अच्छे दिन” से “कठिन प्रश्नों” तक : बारह वर्षों बाद लोकतंत्र का आत्ममंथन
“अच्छे दिन” से “कठिन प्रश्नों” तक : बारह वर्षों बाद लोकतंत्र का आत्ममंथन
16 मई 2014 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक निर्णायक दिन था। देश ने भारी बहुमत के साथ एक नए राजनीतिक नेतृत्व को स्वीकार किया था। उस दिन किया गया एक छोटा-सा संदेश — “India has won! अच्छे दिन आने वाले हैं” — केवल एक ट्वीट नहीं था; वह करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं, अधूरी उम्मीदों और परिवर्तन की सामूहिक चाह का प्रतीक बन गया था।
उस समय देश भ्रष्टाचार के आरोपों, आर्थिक सुस्ती, महँगाई और नीतिगत अनिश्चितता से जूझ रहा था। जनता एक ऐसे नेतृत्व की तलाश में थी जो निर्णायक हो, प्रभावशाली हो और भारत को वैश्विक मंच पर नई पहचान दे सके। बारह वर्षों बाद स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठना लोकतंत्र का अधिकार भी है और आवश्यकता भी — क्या वे “अच्छे दिन” वास्तव में आए?
यह प्रश्न केवल किसी एक नेता या दल का मूल्यांकन नहीं है; यह उस लोकतांत्रिक यात्रा का आत्ममंथन है जिसमें जनता अपने ही फैसलों के परिणामों को परखती है।
इन वर्षों में भारत ने निस्संदेह कई बड़े परिवर्तन देखे। डिजिटल क्रांति ने शासन और अर्थव्यवस्था का चेहरा बदला। राजमार्गों, रेलवे, मोबाइल इंटरनेट, UPI और आधारभूत संरचना में व्यापक विस्तार हुआ। भारत की अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक उपस्थिति मजबूत हुई। कोविड महामारी के दौरान मुफ्त राशन और बड़े टीकाकरण अभियान जैसे प्रयासों को व्यापक स्तर पर सराहा गया।
लेकिन इसी समानांतर एक दूसरा भारत भी विकसित हुआ — वह भारत जो लगातार महँगाई, बेरोज़गारी, सामाजिक ध्रुवीकरण और आर्थिक असमानता की चिंता से घिरा रहा।
पेट्रोल, डीज़ल और गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमतों ने मध्यम और निम्न वर्ग की घरेलू अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डाला। युवाओं के बीच रोजगार को लेकर असुरक्षा बढ़ी। प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं और पेपर लीक ने व्यवस्था के प्रति विश्वास को चोट पहुँचाई। किसान आंदोलन ने यह स्पष्ट किया कि विकास और नीति निर्माण के प्रश्न केवल संसद के भीतर नहीं, बल्कि खेतों और सड़कों पर भी तय होते हैं।
अग्निवीर योजना, निजीकरण, मीडिया की स्वतंत्रता, मणिपुर हिंसा, सामाजिक तनाव और संस्थाओं की निष्पक्षता जैसे विषयों पर लगातार बहसें होती रहीं। लोकतंत्र में यह बहसें अस्वाभाविक नहीं हैं; बल्कि यही उसकी जीवंतता का प्रमाण हैं। लेकिन चिंता तब उत्पन्न होती है जब संवाद की जगह आरोप, असहमति की जगह शत्रुता और आलोचना की जगह प्रचार हावी होने लगे।
भारत का लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने से मजबूत नहीं होता; वह तब मजबूत होता है जब सरकार आलोचना को सुन सके, संस्थाएँ निष्पक्ष बनी रहें और नागरिक बिना भय के प्रश्न पूछ सकें।
आज देश में एक बड़ा वर्ग यह महसूस करता है कि विकास का लाभ समान रूप से वितरित नहीं हुआ। आर्थिक वृद्धि के आँकड़ों के बीच बेरोज़गारी और महँगाई की वास्तविकता आम नागरिक के जीवन को प्रभावित करती रही। यही कारण है कि “अच्छे दिन” का नारा अब केवल एक राजनीतिक वाक्य नहीं, बल्कि जनता की अपेक्षाओं और निराशाओं के बीच खड़ा एक प्रतीक बन चुका है।
किन्तु इस पूरे विमर्श में एक और महत्वपूर्ण पक्ष है — लोकतंत्र में जनता की भूमिका। लोकतंत्र केवल नेताओं से प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं देता; वह नागरिकों से भी विवेकपूर्ण निर्णय, तथ्यपरक सोच और सामाजिक जिम्मेदारी की अपेक्षा करता है। यदि राजनीतिक विमर्श केवल कटुता, उपहास और भावनात्मक ध्रुवीकरण तक सीमित हो जाए, तो वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
आज भारत को केवल राजनीतिक विजय की नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास की आवश्यकता है। देश को ऐसे लोकतांत्रिक वातावरण की आवश्यकता है जहाँ:
* बेरोज़गारी पर गंभीर संवाद हो,
* शिक्षा और स्वास्थ्य प्राथमिकता बनें,
* किसान और श्रमिक केवल चुनावी प्रतीक न रहें,
* मीडिया स्वतंत्र रह सके,
* और संस्थाएँ जनता के विश्वास को पुनः मजबूत कर सकें।
क्योंकि अंततः किसी भी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि विशाल विज्ञापन अभियान नहीं होती; उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि वह नागरिक होता है जो अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त महसूस करे।
बारह वर्षों बाद भारत एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है।
यह समय केवल उपलब्धियों का उत्सव मनाने या असफलताओं की सूची बनाने का नहीं, बल्कि यह पूछने का है कि क्या लोकतंत्र का मूल उद्देश्य — समान अवसर, गरिमा और न्याय — वास्तव में आम नागरिक तक पहुँचा है?
“अच्छे दिन” यदि केवल सत्ता के गलियारों तक सीमित रह जाएँ और आम आदमी के जीवन में संघर्ष ही स्थायी वास्तविकता बन जाए, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे नारों का उत्सव और जनता की निराशा का दस्तावेज़ बन जाता है। और किसी भी राष्ट्र के लिए इससे बड़ा आत्ममंथन शायद कोई नहीं।
