विमर्शात्मक औपनिवेशिक उत्तर-आधुनिकता और भारत की पहचान का विलोपन: वैश्विक परिदृश्य, कॉर्पोरेट श्रेणियां एवं विधिक संप्रभुता

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


विमर्शात्मक औपनिवेशिक उत्तर-आधुनिकता और भारत की पहचान का विलोपन: वैश्विक परिदृश्य, कॉर्पोरेट श्रेणियां एवं विधिक संप्रभुता

## संप्रभुता के दो ध्रुव और एक मूक संकट

इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक की भू-राजनीति एक अनूठे विरोधाभास से गुजर रही है। एक तरफ यथार्थवादी कूटनीति (Hard Realpolitik) का वह ध्रुव है, जहाँ दशकों पुराने हठयोग और वैचारिक अवरोध टूट रहे हैं। 'अब्राहम समझौतों' (Abraham Accords) के बाद से मध्य-पूर्व (Middle East) का राजनीतिक भूगोल बदल रहा है; जो अरब देश कभी इज़राइल के अस्तित्व को मानचित्र से मिटा देना चाहते थे, वे आज उसकी संप्रभुता, तकनीकी श्रेष्ठता और राजकीय अस्मिता को कूटनीतिक और आर्थिक विवशताओं के कारण मान्यता दे रहे हैं। यहाँ तक कि दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक समीकरणों में भी इस प्रकार के मंथन की सुगबुगाहट समय-समय पर दिखती है।


किंतु इसके ठीक विपरीत, दूसरी तरफ एक सूक्ष्म, अदृश्य और विमर्शात्मक युद्ध (Discursive Warfare) चल रहा है, जिसका उद्देश्य किसी देश के भौतिक अस्तित्व को नहीं, बल्कि उसकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और संप्रभु पहचान को ही विलीन कर देना है। यह संकट किसी सैन्य आक्रमण की तरह कोलाहल नहीं करता, बल्कि अकादमिक विमर्शों, डिजिटल प्लेटफॉर्मों के एल्गोरिदम, और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के संगठनात्मक ढांचों के माध्यम से अत्यंत शांति से काम करता है। इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा शिकार वर्तमान में 'भारत' (India) है, जिसकी पांच सहस्राब्दी पुरानी सभ्यतागत पहचान को उत्तर-आधुनिक शब्दावली के छद्म आवरण में 'साउथ एशिया' (South Asia) नामक एक निरपेक्ष भौगोलिक श्रेणी में घोला जा रहा है।


यह कोई संयोग या केवल प्रशासनिक सरलीकरण का मामला नहीं है। यह ज्ञान-मीमांसा (Epistemology) के स्तर पर खेला जा रहा एक सुव्यवस्थित खेल है, जिसके शिकार अब केवल इतिहास के पन्ने नहीं, बल्कि वेदांत श्रीवास्तव जैसे जीवित और हाड-मांस के निर्दोष नागरिक भी हो रहे हैं।


1. विमर्श का औपनिवेशिक मूल और उत्तर-आधुनिक अवतार


इस संकट की जड़ों को समझने के लिए हमें उस पश्चिमी औपनिवेशिक ज्ञान-तंत्र को समझना होगा, जिसे प्रसिद्ध विचारक एडवर्ड सईद ने अपनी कालजयी कृति 'ओरिएंटलिज्म' (Orientalism) में रेखांकित किया था। सईद का मूल तर्क था कि पश्चिम कभी भी पूर्व (The East) को उसकी स्वायत्तता और मौलिकता में स्वीकार नहीं करता; वह पूर्व का एक ऐसा 'समरूप और निष्क्रिय विमर्श' (Homogenized and Passive Discourse) गढ़ता है, जिससे उसे नियंत्रित करना आसान हो सके।


[औपनिवेशिक काल] ──> उपमहाद्वीप (Sub-continent) / ओरिएंटल श्रेणियां ──> राष्ट्रीय चेतना का विखंडन

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                                     ▼ (वैचारिक रूपान्तरण)

[उत्तर-आधुनिक काल] ──> दक्षिण एशिया (South Asia) / एरिया स्टडीज ──> सभ्यतागत पहचान का विलोपन


