विभाजन का ज़हर और स्मृति की राजनीति : “ज़हरखुरानी” के बहाने मनुष्य की टूटती हुई सभ्यता पर एक गहन विमर्श

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


विभाजन का ज़हर और स्मृति की राजनीति : “ज़हरखुरानी” के बहाने मनुष्य की टूटती हुई सभ्यता पर एक गहन विमर्श

भारत-पाक विभाजन केवल इतिहास की एक तारीख नहीं था। वह मनुष्य की सभ्यता पर लगा ऐसा घाव था जिसकी पीड़ा अब भी उपमहाद्वीप की सामूहिक चेतना में रिसती रहती है। 1947 में केवल सीमाएँ नहीं खिंची थीं; मनुष्यों के भीतर बसे भरोसे, साझी संस्कृति, पड़ोस, प्रेम, भाषा और स्मृतियाँ भी दो हिस्सों में बाँट दी गई थीं। इसलिए विभाजन पर लिखा गया महान साहित्य महज़ अतीत का दस्तावेज़ नहीं होता — वह मनुष्य की आत्मा का परीक्षण होता है।

इसी परिप्रेक्ष्य में ज़हरखुरानी को पढ़ना आवश्यक हो जाता है। यह उपन्यास विभाजन को केवल ऐतिहासिक दुर्घटना की तरह नहीं देखता, बल्कि उसे एक दीर्घकालिक मानसिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रक्रिया के रूप में समझता है। निर्मला भुराड़िया की दृष्टि की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वे विभाजन को “घट चुकी घटना” नहीं रहने देतीं; वे दिखाती हैं कि उसका ज़हर आज भी भाषा, राजनीति, मीडिया और सामाजिक संबंधों में घूम रहा है।


## विभाजन : केवल भूगोल का नहीं, मनुष्य का विखंडन


उपन्यास का मूल बोध यही है कि विभाजन का सबसे बड़ा शिकार भूगोल नहीं, मनुष्य था। पड़ोसी अचानक दुश्मन में बदल गया। खेतों की साझी मेड़ें खून की सीमाओं में बदल गईं। स्त्रियाँ “इज़्ज़त” के नाम पर कुओं में कूदने को मजबूर हुईं। बच्चे शरणार्थी बन गए। और सभ्यता, जो सदियों से साथ रहने की प्रक्रिया से बनी थी, कुछ महीनों में बिखर गई।


हिंदी साहित्य में विभाजन की त्रासदी को व्यापक नैतिक गहराई के साथ बहुत कम रचनाओं ने पकड़ा। झूठा सच इसलिए असाधारण है क्योंकि वहाँ विभाजन केवल सांप्रदायिक दंगे नहीं, बल्कि सभ्यता के विघटन का आख्यान बन जाता है। तमस इसलिए महान है क्योंकि वह दिखाता है कि सांप्रदायिकता अचानक पैदा नहीं होती; उसे योजनाबद्ध तरीके से निर्मित किया जाता है — अफवाहों, प्रतीकों, भय और राजनीतिक संचालन के माध्यम से।


निर्मला भुराड़िया इसी परंपरा को आगे बढ़ाती हैं, लेकिन एक नई संवेदनात्मक तीव्रता के साथ। उनके यहाँ विभाजन “घोषणा” नहीं है; वह लाशों से भरी ट्रेनों की धात्विक चीख है। वह कटे हुए शरीरों की दुर्गंध है। वह भूख, भय, बलात्कार, विस्थापन और स्त्री की असुरक्षा का जीवित अनुभव है।


## हिंसा का मनोविज्ञान : जब पहचान अस्त्र बन जाती है


उपन्यास का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह हिंसा को किसी एक समुदाय की बर्बरता की तरह नहीं देखता। वह समझता है कि सांप्रदायिक हिंसा राजनीति और मज़हबी उन्माद के सम्मिलित रसायन से जन्म लेती है।


एक अफवाह दूसरी हत्या को वैधता देती है।

एक लाश दूसरे नरसंहार को नैतिक औचित्य प्रदान करती है।

एक भय पूरे समाज को हिंसक बना देता है।


यही विभाजन का असली मनोविज्ञान था — और शायद आज भी हर सांप्रदायिक राजनीति का आधार यही है।


निर्मला भुराड़िया यह भी समझती हैं कि पहचान-आधारित राजनीति कभी स्थिर नहीं रहती। वह लगातार नए शत्रु पैदा करती है। इसलिए उनके यहाँ केवल हिंदू-मुस्लिम तनाव नहीं, बल्कि शिया-सुन्नी, अहमदिया और जातिगत विभाजन भी दिखाई देते हैं। यह दृष्टि अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताती है कि सांप्रदायिकता का अंतिम लक्ष्य शांति नहीं होता; उसका अस्तित्व ही स्थायी विभाजन पर टिका होता है।


