ऊर्जा, साम्राज्य और सम्प्रभुता : क्या भारत एक नए वैश्विक दबाव-युग के मुहाने पर खड़ा है?

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


ऊर्जा, साम्राज्य और सम्प्रभुता : क्या भारत एक नए वैश्विक दबाव-युग के मुहाने पर खड़ा है?

विश्व राजनीति के इतिहास में ऊर्जा केवल आर्थिक संसाधन नहीं रही; वह साम्राज्यों की धमनियों में बहने वाला रक्त रही है। बीसवीं शताब्दी के युद्धों से लेकर इक्कीसवीं सदी की भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धाओं तक, तेल ने राष्ट्रों की विदेश नीति, सैन्य गठबंधनों और आर्थिक नियति को निर्धारित किया है। आज भारत जिस परिस्थिति से गुजर रहा है, वह केवल पेट्रोल-डीजल बचाने की सरकारी अपील या बढ़ती महंगाई का संकट नहीं है; यह उस गहरे अंतर्राष्ट्रीय शक्ति-संघर्ष का प्रतिबिंब है जिसमें वैश्विक दक्षिण के राष्ट्र अपनी ऊर्जा-सुरक्षा, आर्थिक संप्रभुता और कूटनीतिक स्वायत्तता को बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं।


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ईंधन बचत संबंधी अपील को यदि केवल पर्यावरणीय नैतिकता या वित्तीय अनुशासन के रूप में पढ़ा जाए तो यह अधूरा विश्लेषण होगा। राजनीतिक सत्ता के गलियारों में जब अचानक प्रतीकात्मक सादगी का प्रदर्शन शुरू हो जाए—कोई मोटरसाइकिल से कार्यालय पहुँचे, कोई मेट्रो में यात्रा करे, कोई अपने काफिले की गाड़ियाँ घटा दे—तो यह केवल जनसंपर्क नहीं होता; यह उस अनकहे संकट की पूर्वपीठिका भी हो सकता है जिसे सत्ता अभी सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है।

भारत इस समय ऐसे वैश्विक ऊर्जा-संकट के बीच खड़ा है जहाँ भू-राजनीति और बाजार एक-दूसरे में विलीन हो चुके हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध ने पहले ही विश्व ऊर्जा संरचना को अस्थिर कर दिया था। उसके बाद पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, ईरान पर सैन्य कार्रवाइयों और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे सामरिक मार्गों पर संकट ने तेल आपूर्ति की पूरी वैश्विक श्रृंखला को असुरक्षित बना दिया। ऐसे समय में रूस भारत के लिए केवल एक व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि ऊर्जा-स्थिरता का प्रमुख आधार बनकर उभरा। यहीं से प्रश्न केवल अर्थव्यवस्था का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वायत्तता का बन जाता है।

यदि कोई महाशक्ति यह निर्धारित करने लगे कि भारत किस देश से तेल खरीदे और किससे नहीं, तो यह केवल प्रतिबंधों की नीति नहीं रह जाती; यह वैश्विक शक्ति-संतुलन में अधीनता और प्रभुत्व की नई परिभाषा बन जाती है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच रूस से तेल खरीदने के लिए भारत को “विशेष छूट” मिलना अपने आप में उस असमान वैश्विक व्यवस्था का संकेत है जिसमें विकासशील देशों की आर्थिक आवश्यकताओं को भी अनुमति-पत्रों के दायरे में बाँध दिया जाता है। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या एक उभरती हुई महाशक्ति कहलाने वाला राष्ट्र अपनी ऊर्जा-नीति के लिए किसी अन्य राजधानी की स्वीकृति का मोहताज हो सकता है?