* औपनिवेशिक काल का दृष्टिकोण: उन्नीसवीं सदी में जब मैक्स मूलर जैसे प्राच्यविदों (Orientalists) ने भारतीय ग्रंथों का अनुवाद किया, तो उन्होंने इसे किसी जीवित राष्ट्र की विरासत के बजाय 'ओरिएंटल टेक्स्ट्स' की मृत श्रेणी में रख दिया। विंस्टन चर्चिल जैसे साम्राज्यवादी नेताओं का यह दावा कि "भारत केवल एक भौगोलिक अभिव्यक्ति है, जो यूरोप या भूमध्य रेखा जितनी ही राष्ट्र है", इसी मानसिकता का प्रकटन था। इसका उद्देश्य भारत की अंतर्निहित सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकता को नकार कर ब्रिटिश शासन को नैतिक वैधता देना था।

* उत्तर-आधुनिक काल का प्रतिस्थापन: आज के उत्तर-आधुनिक युग में इसी औपनिवेशिक दृष्टि ने 'साउथ एशिया' का चोगा पहन लिया है। उत्तर-आधुनिकतावाद का यह एक विचित्र विरोधाभास है—वह राष्ट्र-राज्य (Nation-State) की अवधारणा को एक 'कृत्रिम विमर्श' (Construct) बताकर उसे विखंडित करने का प्रयास करता है, किंतु यह सिद्धांत वैश्विक शक्तियों पर समान रूप से लागू नहीं होता। अमेरिका, ब्रिटेन या फ्रांस को कभी 'नॉर्थ अटलांटिक रीजन' कहकर उनकी राष्ट्रीय संप्रभुता को धुंधला नहीं किया जाता; वे अपनी संप्रभु पहचान के साथ सीना ताने खड़े रहते हैं। किंतु जब बात भारत की आती है, तो उसकी सभ्यतागत विशिष्टता को 'क्षेत्रीय औसत' में विलीन कर दिया जाता है।


2. 'साउथ एशिया' की राजनीति: शीत युद्ध से विकिपीडिया तक


'साउथ एशिया' (South Asia) कोई प्राचीन भौगोलिक या सांस्कृतिक संज्ञा नहीं है। यह बीसवीं सदी के मध्य में अमेरिकी विदेश मंत्रालय (State Department) और शीत युद्ध कालीन 'एरिया स्टडीज' (Area Studies) की रणनीतिक देन है। 1950 और 60 के दशक में कोलंबिया, शिकागो, पेनसिल्वेनिया और टेक्सास जैसे विश्वविद्यालयों में 'दक्षिण एशियाई अध्ययन' विभागों की स्थापना इसलिए की गई थी ताकि अमेरिका अपनी वैश्विक प्रभुसत्ता को एक बौद्धिक ढांचा दे सके और इस क्षेत्र के देशों को साम्यवाद विरोधी रणनीतियों के तहत एक ही चश्मे से देख सके।


## ज्ञान के विकेंद्रीकरण की आड़ में पक्षपात


आज विकिपीडिया, जो दुनिया का सबसे बड़ा और सर्वाधिक देखा जाने वाला संदर्भ स्रोत है, इस 'क्षेत्रीय' दृष्टिकोण को 'वैज्ञानिक तटस्थता' और 'राष्ट्रवादी पूर्वाग्रह के अभाव' के रूप में प्रस्तुत करता है। किंतु इसके सम्पादकीय समुदाय का यह सुव्यवस्थित वैचारिक झुकाव एक गहरे पक्षपात (Systemic Bias) को छुपाता है।


जब हम विकिपीडिया या पश्चिमी अकादमिक विमर्शों में चीनी इतिहास को देखते हैं, तो वह 'East Asian History' के बजाय सीधे 'Chinese History' या 'China' से शुरू होता है। जापान के सांस्कृतिक विमर्श को 'Japanese' कहा जाता है, न कि 'East Asian'। तो फिर भारत के मामले में यह अपवाद क्यों?


# ऐतिहासिक विरोधाभास: वैदिक सभ्यता, बौद्ध धर्म का उद्गम, मौर्य और गुप्त साम्राज्यों का राजनीतिक विस्तार, संस्कृत का सुदूर पूर्व तक प्रसार या हिंदू दर्शन की विभिन्न धाराएं—इन सबका भौगोलिक और वैचारिक केंद्र 'साउथ एशिया' नहीं, बल्कि 'भारत' (India) था। जिस कालखंड को यूनानी लेखकों ने 'Indica', फारसी ग्रंथों ने 'हिन्द' और अरबी भूगोलवेत्ताओं ने 'al-Hind' कहा, उसे आज का डिजिटल ज्ञान-तंत्र 'साउथ एशियन सबकॉन्टिनेंट' कहने पर आमादा है। जब हार्वर्ड का 'South Asia Initiative' भारतीय दर्शन को 'South Asian thought' लिखता है, तो यह केवल शब्दावली का हेरफेर नहीं है; यह ज्ञान की सभ्यतागत उत्पत्ति को भूगोल के धुंधलके में गायब करने का सचेत प्रयास है।


