जब खिलाड़ी से बड़ी हो जाए व्यवस्था : विनेश फोगाट प्रकरण, खेल संस्थाओं की विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक जवाबदेही का संकट
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
जब खिलाड़ी से बड़ी हो जाए व्यवस्था : विनेश फोगाट प्रकरण, खेल संस्थाओं की विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक जवाबदेही का संकट
किसी भी राष्ट्र का चरित्र केवल उसकी संसद, न्यायपालिका या सरकार से नहीं पहचाना जाता। उसका चरित्र इस बात से भी पहचाना जाता है कि वह अपने खिलाड़ियों, वैज्ञानिकों, शिक्षकों, कलाकारों और असहमति रखने वाले नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है।
खेल केवल पदक जीतने का माध्यम नहीं होते। वे किसी राष्ट्र की सामूहिक आकांक्षा, परिश्रम और गौरव का प्रतीक होते हैं। इसलिए जब किसी खिलाड़ी का संघर्ष खेल के मैदान से निकलकर अदालतों, प्रशासनिक आदेशों और संस्थागत विवादों तक पहुँच जाता है, तब मामला केवल खेल का नहीं रह जाता; वह व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न बन जाता है।
विनेश फोगाट का मामला आज इसी कारण राष्ट्रीय विमर्श का विषय है। यहाँ सबसे पहले तथ्यों को स्पष्ट रूप से समझना आवश्यक है। विनेश फोगाट भारत की सबसे सफल महिला पहलवानों में से एक रही हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व किया, राष्ट्रमंडल खेलों, एशियाई खेलों और विश्व प्रतियोगिताओं में पदक जीते तथा भारतीय महिला कुश्ती को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उनका नाम केवल उपलब्धियों के कारण नहीं, बल्कि भारतीय कुश्ती प्रशासन से टकराव के कारण भी सुर्खियों में रहा।
यही वह पृष्ठभूमि है जो वर्तमान विवाद को साधारण चयन विवाद से कहीं अधिक गंभीर बनाती है। यदि किसी खिलाड़ी और खेल महासंघ के बीच पहले से संघर्ष का इतिहास मौजूद हो, यदि उस खिलाड़ी ने खेल प्रशासन के खिलाफ सार्वजनिक आंदोलन का नेतृत्व किया हो, यदि अदालतों को बार-बार हस्तक्षेप करना पड़ा हो, तो उसके बाद महासंघ द्वारा लिया गया प्रत्येक निर्णय स्वाभाविक रूप से अधिक कठोर सार्वजनिक जांच के दायरे में आता है।
यहीं से प्रश्न शुरू होता है। क्या जो कुछ हो रहा है वह केवल नियमों का अनुपालन है? या नियमों का ऐसा उपयोग है जिससे परिणाम पहले से तय हो जाए? लोकतंत्र और संस्थागत प्रशासन का एक मूल सिद्धांत है—"न्याय केवल होना नहीं चाहिए, न्याय होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।"
यदि कोई संस्था नियमों के भीतर रहते हुए भी ऐसा निर्णय लेती है जिससे निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न हो, तो उसकी वैधता कमजोर पड़ने लगती है। विनेश फोगाट के मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह नहीं है कि अदालत ने क्या कहा या महासंघ ने कौन-सा नियम लागू किया।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि देश का एक बड़ा वर्ग यह मानने लगा है कि खिलाड़ी और संस्था के बीच संबंध सामान्य नहीं रह गए हैं। और किसी भी खेल व्यवस्था के लिए इससे बड़ी विफलता कोई नहीं हो सकती।
खेल प्रशासन की पहली जिम्मेदारी प्रतिभा की रक्षा करना होती है। दूसरी जिम्मेदारी निष्पक्ष चयन सुनिश्चित करना होती है। और तीसरी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना होती है कि खिलाड़ी को यह महसूस न हो कि उसके साथ किसी व्यक्तिगत, राजनीतिक या प्रशासनिक कारण से भेदभाव किया जा रहा है।
यदि एक खिलाड़ी को बार-बार अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़े, तो यह केवल उस खिलाड़ी की समस्या नहीं है; यह खेल प्रशासन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न है।
इस पूरे विवाद में एक और महत्वपूर्ण पक्ष है— "पत्रकारिता" का।
समाचार माध्यमों का कार्य केवल सरकारी आदेशों, महासंघों के प्रेस नोटों या अदालत की टिप्पणियों को प्रकाशित करना नहीं है। उनका कार्य उन प्रश्नों को भी सामने लाना है जो आधिकारिक दस्तावेज़ों के पीछे छिपे होते हैं।
यदि किसी निर्णय का व्यावहारिक परिणाम यह हो कि एक प्रमुख खिलाड़ी प्रतियोगिता से बाहर हो जाए, तो पत्रकारिता का दायित्व केवल आदेश पढ़ना नहीं, बल्कि उसके प्रभावों की पड़ताल करना भी है।
लोकतांत्रिक समाज में पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता के कथन को दोहराना नहीं, बल्कि उसकी जांच करना होता है। यही कारण है कि किसी भी महत्वपूर्ण विवाद में वास्तविक प्रश्न हमेशा दस्तावेज़ों से आगे जाकर पूछे जाते हैं—
* क्या निर्णय निष्पक्ष था?
