क्या भारत “संयम आधारित अर्थनीति” की ओर बढ़ रहा है?
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
क्या भारत “संयम आधारित अर्थनीति” की ओर बढ़ रहा है?
जब किसी राष्ट्र का प्रधानमंत्री जनता से यह कहे कि विदेशी यात्राएँ कम कीजिए, सोना मत खरीदिए, खाने के तेल की खपत घटाइए और वर्क फ्रॉम होम को प्राथमिकता दीजिए, तब उस अपील को केवल एक सामान्य प्रशासनिक सलाह मान लेना पर्याप्त नहीं होता। ऐसी अपीलें अक्सर उस गहरे आर्थिक और वैश्विक संकटबोध का संकेत होती हैं, जिसे सत्ता सार्वजनिक रूप से पूरी स्पष्टता से स्वीकार नहीं करती, परंतु जिसके दबाव को वह महसूस कर रही होती है।
भारत आज एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहाँ विकास, उपभोग, संसाधन और आत्मनिर्भरता के पुराने समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। पिछले तीन दशकों में भारत ने जिस आर्थिक मॉडल को अपनाया, उसका मूल आधार था—तेज़ उपभोग, शहरी विस्तार, वैश्विक बाज़ार से गहरा जुड़ाव और निरंतर बढ़ती ऊर्जा-आवश्यकताएँ। यह मॉडल एक ऐसे भारत की कल्पना करता था जहाँ अधिक उपभोग ही अधिक विकास का प्रतीक बने। बड़ी गाड़ियाँ, अधिक यात्रा, विशाल मॉल, तेज़ी से बढ़ता आयात, विदेशी ब्रांड, ऊँची ऊर्जा खपत—इन सबको आधुनिकता और समृद्धि के संकेत के रूप में प्रस्तुत किया गया लेकिन अब विश्व बदल रहा है।
ऊर्जा संकट, जलवायु परिवर्तन, वैश्विक युद्ध, आपूर्ति शृंखला की अस्थिरता, डॉलर पर निर्भरता, खाद्य असुरक्षा और भू-राजनीतिक तनावों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि असीमित उपभोग पर आधारित विकास मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकता। रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर पश्चिम एशिया के तनावों तक, हर घटना ने भारत जैसे देशों को यह याद दिलाया है कि उनकी अर्थव्यवस्था अब भी भारी मात्रा में बाहरी संसाधनों पर निर्भर है। भारत अपने कच्चे तेल का अधिकांश हिस्सा आयात करता है, खाद्य तेलों के लिए विदेशों पर निर्भर है, सोने का विशाल आयात करता है और वैश्विक व्यापारिक अस्थिरता का सीधा प्रभाव उसकी मुद्रा और महंगाई पर पड़ता है।
ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या भारत धीरे-धीरे “संयम आधारित अर्थनीति” की ओर बढ़ रहा है? संभवतः हाँ। लेकिन यह संयम केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि एक व्यापक सभ्यतागत प्रश्न भी है।
बीसवीं सदी का विकास मॉडल मनुष्य को मुख्यतः “उपभोक्ता” के रूप में देखता था। उसकी सफलता इस बात से मापी जाती थी कि वह कितना खरीद सकता है, कितना खर्च कर सकता है और कितना उपभोग कर सकता है। लेकिन इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक तक आते-आते दुनिया यह महसूस करने लगी है कि पृथ्वी के संसाधन सीमित हैं, ऊर्जा की कीमतें अस्थिर हैं और प्रकृति लगातार चेतावनी दे रही है।
भारत के सामने चुनौती और भी जटिल है, क्योंकि यहाँ अभी भी करोड़ों लोग बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। पश्चिमी देशों ने पहले अत्यधिक उपभोग के सहारे समृद्धि हासिल की और अब वे “ग्रीन इकॉनमी” तथा “सस्टेनेबिलिटी” की बात कर रहे हैं। भारत को एक साथ दो यात्राएँ करनी हैं—विकास भी और संसाधन-संतुलन भी। यही उसकी सबसे बड़ी दुविधा है लेकिन यहाँ सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या केवल नागरिकों की आदतें बदल देना पर्याप्त होगा?
क्या जनता से यह कह देना कि कम तेल इस्तेमाल करें, कम यात्रा करें, कम खरीदें—समस्या का समाधान है?