3. कॉर्पोरेट ढांचा, डिजिटल एल्गोरिदम और 'वेदांत श्रीवास्तव' प्रकरण


यह विमर्शात्मक विलोपन केवल अहानिकर अकादमिक गोष्ठियों या सेमिनारों तक सीमित नहीं है। अब इसने वैश्विक कॉर्पोरेट और डिजिटल प्लेटफॉर्मों के माध्यम से हमारे वास्तविक जीवन में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया है। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा और अमेज़न जैसी टेक कंपनियों ने अपने प्रशासनिक और व्यावसायिक संचालन के लिए 'South Asia Region' (SAR) को एक मानक इकाई बना रखा है।


## आर्थिक और डिजिटल विसंगति


जनसंख्या, जीडीपी, तकनीकी पैठ और डिजिटल उपभोक्ताओं के आधार पर भारत इस पूरे क्षेत्र का निर्विवाद इंजन है। इसके बावजूद, भारत की विशिष्टता को पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका के साथ एक ही टोकरी में रख दिया जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि जब ये कंपनियां अपनी कंटेंट मॉडरेशन नीतियां, भाषाई प्राथमिकताएं या विज्ञापन लक्ष्यीकरण (Ad Targeting) तय करती हैं, तो वे भारत की विशिष्ट सांस्कृतिक और सामाजिक संवेदनाओं को अनदेखा कर देती हैं। लिंक्डइन या इंडीड जैसे पेशेवर मंचों पर जब किसी भारतीय युवा की प्रोफाइल 'South Asia' के अंतर्गत वर्गीकृत होती है, तो वैश्विक नियोक्ताओं के सामने उसकी राष्ट्रीय पहचान धुंधली पड़ जाती है।


## 'वेदांत श्रीवास्तव' प्रकरण: एक मूर्त मानवीय संकट


यह अस्पष्टता तब एक भयानक मानवीय संकट में बदल जाती है जब डिजिटल प्लेटफॉर्मों के एल्गोरिदम इस वर्गीकरण को उपयोगकर्ताओं के 'ओरिजिन' (Origin) पर थोप देते हैं। वेदांत श्रीवास्तव का प्रकरण इस प्रवृत्ति का सबसे पीड़ादायक और ज्वलंत उदाहरण है।


डिजिटल मध्यस्थ (IP Address / Phone Code) ──> 'South Asia' जियो-टैगिंग (अस्पष्ट श्रेणी)

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                         सुरक्षा जाँच, वीज़ा सत्यापन और नागरिक अधिकारों में पहचान का संकट


जब किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने तकनीकी भूल या अपनी आंतरिक श्रेणी-व्यवस्था के कारण उनके खाते का उद्गम 'India' की बजाय 'South Asia' दर्शाया, तो एक निर्दोष बच्चे की पहचान सुरक्षा और विधिक प्रणालियों के सामने संदिग्ध बन गई।


मेटा, एक्स (ट्विटर), और टिकटॉक जैसी कंपनियाँ उपयोगकर्ताओं के स्थान निर्धारण के लिए आईपी पते और देश कोड का उपयोग तो करती हैं, लेकिन बैकएंड डेटाबेस में जब 'India' को 'South Asia' के बड़े पूल में डाल दिया जाता है, तो भू-टैगिंग (Geo-tagging) की यह अस्पष्टता चुनावी विज्ञापन नियमों की निगरानी, विदेशी हस्तक्षेप की जांच और वीज़ा आवेदन के सत्यापन जैसी प्रक्रियाओं में गंभीर कानूनी और व्यावहारिक बाधाएं खड़ी कर देती है। वेदांत जैसे लोग किसी नीति-निर्माण का हिस्सा नहीं हैं, न ही वे किसी वैचारिक युद्ध के योद्धा हैं; वे बस भारतीय नागरिक हैं, और उनकी भारतीयता को तकनीकी रूप से 'साउथ एशियनता' में बदल देना उनके बुनियादी अधिकारों का हनन है।


