जिसे सत्ता अब पूरी तरह छिपा नहीं पा रही।
भारत आज एक ऐसे भू-राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है जहाँ पश्चिम एशिया का युद्ध केवल दूर कहीं चल रहा सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि भारतीय रसोई, जेब, खेती, परिवहन और अर्थव्यवस्था के भीतर प्रवेश करता हुआ संकट है। यदि होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव लंबे समय तक बना रहता है, यदि तेल की कीमतें लगातार ऊँची रहती हैं, यदि वैश्विक सप्लाई चेन बाधित होती है, तो उसका असर भारत जैसे आयात-निर्भर देश पर गहरा पड़ना लगभग निश्चित है।
और यहीं से असली प्रश्न शुरू होता है— "क्या भारत वास्तव में किसी बड़े आर्थिक दबाव की ओर बढ़ रहा है?"
संभावना को नकारा नहीं जा सकता। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का विशाल हिस्सा आयात करता है। कच्चा तेल, एलएनजी, खाद्य तेल, उर्वरक—इन सबमें बाहरी निर्भरता बहुत अधिक है। यदि युद्ध लंबा चलता है, तो केवल पेट्रोल-डीज़ल ही महंगे नहीं होंगे; खाद, परिवहन, बिजली, हवाई यात्रा, खाद्य पदार्थ, इलेक्ट्रॉनिक्स और रोजमर्रा की वस्तुएँ भी महँगी होंगी। यानी यह संकट “ऊर्जा संकट” भर नहीं रहेगा; यह धीरे-धीरे जीवन-यापन संकट में बदल सकता है, लेकिन इस पूरे परिदृश्य का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष आर्थिक नहीं, राजनीतिक और नैतिक है।
यदि स्थिति इतनी गंभीर थी कि प्रधानमंत्री को स्वयं जनता से उपभोग घटाने की अपील करनी पड़ी, तो फिर यह प्रश्न स्वाभाविक है कि चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान इस संभावित संकट पर खुलकर चर्चा क्यों नहीं हुई? लोकतंत्र में जनता केवल वोट देने वाली भीड़ नहीं होती; वह साझेदार नागरिक होती है। यदि आने वाले समय में कठिनाइयाँ संभावित हैं, तो क्या जनता को पहले से स्पष्ट रूप से तैयार नहीं किया जाना चाहिए था? यही वह बिंदु है जहाँ विपक्ष सरकार पर “जानकारी छिपाने” और “संकट का बोझ जनता पर डालने” का आरोप लगा रहा है।
Rahul Gandhi का यह कहना कि “ये उपदेश नहीं, नाकामी के सबूत हैं”, केवल राजनीतिक हमला नहीं है; वह उस व्यापक असंतोष को अभिव्यक्त करता है जिसमें जनता यह पूछना चाहती है कि आखिर हर संकट में त्याग की अपेक्षा उसी से क्यों की जाती है?
जब आम नागरिक से कहा जाता है कि वह पेट्रोल कम जलाए, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न भी उठता है कि क्या सत्ता स्वयं वैसी सादगी दिखा रही है? क्या चुनावी रैलियाँ, विशाल रोड शो, हेलीकॉप्टरों का व्यापक उपयोग, करोड़ों के प्रचार अभियान और भव्य राजनीतिक आयोजन भी उसी “राष्ट्रीय संयम” के दायरे में आएँगे?
