असहमति का अपराधीकरण : क्या लोकतंत्र अब भय के साये में प्रवेश कर चुका है?
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
असहमति का अपराधीकरण : क्या लोकतंत्र अब भय के साये में प्रवेश कर चुका है?लोकतंत्र केवल चुनावों से जीवित नहीं रहता; वह असहमति की सुरक्षा से जीवित रहता है। संसदें, संविधान, न्यायालय और चुनाव आयोग लोकतांत्रिक संरचना के औपचारिक स्तंभ अवश्य हैं, किंतु उसकी आत्मा उस नागरिक में बसती है जो बिना भय के सत्ता से प्रश्न पूछ सके। जिस दिन कोई नागरिक अपनी राजनीतिक राय व्यक्त करने से पहले यह सोचने लगे कि उसके विरुद्ध मुकदमा दर्ज हो सकता है, उसकी नौकरी जा सकती है, या उसकी यात्रा-स्वतंत्रता छिन सकती है—उस दिन लोकतंत्र का संकट केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक और सभ्यतागत संकट बन जाता है।
Dr. Sangram Patil का प्रकरण इसी संकट का एक विचलित कर देने वाला प्रतीक बनकर सामने आया है। बारह शब्दों की एक फेसबुक पोस्ट, एक एफ़.आई.आर., एक लुक आउट सर्कुलर, महीनों की कानूनी प्रताड़ना, और लगभग समाप्त हो चुकी पेशेवर प्रतिष्ठा—यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है; यह उस बदलते लोकतांत्रिक वातावरण की कहानी है जहाँ राज्य की संवेदनशीलता और नागरिक की स्वतंत्रता के बीच संतुलन लगातार टूटता हुआ दिखाई देता है।
सबसे गंभीर प्रश्न यह नहीं है कि किसी पोस्ट से कौन सहमत था और कौन असहमत। लोकतंत्र में राजनीतिक विचारों का उद्देश्य सर्वसम्मति नहीं, बल्कि बहस है। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या किसी राजनीतिक टिप्पणी को इतनी आसानी से “सामुदायिक वैमनस्य” के संभावित खतरे में बदल देना न्यायसंगत है, जबकि उसमें किसी धर्म, जाति या समुदाय का प्रत्यक्ष उल्लेख तक न हो? यदि सत्ता-समर्थक शिकायतें स्वतः ही दंडात्मक तंत्र को सक्रिय कर देती हैं, तो यह कानून के शासन से अधिक राजनीतिक मनोविज्ञान का संकेत बन जाता है।
यहाँ चिंता केवल एक एफ.आई.आर. की नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक संस्कृति की है जिसमें प्रक्रिया स्वयं दंड बन जाती है। लोकतांत्रिक देशों में न्याय केवल अंतिम निर्णय से नहीं मापा जाता; यह भी देखा जाता है कि उस निर्णय तक पहुँचने की प्रक्रिया कितनी मानवीय, पारदर्शी और संतुलित थी। यदि कोई व्यक्ति महीनों तक यह न जान पाए कि उससे और कितनी पूछताछ बाकी है, यदि उसकी अंतरराष्ट्रीय पेशेवर जिम्मेदारियाँ ठप हो जाएँ, यदि उसे अपने ही देश में एक अनिश्चित कानूनी अंधकार में जीना पड़े—तो भले ही अंततः अदालत उसे राहत दे दे, तब तक राज्य अपने नागरिक को मानसिक और सामाजिक दंड दे चुका होता है।
यही वह बिंदु है जहाँ लोकतंत्र और “प्रशासित भय” के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।
विडंबना यह भी है कि भारत स्वयं को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में प्रस्तुत करता है—एक ऐसा राष्ट्र जो वैश्विक मंचों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मानवाधिकार और बहुलतावाद की बात करता है। किंतु लोकतंत्र की विश्वसनीयता केवल अंतरराष्ट्रीय भाषणों से निर्मित नहीं होती; वह उन छोटे-छोटे क्षणों में बनती है जब कोई नागरिक सत्ता की आलोचना करता है और राज्य उसके अधिकार की रक्षा करता है, न कि उसे संदेह की दृष्टि से देखता है।
इस पूरे प्रकरण का सबसे भयावह पक्ष “चिलिंग इफेक्ट” है—वह अदृश्य भय जो समाज में धीरे-धीरे फैलता है। जब एक शिक्षित डॉक्टर, अंतरराष्ट्रीय पेशेवर और सार्वजनिक जीवन से जुड़ा व्यक्ति केवल एक राजनीतिक टिप्पणी के कारण महीनों तक कानूनी जाल में उलझ सकता है, तो सामान्य नागरिक क्या सोचेगा? वह शायद चुप रहना चुनेगा। और जब नागरिक चुप होने लगते हैं, तब लोकतंत्र बाहर से जीवित दिखाई देता है, पर भीतर से खोखला होने लगता है।
इतिहास गवाह है कि लोकतंत्रों का क्षय अचानक नहीं होता। वह धीरे-धीरे होता है—जब असहमति को राष्ट्र-विरोध समझा जाने लगे, जब आलोचना को शत्रुता मान लिया जाए, जब कानून का प्रयोग न्याय से अधिक संदेश देने के लिए होने लगे। सत्ता के लिए सबसे सुविधाजनक नागरिक वह होता है जो प्रश्न न पूछे। किंतु राष्ट्रों के लिए सबसे खतरनाक स्थिति भी वही होती है।
यह भी विचारणीय है कि क्या राज्य की संस्थाएँ अब सोशल मीडिया शिकायतों के दबाव में अत्यधिक प्रतिक्रियाशील होती जा रही हैं? डिजिटल युग में अभिव्यक्ति की गति तेज़ हुई है, परंतु लोकतांत्रिक परिपक्वता का अर्थ यह नहीं कि हर असुविधाजनक टिप्पणी को आपराधिक जांच का विषय बना दिया जाए। यदि राजनीतिक व्यंग्य, कटाक्ष या आलोचना को दंडात्मक कार्रवाई से जोड़ा जाएगा, तो अंततः लोकतंत्र संवाद का नहीं, भय का तंत्र बन जाएगा।
अंततः, Bombay High Court द्वारा हस्तक्षेप और राहत इस बात का संकेत अवश्य है कि संस्थागत संतुलन अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। न्यायपालिका अभी भी नागरिक स्वतंत्रताओं की अंतिम आशा बनी हुई है। परंतु किसी लोकतंत्र की सफलता इस बात से नहीं आँकी जाती कि अदालतें कितनी बार नागरिकों को राज्य से बचाती हैं; बल्कि इससे आँकी जाती है कि नागरिकों को बार-बार अदालत की शरण में जाने की आवश्यकता ही कितनी पड़ती है।
डॉ. संग्राम पाटिल का मामला अंततः केवल एक व्यक्ति का मुकदमा नहीं है। यह उस प्रश्न का दर्पण है जो आज हर लोकतांत्रिक समाज के सामने खड़ा है—क्या राज्य इतना शक्तिशाली हो चुका है कि वह असहमति से डरने लगे? और यदि हाँ, तो क्या नागरिक अब केवल अधिकारों के साथ नहीं, बल्कि भय के साथ भी जीने के लिए अभिशप्त हैं?
क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति उसके समर्थकों की तालियों में नहीं, बल्कि उसके आलोचकों की सुरक्षा में निहित होती है।