* क्या सभी खिलाड़ियों के साथ समान व्यवहार हुआ?
* क्या नियम पहले से स्पष्ट थे?
* क्या उनका अनुप्रयोग समान रूप से किया गया?
* और सबसे महत्वपूर्ण—क्या इस निर्णय से भारतीय खेलों का हित सुरक्षित हुआ?
यहाँ एक व्यापक राष्ट्रीय प्रश्न भी उभरता है। भारत बार-बार यह दावा करता है कि वह ओलंपिक महाशक्ति बनने की दिशा में बढ़ रहा है। लेकिन कोई भी राष्ट्र केवल स्टेडियम बनाकर या खेल बजट बढ़ाकर खेल महाशक्ति नहीं बनता।
खेल महाशक्ति बनने के लिए खिलाड़ियों और संस्थाओं के बीच विश्वास आवश्यक होता है। जब खिलाड़ी को यह महसूस होने लगे कि उसे अपने प्रतिद्वंद्वियों से अधिक अपनी संस्था से लड़ना पड़ रहा है, तब समस्या केवल प्रशासनिक नहीं रहती; वह संरचनात्मक बन जाती है।
इतिहास गवाह है कि अनेक देशों में खेल संगठनों ने प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने के बजाय संस्थागत शक्ति के प्रदर्शन का माध्यम बनने की भूल की है। परिणामस्वरूप खिलाड़ियों का मनोबल टूटा, खेल राजनीति का अखाड़ा बन गया और राष्ट्रीय हित को नुकसान पहुँचा।
भारत को इस गलती से बचना होगा। यदि कोई खिलाड़ी नियमों का उल्लंघन करता है, तो नियम लागू होने चाहिए। लेकिन यदि नियमों का उपयोग इस प्रकार होने लगे कि निष्पक्षता पर ही प्रश्न उठने लगें, तो संस्था को अतिरिक्त पारदर्शिता दिखानी चाहिए।
यही कारण है कि अदालतों ने कई मामलों में पारदर्शी ट्रायल, वीडियो रिकॉर्डिंग और स्वतंत्र पर्यवेक्षण जैसी व्यवस्थाओं पर जोर दिया है। क्योंकि खेलों में विश्वास की पुनर्स्थापना केवल निर्णयों से नहीं, प्रक्रियाओं से होती है।
आज आवश्यकता किसी व्यक्ति-विशेष को नायक या खलनायक बनाने की नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि भारत यह सुनिश्चित करे कि उसके सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी मैदान में हारें या जीतें, लेकिन उन्हें यह महसूस न हो कि उनका सबसे कठिन मुकाबला खेल के बाहर की व्यवस्था से है।
एक राष्ट्र के रूप में हमारी प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी सर्वश्रेष्ठ मंच पर देश का प्रतिनिधित्व करें। क्योंकि अंततः पदक केवल खिलाड़ी नहीं जीतता। वह पूरे राष्ट्र के आत्मविश्वास का प्रतीक बनता है। और जब कोई खिलाड़ी व्यवस्था पर भरोसा खो देता है, तब नुकसान केवल उस खिलाड़ी का नहीं होता। नुकसान उस विश्वास का होता है जिस पर खेल, संस्थाएँ और लोकतंत्र—तीनों खड़े होते हैं।
भारत को पदक चाहिए। भारत को विश्वस्तरीय खिलाड़ी चाहिए। लेकिन उससे भी अधिक भारत को ऐसी संस्थाएँ चाहिए जिन पर खिलाड़ी बिना भय, बिना संदेह और बिना अदालत की शरण लिए भरोसा कर सकें। क्योंकि किसी भी सभ्य लोकतंत्र में व्यवस्था का उद्देश्य खिलाड़ियों को हराना नहीं, उन्हें आगे बढ़ाना होता है।