यह परिस्थिति भारत-अमेरिका संबंधों की जटिलता को भी उजागर करती है। पिछले दो दशकों में भारत ने अमेरिका के साथ सामरिक निकटता बढ़ाई है—क्वाड, इंडो-पैसिफिक रणनीति, रक्षा समझौते और तकनीकी सहयोग उसी दिशा के संकेत हैं। परंतु अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में स्थायी मित्रता नहीं, केवल स्थायी हित होते हैं। अमेरिका की प्राथमिकता अपने वैश्विक रणनीतिक हित हैं; भारत की प्राथमिकता अपनी ऊर्जा-सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता होनी चाहिए। जब ये दोनों परस्पर टकराते हैं, तब कूटनीति की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है।

रूसी विदेश मंत्री Sergey Lavrov का यह कथन कि पश्चिमी दबाव “औपनिवेशिक” या “नव-औपनिवेशिक” प्रवृत्ति का प्रतीक है, केवल एक कूटनीतिक बयान नहीं, बल्कि उस व्यापक विमर्श का हिस्सा है जो आज वैश्विक दक्षिण में तेज़ी से उभर रहा है। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के अनेक राष्ट्र अब यह अनुभव कर रहे हैं कि शीतयुद्ध के बाद जिस “नियम-आधारित विश्व व्यवस्था” का वादा किया गया था, वह व्यवहार में अक्सर शक्तिशाली देशों के हितों की रक्षा का माध्यम बन जाती है।

भारत के लिए यह क्षण इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि उसकी विदेश नीति सदैव “रणनीतिक स्वायत्तता” की अवधारणा पर आधारित रही है। जवाहरलाल नेहरू के गुटनिरपेक्ष आंदोलन से लेकर इंदिरा गांधी के दौर की सोवियत निकटता और मनमोहन सिंह काल की बहुध्रुवीय कूटनीति तक, भारत ने प्रायः यह प्रयास किया कि वह किसी एक शक्ति-धुरी का परिशिष्ट न बने। आज वही सिद्धांत फिर परीक्षा में है।

परंतु इस पूरे विमर्श का सबसे पीड़ादायक पक्ष घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला प्रभाव है। जब थोक महंगाई दर अचानक दोगुनी से अधिक बढ़ती है, दूध और खाद्य पदार्थों की कीमतें ऊपर जाती हैं, बिजली और ईंधन महँगे होते हैं, तब भू-राजनीति सीधे रसोई तक पहुँच जाती है। अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों, समुद्री मार्गों और तेल अनुबंधों पर होने वाली कूटनीतिक वार्ताओं का अंतिम बोझ आम नागरिक की थाली और जेब पर उतरता है। यही वह बिंदु है जहाँ विदेश नीति केवल रणनीतिक दस्तावेज नहीं रहती; वह सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का प्रश्न बन जाती है।

भारत के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि वह रूस से तेल खरीदे या अमेरिका को संतुष्ट करे। वास्तविक चुनौती यह है कि क्या वह अपनी ऊर्जा-सुरक्षा को दीर्घकालिक दृष्टि से पुनर्परिभाषित कर पाएगा? क्या वह वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों, क्षेत्रीय ऊर्जा-गठबंधनों और घरेलू उत्पादन क्षमता को इतना विकसित कर सकेगा कि भविष्य में किसी वैश्विक शक्ति के दबाव से उसकी अर्थव्यवस्था बंधक न बने?

विश्व एक नए शीतयुद्ध की ओर बढ़ रहा है—जहाँ हथियारों से अधिक प्रभावी साधन आर्थिक प्रतिबंध, ऊर्जा-नियंत्रण और व्यापारिक निर्भरता हैं। ऐसे समय में भारत को केवल प्रतिक्रियात्मक नीति नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी भू-राजनीतिक दृष्टि की आवश्यकता है। उसे अमेरिका और रूस दोनों के साथ संबंध बनाए रखते हुए यह स्पष्ट करना होगा कि उसकी विदेश नीति का अंतिम निर्धारक भारतीय राष्ट्रीय हित है, न कि किसी महाशक्ति की रणनीतिक सुविधा।

क्योंकि इतिहास गवाह है—जो राष्ट्र अपनी ऊर्जा-सुरक्षा पर नियंत्रण खो देता है, वह धीरे-धीरे अपनी कूटनीतिक स्वतंत्रता भी खो देता है। और जो राष्ट्र अपनी कूटनीतिक स्वतंत्रता खो देता है, उसकी आर्थिक नीतियाँ अंततः उसकी अपनी नहीं रह जातीं।