डिजिटल मूल्यांकन, सार्वजनिक भरोसा और एक पीढ़ी की परीक्षा

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला


डिजिटल मूल्यांकन, सार्वजनिक भरोसा और एक पीढ़ी की परीक्षा

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने 9 फरवरी 2026 के अपने आधिकारिक परिपत्र में कक्षा 12 के लिए On-Screen Marking (OSM) प्रणाली शुरू करने की घोषणा की थी। बोर्ड ने इसे अधिक दक्ष, पारदर्शी और तेज़ मूल्यांकन की दिशा में उठाया गया कदम बताया, साथ ही dry runs, प्रशिक्षण और call centre जैसी तैयारी का भी वादा किया था। परिणाम 13 मई 2026 को घोषित हुए। इसी बिंदु पर यह प्रश्न खड़ा हुआ कि क्या तकनीक के वादे और उसके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच कोई खतरनाक दूरी तो नहीं रह गई। 


यहीं से यह विवाद केवल “एक परीक्षा” का नहीं, बल्कि राज्य की डिजिटल क्षमता का प्रश्न बन जाता है। राहुल गांधी ने 27 मई 2026 को आरोप लगाया कि CBSE परिणामों में “massive tampering” हुई है और डिजिटल कॉपी-चेकिंग से जुड़े ठेकेदार पर भी सवाल उठाए। कांग्रेस और कई मीडिया रिपोर्टों ने इस विवाद को एक गंभीर शैक्षणिक संकट के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि CBSE ने इन आरोपों को “erroneous” और “misleading” कहकर खारिज किया तथा कहा कि ठेका प्रक्रिया नियमों के अनुसार हुई थी।


इस बहस का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि छात्र यहाँ केवल उपभोक्ता नहीं हैं; वे संवैधानिक राज्य के संरक्षण में रहने वाले नागरिक हैं, जिनके भविष्य का निर्धारण एक स्कैन, एक स्क्रीन और एक अंक से हो सकता है। जब किसी डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली में जवाब धुंधले दिखें, पन्ने छूट जाएँ या स्कैनिंग की गुणवत्ता पर प्रश्न उठें, तो यह तकनीकी त्रुटि भर नहीं रहती; वह अवसर, आत्मविश्वास और मानसिक शांति पर सीधा आघात बन जाती है। शिक्षा में एक अंक का अंतर कई बार प्रवेश, छात्रवृत्ति और करियर की दिशा बदल देता है। 


ठेकेदार कंपनी को लेकर भी विवाद ने आग पकड़ ली। रिपोर्टों के अनुसार Coempt Edutech को लेकर राहुल गांधी ने सवाल उठाए कि उसका पुराना नाम Globarena था और 2019 के Telangana intermediate results विवाद से उसका जुड़ाव रहा है। दूसरी ओर, कंपनी के CEO ने प्लेटफ़ॉर्म breach से इनकार किया और कहा कि 2019 वाला मामला अदालतों में साफ़ हो चुका था। यानी एक तरफ़ राजनीतिक आरोप हैं, दूसरी तरफ़ कंपनी और बोर्ड की सफाई; और इस खींचतान के बीच सबसे असुरक्षित पक्ष छात्र हैं।


यहाँ सरकार, बोर्ड और निजी वेंडर — तीनों के लिए एक ही कसौटी बननी चाहिए: क्या इतनी संवेदनशील प्रणाली को लागू करने से पहले independent technical audit, data-quality checks, redundancy testing और student grievance mechanism पर्याप्त थे? CBSE के अपने परिपत्र में training, dry runs और call centre का उल्लेख है, जो इस बात का संकेत है कि बोर्ड भी जोखिम को समझ रहा था; लेकिन यदि जमीनी क्रियान्वयन में त्रुटियाँ इतनी बड़ी निकलीं कि सार्वजनिक भरोसा डगमगा गया, तो “इरादा अच्छा था” कहना पर्याप्त नहीं रह जाता। सार्वजनिक संस्थाओं का मूल्यांकन इरादों से नहीं, परिणामों और सुरक्षा मानकों से होता है। 


इस प्रसंग को व्यापक शासन-चिंता के रूप में पढ़ना होगा। भारत ने डिजिटल शासन में कई बड़े प्रयोग किए हैं, और हर प्रयोग के साथ वही पुराना सवाल वापस आता है: क्या तकनीक पहले लागू की गई और बाद में भरोसा बनाया गया, या भरोसे की बुनियाद पहले रखी गई? शिक्षा जैसे क्षेत्र में यह गलती सबसे महँगी पड़ती है, क्योंकि यहाँ त्रुटि केवल नंबर नहीं गिराती, वह परिवारों की उम्मीद और युवाओं के मनोबल को भी चोट पहुँचाती है। यही कारण है कि ऐसी व्यवस्था में सुधार का अर्थ केवल software patch नहीं, बल्कि procurement transparency, accountability chain और public redressal architecture का पुनर्निर्माण है। 


सबसे संवेदनशील सच यह है कि डिजिटल इंडिया का अर्थ “फास्ट” प्रशासन नहीं, “विश्वसनीय” प्रशासन होना चाहिए। यदि कोई प्रणाली तेज़ तो हो, लेकिन छात्र के साथ न्याय न कर सके, तो वह प्रगति नहीं, सिर्फ़ गति है। अगर ठेका नियमों के अनुसार भी दिया गया हो, तब भी राज्य का दायित्व समाप्त नहीं होता; उसे यह साबित करना होता है कि vendor selection, background diligence, stress testing और post-deployment monitoring सचमुच कड़े थे। इसी तरह, यदि आरोप राजनीतिक रूप से तीखे हैं, तब भी जवाब संस्थागत और दस्तावेज़-आधारित होना चाहिए।


अंततः यह मामला किसी एक नेता, किसी एक कंपनी या किसी एक बोर्ड की कहानी नहीं है। यह इस सवाल की परीक्षा है कि भारत अपनी सबसे मूल्यवान पूँजी — अपने विद्यार्थियों — के साथ कैसा व्यवहार करता है। तकनीक का उद्देश्य भरोसा बढ़ाना है; यदि वह भरोसा घटाए, तो उसे तुरंत पुनर्समीक्षा की ज़रूरत है। शिक्षा व्यवस्था में एक संशोधित अंकपत्र पर्याप्त नहीं होता; वहाँ जवाबदेही, संवेदना और भविष्य-सुरक्षा भी चाहिए। यही इस पूरे विवाद की असली कसौटी है।