4. इज़राइल का मॉडल: संप्रभु अस्तित्व की रक्षा का मार्ग


भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह इस संकट को केवल एक "शब्दावली के विवाद" के रूप में न देखे, बल्कि इसे अपनी संप्रभुता पर एक धीमे और सूक्ष्म प्रहार के रूप में स्वीकार करे। इस संदर्भ में इज़राइल राज्य का अनुभव अत्यंत शिक्षाप्रद और व्यावहारिक दिशा दिखाने वाला है। इज़राइल आधुनिक इतिहास का एकमात्र ऐसा राष्ट्र है जिसने अपनी पहचान और अस्तित्व के नकार (Denial) को एक व्यवस्थित, बहु-स्तरीय खतरे के रूप में पहचाना और उसके विरुद्ध एक अचूक प्रतिरोध तंत्र विकसित किया।


## इज़राइल की रणनीतिक धुरी : भारतीय संदर्भ में इसका कूटनीतिक और विधिक रूपान्तरण 


# पारस्परिकता का सिद्धांत (Reciprocity) : जो राष्ट्र इज़राइल को मान्यता नहीं देते, इज़राइल उनसे कोई राजनयिक संबंध नहीं रखता। भारत को भी उन संस्थानों के साथ अपनी पारस्परिकता तय करनी होगी जो भारत की सभ्यतागत पहचान को मान्यता नहीं देते।

# विधिक और विधायी लीवरेज (BDS विरोधी कानून) : इज़राइल ने वैश्विक 'Boycott, Divestment and Sanctions' (BDS) आंदोलन के विरुद्ध अमेरिका के 35 से अधिक राज्यों और यूरोपीय देशों में कड़े कानून बनवाए। भारत को अपने विशाल बाजार का उपयोग कर एंटी-डायलूटेशन कानून बनाने होंगे।

# तकनीक को कूटनीतिक हथियार बनाना : ड्रिप इरिगेशन और साइबर सुरक्षा जैसी तकनीकों को कूटनीतिक उपकरण (Tech Diplomacy) बनाकर देशों को राजनीतिक मान्यता के लिए विवश किया। भारत अपने 'Digital Public Infrastructure' (UPI, ONDC) के माध्यम से यह कर सकता है।

# ऐतिहासिक न्याय का वैधानिक संरक्षण : होलोकॉस्ट के नकार (Holocaust Denial) को दुनिया के 17 देशों में एक अंतरराष्ट्रीय अपराध घोषित करवाया। भारत को अपनी सांस्कृतिक और भौगोलिक पहचान के सचेत विलोपन को 'सांस्कृतिक हिंसा' के रूप में स्थापित करना होगा।


5. विधिक और नीतिगत समाधान: 'वेदांत अधिनियम' की आवश्यकता


चूंकि भारत की समस्या किसी राज्य की मान्यता की नहीं, बल्कि उसकी विमर्शात्मक अस्मिता (Discursive Identity) की है, इसलिए भारत को अपने विशाल डेटा लीवरेज और 1.4 अरब के बाजार की शक्ति का विधिक उपयोग करना होगा। यदि यह देश ऐतिहासिक और सामाजिक विसंगतियों को दूर करने के लिए विशेष कानून बना सकता है, तो वह अपनी डिजिटल और राष्ट्रीय पहचान की रक्षा के लिए एक 'वेदांत अधिनियम' (Vedant Act) क्यों नहीं ला सकता?


भारत सरकार को अपने IT (Intermediary Guidelines) Rules या आगामी Digital India Identity Act के अंतर्गत निम्नलिखित प्रावधानों को कड़ाई से लागू करना चाहिए:


1. अनिवार्य राष्ट्रीय जियो-लेबलिंग (Mandatory National Geo-labeling)


भारत के अधिकार क्षेत्र में संचालित होने वाले प्रत्येक डिजिटल प्लेटफॉर्म, सर्च इंजन और सोशल मीडिया मध्यस्थ के लिए यह विधिक रूप से अनिवार्य किया जाए कि वह भारतीय उपयोगकर्ताओं के खातों, उनके डेटा ओरिजिन और प्रोफाइलिंग में स्पष्ट रूप से 'India' या 'Bharat' का ही प्रयोग करे। किसी भी आंतरिक एल्गोरिदम में भारत को 'South Asia' जैसी अस्पष्ट श्रेणी में समेटने पर पूर्ण प्रतिबंध हो।