लोकतंत्र में संकट केवल आर्थिक आँकड़ों से नहीं मापा जाता; वह इस बात से भी मापा जाता है कि त्याग का वितरण कितना न्यायपूर्ण है। यदि जनता को लगे कि संकट का बोझ नीचे के वर्गों पर अधिक डाला जा रहा है, जबकि सत्ता और कॉर्पोरेट संरचनाएँ अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं, तो सामाजिक विश्वास कमजोर होने लगता है।
फिर भी इस बहस को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित कर देना पर्याप्त नहीं होगा। वास्तविकता यह है कि दुनिया एक अस्थिर दौर में प्रवेश कर चुकी है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अब पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए नई चुनौती बन गया है। भारत जैसे देशों के सामने कठिनाई यह है कि वे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था भी बने रहना चाहते हैं और साथ ही ऊर्जा सुरक्षा भी बनाए रखना चाहते हैं।
लेकिन अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि केवल आयात आधारित विकास मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रह सकता। यदि हर वैश्विक युद्ध भारत की महंगाई, मुद्रा और बजट को हिला देता है, तो इसका अर्थ है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की आत्मनिर्भरता अब भी अधूरी है।
प्रधानमंत्री द्वारा सोना न खरीदने की अपील भी इसी गहरी चिंता का संकेत है। भारत में सोना केवल गहना नहीं; वह सामाजिक सुरक्षा, सांस्कृतिक परंपरा और निवेश का माध्यम है। जब सरकार जनता से एक साल तक सोना न खरीदने की अपील करती है, तो यह वस्तुतः विदेशी मुद्रा भंडार पर संभावित दबाव की स्वीकारोक्ति भी है।
हालाँकि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अभी भी मजबूत माना जाता है, लेकिन समस्या केवल वर्तमान भंडार की नहीं, भविष्य के दबावों की है। यदि तेल महँगा रहता है, डॉलर मजबूत होता है और आयात बिल लगातार बढ़ता है, तो रुपये पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। यही कारण है कि विशेषज्ञ प्रधानमंत्री के भाषण को “मनोवैज्ञानिक तैयारी” की शुरुआत मान रहे हैं; लेकिन यहाँ एक और गहरा प्रश्न है—
* क्या केवल नागरिकों की आदतें बदलने से संकट टल जाएगा?
* क्या जनता का कम तेल इस्तेमाल करना पर्याप्त होगा, जबकि देश का पूरा आर्थिक ढाँचा आयात-निर्भर बना हुआ है?
असल चुनौती कहीं अधिक संरचनात्मक है। भारत को ऊर्जा नीति, सार्वजनिक परिवहन, कृषि मॉडल, वैकल्पिक ऊर्जा, स्थानीय उत्पादन और उपभोग संस्कृति—सब पर गंभीर पुनर्विचार करना होगा। यदि हर संकट में सरकार को जनता से “कम खर्च करो” कहना पड़े, तो इसका अर्थ यह भी है कि विकास का वर्तमान मॉडल असुरक्षित है।
और शायद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है— "क्या भारत उस दौर में प्रवेश कर रहा है जहाँ “उपभोग आधारित विकास” की जगह “संयम आधारित अर्थव्यवस्था” की चर्चा शुरू होगी?"
विडंबना यह है कि भारतीय सभ्यता ने सदियों तक संतुलित उपभोग, मितव्ययिता और सामूहिक जिम्मेदारी की बात की थी। लेकिन उदारीकरण के बाद का भारत उपभोग, बाजार और निरंतर विस्तार की मानसिकता से संचालित होने लगा। अब वैश्विक संकट भारत को फिर उसी पुराने प्रश्न के सामने खड़ा कर रहे हैं—
विकास क्या केवल अधिक खरीदना और अधिक जलाना है?
या विकास का अर्थ ऐसी व्यवस्था बनाना भी है जो संकट के समय समाज को टूटने न दे?
प्रधानमंत्री की अपील को इसी व्यापक संदर्भ में देखना होगा। यह केवल ईंधन बचाने की सलाह नहीं; यह उस अस्थिर वैश्विक भविष्य की दस्तक है जहाँ ऊर्जा, भोजन, मुद्रा और युद्ध—सब एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं, लेकिन किसी भी लोकतंत्र में जनता केवल अपीलें नहीं सुनना चाहती; वह पारदर्शिता भी चाहती है। यदि कठिन दिन आने वाले हैं, तो नागरिकों को केवल त्याग का संदेश नहीं, बल्कि यह भरोसा भी चाहिए कि सत्ता स्वयं भी उसी त्याग, जवाबदेही और सादगी का पालन करेगी जिसकी अपेक्षा वह जनता से कर रही है।