## स्त्री : विभाजन की सबसे मौन पीड़िता


उपन्यास की सबसे मार्मिक परतों में स्त्री-अनुभव शामिल है। विभाजन के साहित्य में अक्सर स्त्री केवल “पीड़िता” के रूप में दर्ज होती रही है, लेकिन यहाँ स्त्री का शरीर स्वयं इतिहास की युद्धभूमि बन जाता है।


“इज़्ज़त बचाने” के नाम पर कुओं में कूदती औरतें केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं हैं; वे उस पितृसत्तात्मक मानसिकता का प्रतीक हैं जिसमें स्त्री की देह समुदाय की “सामूहिक प्रतिष्ठा” में बदल दी जाती है।


मनोहर जैसा चरित्र इसी कारण अत्यंत महत्वपूर्ण हो उठता है। वह दिखाता है कि हिंसा केवल बाहर नहीं होती; वह घरों के भीतर भी पलती है। विभाजन की राजनीति और स्त्री पर नियंत्रण — दोनों एक ही सत्ता-मानसिकता की उपज हैं। यानी सभ्यता केवल “दूसरे समुदाय” से खतरे में नहीं होती; वह अपने भीतर की क्रूरता से भी टूटती है।


## “बसना” : मलबे पर खड़ी मनुष्यता


उपन्यास का “बसना” वाला बिंब अत्यंत गहरा और मानवीय है। विभाजन के बाद मनुष्य केवल नया घर नहीं बनाता; वह अपनी टूटी हुई आत्मा को फिर से जोड़ने की कोशिश करता है।


मंगल भवन केवल एक इमारत नहीं, बल्कि सभ्यता के मलबे पर खड़ी अस्थायी आशा है। वहाँ रहने वाले लोग केवल शरणार्थी नहीं हैं; वे इतिहास से घायल मनुष्य हैं जो फिर से सामान्य जीवन की संभावना तलाश रहे हैं।


यही वह बिंदु है जहाँ उपन्यास केवल त्रासदी का आख्यान नहीं रह जाता; वह मनुष्य की अदम्य जीवटता का दस्तावेज़ भी बन जाता है।


## वर्तमान का भयावह प्रतिध्वनि


“ज़हरखुरानी” की सबसे बेचैन कर देने वाली विशेषता यह है कि वह इतिहास को संग्रहालय में बंद नहीं करती। वह लगातार वर्तमान की ओर संकेत करती रहती है।


टीवी स्टूडियो की उत्तेजक बहसें, सोशल मीडिया की संगठित नफ़रत, धार्मिक पहचान का उन्मादी प्रदर्शन, भीड़ की नैतिकता, इतिहास को युद्धभूमि में बदलती राजनीति — यह सब उपन्यास में वर्णित उसी पुराने ज़हर की नई अभिव्यक्तियाँ प्रतीत होती हैं।


और यही इसकी सबसे बड़ी वैचारिक शक्ति है। उपन्यास चेतावनी देता है कि सभ्यताएँ अचानक नहीं टूटतीं।

वे पहले भाषा में टूटती हैं।

फिर स्मृति में।

फिर पड़ोस में।

फिर राजनीति में।

और अंततः मनुष्य के भीतर।


## मीडिया, स्मृति और आधुनिक सांप्रदायिकता


आज का समय विभाजन की स्मृतियों के पुनरुत्पादन का भी समय है। आधुनिक मीडिया, विशेषकर दृश्य मीडिया और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म, कई बार इतिहास को समझने का माध्यम कम और भावनात्मक उन्माद का औजार अधिक बन जाते हैं।


वायरल वीडियो, आधे-अधूरे इतिहास, उत्तेजक भाषण और लगातार निर्मित “हम बनाम वे” की मानसिकता समाज को धीरे-धीरे संवेदनहीन बनाती है। विभाजन की त्रासदी हमें यह सिखाने के लिए पर्याप्त थी कि नफ़रत अंततः सभी को नष्ट करती है। लेकिन विडंबना यह है कि आधुनिक राजनीति अक्सर उसी त्रासदी को नए प्रतीकों और नए नारों के साथ पुनर्जीवित करती दिखाई देती है।


# अंततः…


ज़हरखुरानी केवल विभाजन पर लिखा गया उपन्यास नहीं है; वह मनुष्य की स्मृति, हिंसा और सभ्यता पर लिखा गया गहरा नैतिक दस्तावेज़ है। वह हमें केवल अतीत नहीं दिखाता; वह वर्तमान की धड़कनों को सुनने की चेतावनी देता है।


सबसे भयावह बात यह नहीं कि इतिहास दोहराया जा सकता है।

सबसे भयावह बात यह है कि इतिहास कई बार सामान्य जीवन की भाषा में लौटता है — टीवी बहसों में, चुनावी नारों में, वायरल घृणा में, और उस चुप्पी में जहाँ समाज धीरे-धीरे नफ़रत को सामान्य मानने लगता है।


और शायद यही कारण है कि विभाजन का साहित्य आज भी प्रासंगिक है — क्योंकि वह हमें केवल यह नहीं बताता कि मनुष्य ने क्या खोया था, बल्कि यह भी पूछता है कि क्या हम फिर वही खोने की ओर बढ़ रहे हैं।