2. कॉर्पोरेट वर्गीकरण पर नियामकीय शर्तें


कोई भी बहुराष्ट्रीय कंपनी जो भारत में पंजीकृत है और यहाँ से राजस्व कमाती है, वह अपने आधिकारिक क्षेत्रीय वर्गीकरण में भारत की बाजार हिस्सेदारी और संप्रभु पहचान को किसी अन्य देश के साथ साझा 'साउथ एशियन' टोकरी में नहीं रख सकती। इसका उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर उनकी भारतीय टर्नओवर के आधार पर भारी जुर्माना और बार-बार उल्लंघन पर सेवा-निलम्बन का प्रावधान हो।


3. अकादमिक पारस्परिकता और ICCR नीति में सुधार


भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) और मानव संसाधन से जुड़े संस्थान विदेशी विश्वविद्यालयों को दिए जाने वाले अनुदान और सहयोग को इस शर्त से जोड़ें कि उनके पाठ्यक्रमों में भारत की पहचान स्वतंत्र रूप से अक्षुण्ण रहनी चाहिए।


"यदि कोई विदेशी विश्वविद्यालय भारतीय इतिहास को 'South Asian Studies' के नाम पर dilute करता है, तो उसके शोधकर्ताओं को भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागारों (National Archives), पुरातात्विक स्थलों और क्षेत्र-अनुसंधान (Field Research) की अनुमति न दी जाए, और न ही ऐसे संस्थानों की डिग्रियों को भारत में समकक्षता (Equivalence) मिले।"


4. वैश्विक 'India Is Not South Asia' जन-अभियान


अमेरिका और यूरोप में बसे 45 लाख से अधिक भारतीय प्रवासियों (Diaspora) को संगठित कर एक ऐसा मजबूत सांस्कृतिक-राजनीतिक लॉबी समूह (जैसे AIPAC की तर्ज पर) तैयार किया जाए, जो पश्चिमी देशों के नीति-निर्माताओं और विश्वविद्यालयों पर दबाव बनाए कि वे भारतीय दर्शन, कला और इतिहास को उसकी मूल संप्रभु पहचान के साथ पढ़ाएं। साथ ही, डिजिटल मंचों पर वेदांत श्रीवास्तव जैसे प्रत्येक भेदभावपूर्ण प्रकरण को एक केंद्रीय डेटाबेस में प्रलेखित (Document) किया जाए ताकि इसे कानूनी लड़ाइयों में साक्ष्य बनाया जा सके।


## स्वयं के विमर्श की संप्रभुता


अंततः, नाम केवल भाषाई प्रतीक या व्याकरण की संज्ञा नहीं होते; वे किसी राष्ट्र की संप्रभुता, उसके पुरखों के तप, उसके इतिहास और उसकी जीवित सांस्कृतिक चेतना के संवाहक होते हैं। जब भारत अपनी पहचान को वैश्विक पटल पर धुंधला होने देता है, तो वह अपनी आने वाली पीढ़ियों के आत्मसम्मान को दांव पर लगाता है।


इस प्रवृत्ति का प्रतिरोध किसी संकीर्ण या प्रतिक्रियावादी राष्ट्रवाद के माध्यम से नहीं, बल्कि तर्क, साक्ष्य और बौद्धिक आत्मनिर्भरता के माध्यम से होना चाहिए। जब तक ऑक्सफोर्ड, एमआईटी या कोलंबिया के प्रकाशन गृह भारतीय मेधा को प्रमाणित करेंगे, तब तक हमें उनकी शब्दावली की गुलामी करनी होगी। भारत को अपने ज्ञान-संस्थानों, अकादमिक पत्रिकाओं और शोध केंद्रों को इतना सशक्त और क्रेडिबल बनाना होगा कि दुनिया भारतीय विचारों को किसी पश्चिमी 'एरिया स्टडीज' के चश्मे से नहीं, बल्कि उसकी अपनी मौलिक भाषा में पढ़ने के लिए विवश हो।


प्रश्न केवल एक शब्द का नहीं है; प्रश्न यह है कि जब चीन 'चीन' है, जापान 'जापान' है, तो फिर भारत 'साउथ एशिया' के नामहीन भूगोल में क्यों खो जाए? यह एक पांच सहस्र वर्ष पुरानी अनवरत सभ्यता का अपनी आत्म-पहचान को बनाए रखने का नैसर्गिक, न्यायसंगत और संप्रभु अधिकार है।