ये महंगाई नहीं, राष्ट्रनिर्माण योजना हैं

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


ये महंगाई नहीं, राष्ट्रनिर्माण योजना हैं 

कुछ लोग इसे महंगाई कह रहे हैं। कुछ इसे जनता की जेब पर हमला बता रहे हैं। कुछ पुराने लोग तो इसे “आर्थिक संकट” तक कहने लगे हैं। लेकिन यह सब बहुत सतही दृष्टि है। दूरदर्शी नागरिक जानते हैं कि पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती कीमतें केवल ईंधन की कीमत नहीं बढ़ा रही हैं — वे भारत को 2047 तक एक अनुशासित, पर्यावरण-सचेत, फिट और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने की राष्ट्रीय योजना का हिस्सा हैं।

यानी जिसे लोग “बोझ” समझ रहे हैं, वह दरअसल “विकास” है।

और जिसे जनता कराहते हुए भुगत रही है, वही सत्ता की दृष्टि में भविष्य की पहली ईंट है।

पिछले कई वर्षों से देश को बताया जा रहा था कि सरकार ने “मास्टरस्ट्रोक” लगाए हैं। अब स्पष्ट हो गया है कि वे केवल ट्रेलर थे। असली मास्टरस्ट्रोक तो तब आया जब जनता के लिए निजी वाहन चलाना ही विलासिता बन गया। अब लोग हर 500 मीटर पर बाइक या कार निकालने के बजाय पैदल चलने लगे हैं। यह केवल मजबूरी नहीं — यह फिटनेस क्रांति है। सरकार ने बिना कोई योगा ऐप चलवाए, पूरे देश को कार्डियो ज़ोन में बदल दिया।


पहले लोग कहते थे, “चलो कार से निकलते हैं।”

अब कहते हैं, “चलो छत पर टहल लेते हैं।”

पहले प्रेमी बाइक पर 50 किलोमीटर घूमते थे।

अब पार्क में बैठकर राष्ट्र, नीति और कर के बोझ पर गंभीर चर्चा कर रहे हैं। इससे अधिक संयमित समाज और क्या होगा?


अर्थशास्त्रियों को शायद अभी समझ नहीं आ रहा, लेकिन यह एक बहुआयामी नीति है। ईंधन महंगा होगा, तो अनावश्यक यात्रा कम होगी। अनावश्यक यात्रा कम होगी, तो प्रदूषण घटेगा। प्रदूषण घटेगा, तो तापमान पर असर पड़ेगा। तापमान पर असर पड़ेगा, तो जीवन की कठिनाइयाँ बढ़ेंगी। और कठिनाइयाँ बढ़ेंगी, तो लोग और अधिक सहनशील, और अधिक राष्ट्रवादी, और अधिक मौन हो जाएँगे। यही तो अंततः स्थिर शासन का आधार होता है।


वैज्ञानिक वर्षों से समझाते आए हैं कि जीवाश्म ईंधन जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है, जलवायु संकट गहराता है और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर बोझ बढ़ता है। सरकार ने इस वैज्ञानिक चेतावनी को शब्दों में नहीं, व्यवहार में लिया। जनता को ईंधन महंगा करके वास्तव में पर्यावरण बचाने की प्रेरणा दी जा रही है। यह वही दृष्टि है जिसमें समस्या का समाधान जनता की आदतें बदलना नहीं, बल्कि उसकी क्रय-शक्ति बदल देना है। बेहद मौलिक नीति।


स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी यह एक मौन क्रांति है। जब लोग कम वाहन चलाएँगे, अधिक चलेंगे, सीढ़ियाँ चढ़ेंगे, बाजार के लिए पाँच बार सोचेंगे और हर छोटी यात्रा को टालेंगे, तो ब्लड प्रेशर, डायबिटीज़ और हृदय-सम्बंधी समस्याओं पर परोक्ष नियंत्रण होगा। सच पूछिए तो ईंधन की बढ़ती कीमतें एक तरह की जन-स्वास्थ्य परियोजना हैं — महँगी, कठोर, लेकिन अत्यंत प्रभावी।


परिवारों में भी परिवर्तन देखिए। पहले बच्चे कार में घूमना चाहते थे। अब वे पूछते हैं, “पापा, आज बस से चलेंगे?”

पहले घरों में चर्चा होती थी कि कहाँ घूमा जाए।

अब चर्चा होती है कि खर्च कैसे काटा जाए।

इससे बच्चों में बचपन से ही वित्तीय अनुशासन, त्याग और प्रबंधन-क्षमता विकसित हो रही है। यह वही संस्कार है जिसके लिए बड़े-बड़े पाठ्यक्रम बनाए जाते हैं।


और हाँ, एक और फायदा है। अब लोग बेवजह लंबी ड्राइव पर नहीं जाते। इससे समय बचता है, ईंधन बचता है, सड़कें बचती हैं, और सबसे महत्वपूर्ण — बहस बचती है। क्योंकि जब बहस कम होगी, तो जीवन शांत होगा। और जब जीवन शांत होगा, तो शासन और अधिक शांतिपूर्वक चल सकेगा। यह एक व्यवस्थित नागरिकता निर्माण है।


कुछ लोग सवाल करते हैं कि जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल सस्ता हो रहा है, तब घरेलू दाम क्यों बढ़ रहे हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि राष्ट्रनिर्माण हमेशा सीधी गणित से नहीं चलता। कभी-कभी उसमें उल्टी गणित, तिरछी गणित और जनता की सहनशीलता की गणित भी शामिल होती है। विकास वही है, जिसमें आंकड़े ऊपर और नागरिक नीचे की ओर जाएँ।


अंत में, यह समझना ज़रूरी है कि हर महंगाई विरोध वास्तव में प्रगति-विरोध नहीं है? क्या हम ऐसे देश को नहीं चाहते जहाँ लोग कम चलें, कम उड़ें, कम घूमें, कम जलाएँ, अधिक सोचें, अधिक सहें और अधिक अनुशासित हों? अगर नहीं, तो फिर यह कैसे स्वीकार किया जाए कि पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें नहीं बढ़ीं — हमारी नागरिकता की परिपक्वता बढ़ाई गई है।


2047 तक जब भारत को “विकसित” और “प्रदूषण-मुक्त” घोषित किया जाएगा, तो इतिहास यह नहीं लिखेगा कि यह परिवर्तन किसी भाषण, नारे या पोस्टर से आया। वह लिखेगा कि देश को बदलने में सबसे बड़ा योगदान उन पेट्रोल पंपों का था, जहाँ हर लीटर के साथ नागरिकता, फिटनेस, पर्यावरण और धैर्य का नया पाठ पढ़ाया गया।


मशहूर है कि इतिहास विजेताओं द्वारा लिखा जाता है। इस बार शायद वह पेट्रोल पंपों की रसीदों पर लिखा जाएगा।