उत्तर है—नहीं।
यदि किसी राष्ट्र को वास्तव में संयम आधारित और टिकाऊ अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना है, तो सबसे पहले उसके विकास मॉडल में गहरे संरचनात्मक परिवर्तन करने होंगे।
उदाहरण के लिए, यदि सरकार चाहती है कि ईंधन की खपत कम हो, तो केवल नागरिकों से कम गाड़ी चलाने की अपील पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए सार्वजनिक परिवहन को इतना सुलभ, सुरक्षित और आधुनिक बनाना होगा कि लोग स्वेच्छा से निजी वाहनों पर निर्भरता घटाएँ। यदि खाद्य तेल आयात कम करना है, तो किसानों को वैकल्पिक तिलहन उत्पादन के लिए मजबूत समर्थन देना होगा। यदि विदेशी निर्भरता घटानी है, तो स्थानीय उत्पादन, विकेंद्रीकृत उद्योग और तकनीकी आत्मनिर्भरता को गंभीरता से विकसित करना होगा और सबसे महत्वपूर्ण बात—संयम केवल जनता के लिए नहीं हो सकता।
यदि आम नागरिक से त्याग और बचत की अपेक्षा की जाए, जबकि दूसरी ओर सत्ता-प्रदर्शन, भव्य सरकारी आयोजन, असीमित चुनावी खर्च, कॉर्पोरेट उपभोग और विलासितापूर्ण जीवनशैली वैसी ही बनी रहे, तो ऐसी अपीलें नैतिक विश्वसनीयता खो देती हैं। किसी भी समाज में संयम की संस्कृति ऊपर से नीचे आती है। जब सत्ता स्वयं सादगी का उदाहरण प्रस्तुत करती है, तभी जनता त्याग को साझा राष्ट्रीय दायित्व के रूप में स्वीकार करती है।
दरअसल भारत आज केवल आर्थिक संकट से नहीं, बल्कि विकास की अवधारणा के संकट से भी जूझ रहा है। दशकों तक यह माना गया कि जीडीपी वृद्धि ही प्रगति का अंतिम पैमाना है। लेकिन अब प्रश्न उठ रहे हैं—
* यदि विकास के बावजूद वायु विषैली हो जाए तो?
* यदि शहर रहने लायक न बचें तो?
* यदि जल संकट बढ़ता जाए तो?
* यदि खेती असुरक्षित हो जाए तो?
* यदि आर्थिक विकास के साथ मानसिक तनाव, सामाजिक असमानता और पारिस्थितिक विनाश भी बढ़े तो?
# क्या केवल अधिक उत्पादन और अधिक उपभोग ही प्रगति है?
संभवतः आने वाले समय में भारत को विकास की ऐसी नई परिभाषा गढ़नी होगी जिसमें केवल बाज़ार नहीं, मनुष्य और प्रकृति भी केंद्र में हों। जहाँ आत्मनिर्भरता केवल राजनीतिक नारा न होकर स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करने की वास्तविक प्रक्रिया बने। जहाँ ऊर्जा नीति केवल पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों तक सीमित न रहे, बल्कि सौर ऊर्जा, सार्वजनिक परिवहन, हरित शहरीकरण और टिकाऊ जीवनशैली से जुड़ सके।
विडंबना यह है कि “संयम” की अवधारणा भारत की सांस्कृतिक परंपरा में नई नहीं है। भारतीय दर्शन ने सदियों तक “अपरिग्रह”, “मितव्ययिता” और “संतुलित उपभोग” की बात की। लेकिन उदारीकरण के बाद का भारत धीरे-धीरे उस वैश्विक उपभोक्तावादी संस्कृति का हिस्सा बन गया जहाँ अधिक खरीदना ही सफलता का प्रतीक बना दिया गया। अब शायद इतिहास एक विचित्र मोड़ पर खड़ा है—जहाँ आधुनिक आर्थिक संकट भारत को फिर उसी प्रश्न की ओर लौटा रहे हैं कि विकास और संयम के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
लेकिन यह संतुलन केवल नैतिक उपदेशों से नहीं बनेगा। इसके लिए आर्थिक नीतियों, शहरी संरचनाओं, ऊर्जा व्यवस्था, कृषि मॉडल और उपभोग संस्कृति—सबमें गहरे परिवर्तन करने होंगे।
क्योंकि अंततः कोई भी राष्ट्र केवल नागरिकों के त्याग से नहीं बदलता; वह तब बदलता है जब उसकी व्यवस्था भी अपने विकास के दर्शन पर पुनर्विचार करने का साहस दिखाए।
