राष्ट्रवाद, त्याग और मुनाफे का नया गणित
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
राष्ट्रवाद, त्याग और मुनाफे का नया गणि
भारत आज केवल आर्थिक संकटों, महंगाई या ऊर्जा निर्भरता के दौर से नहीं गुजर रहा; वह “राष्ट्रहित” की बदलती परिभाषाओं के दौर से भी गुजर रहा है। यह वह समय है जहाँ राष्ट्रवाद धीरे-धीरे एक भावनात्मक विचार से अधिक एक राजनीतिक-आर्थिक उपकरण में बदलता दिखाई देता है। एक ऐसा उपकरण, जिसके सहारे जनता से त्याग माँगा जाता है, लेकिन सत्ता और पूंजी के गठजोड़ पर वैसी नैतिक कठोरता लागू नहीं होती।
जब देश के प्रधानमंत्री नागरिकों से कहते हैं कि तेल कम इस्तेमाल करें, सोना न खरीदें, विदेश यात्राएँ घटाएँ और उपभोग सीमित करें, तब स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या राष्ट्र के आर्थिक संकट का बोझ समान रूप से बाँटा जा रहा है? या फिर त्याग की नैतिकता केवल समाज के निचले और मध्य वर्गों के लिए आरक्षित कर दी गई है?
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत को रियायती दरों पर रूसी कच्चा तेल मिला। यह वैश्विक भू-राजनीति का वह अवसर था जिसने भारत को अरबों डॉलर बचाने की क्षमता दी। सरकार ने इसे रणनीतिक सफलता के रूप में प्रस्तुत भी किया। लेकिन इसके समानांतर जनता ने अपने जीवन में क्या महसूस किया? पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में क्या वैसी राहत आई जिसकी अपेक्षा की जा रही थी? क्या परिवहन सस्ता हुआ? क्या खाद्य पदार्थों की कीमतों में कमी आई? यहीं से असली प्रश्न शुरू होते हैं।
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें गिरती हैं, लेकिन घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतें लंबे समय तक ऊँची बनी रहती हैं, तब नागरिक यह महसूस करने लगते हैं कि वैश्विक लाभ का सामाजिक वितरण समान नहीं है। इसी बिंदु पर सत्ता और कॉर्पोरेट के संबंधों को लेकर संदेह जन्म लेते हैं। निजी रिफाइनरियों और बड़े औद्योगिक समूहों के बढ़ते मुनाफे के बीच आम नागरिक की लगातार महंगी होती जिंदगी एक नैतिक असंतुलन पैदा करती है।
यह आवश्यक नहीं कि हर कॉर्पोरेट लाभ अपने-आप में अनैतिक हो। समस्या तब उत्पन्न होती है जब जनता को “राष्ट्रहित” के नाम पर संयम का उपदेश दिया जाए, लेकिन आर्थिक लाभ का बड़ा हिस्सा चुनिंदा समूहों में केंद्रित होता दिखाई दे। लोकतंत्र में आर्थिक नीतियाँ केवल विकास दर से नहीं, बल्कि इस प्रश्न से भी परखी जाती हैं कि विकास का लाभ किसे मिल रहा है और उसका बोझ कौन उठा रहा है।
यही कारण है कि आज “राष्ट्रवाद” और “आर्थिक न्याय” का संबंध एक गंभीर बहस का विषय बन चुका है। राष्ट्रवाद यदि केवल भावनात्मक लामबंदी का माध्यम बन जाए और आर्थिक असमानताओं पर प्रश्न पूछना “राष्ट्र-विरोध” जैसा प्रतीत कराया जाने लगे, तो लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर पड़ने लगता है।
समस्या केवल तेल या महंगाई तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक आर्थिक मॉडल का प्रश्न है जिसमें सार्वजनिक संसाधनों, अवसंरचनाओं और रणनीतिक क्षेत्रों का निजीकरण तेज़ी से बढ़ा है। हवाई अड्डे, बंदरगाह, ऊर्जा क्षेत्र, खनन, दूरसंचार—इन सभी क्षेत्रों में कुछ बड़े कॉर्पोरेट समूहों का बढ़ता प्रभाव स्वाभाविक रूप से राजनीतिक प्रश्नों को जन्म देता है। लोकतंत्र में यह पूछना अस्वाभाविक नहीं कि क्या आर्थिक शक्ति का अत्यधिक केंद्रीकरण अंततः राजनीतिक शक्ति को भी प्रभावित करता है? और यही वह बिंदु है जहाँ जनता सत्ता की नैतिक विश्वसनीयता को परखती है।
यदि देश आर्थिक दबाव में है, तो क्या सत्ता-संरचनाएँ स्वयं भी सादगी का पालन कर रही हैं? क्या चुनावी राजनीति का अत्यधिक खर्च, विशाल प्रचार अभियानों की संस्कृति और व्यक्तित्व-आधारित राजनीतिक प्रदर्शन उस “संयम” के अनुरूप हैं जिसकी अपेक्षा जनता से की जा रही है?
यह विरोधाभास जितना आर्थिक है, उतना ही मनोवैज्ञानिक भी। एक ओर करोड़ों लोग मुफ्त राशन योजनाओं पर निर्भर हैं, दूसरी ओर चुनावी राजनीति में अभूतपूर्व धन-संचय दिखाई देता है। इससे लोकतंत्र में एक नई असमानता जन्म लेती है—राजनीतिक पूंजी की असमानता। जब एक दल या सत्ता-संरचना आर्थिक संसाधनों पर अत्यधिक नियंत्रण स्थापित कर लेती है, तब लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा भी धीरे-धीरे असंतुलित होने लगती है।
फिर भी इस पूरी बहस में संतुलन आवश्यक है। हर आर्थिक संकट को केवल “षड्यंत्र” कह देना उतना ही सरलीकरण होगा जितना हर सरकारी नीति को “राष्ट्रहित” मान लेना। वैश्विक अर्थव्यवस्था वास्तव में अस्थिर दौर से गुजर रही है। ऊर्जा संकट, युद्ध, डॉलर आधारित व्यापार प्रणाली, जलवायु परिवर्तन और आपूर्ति शृंखला की बाधाएँ वास्तविक चुनौतियाँ हैं। भारत जैसे विकासशील देश इन दबावों से पूरी तरह अछूते नहीं रह सकते।
लेकिन लोकतंत्र की शक्ति यही है कि वह नागरिकों को प्रश्न पूछने का अधिकार देता है। यदि जनता त्याग कर रही है, तो उसे पारदर्शिता भी चाहिए। यदि राष्ट्रहित में संयम आवश्यक है, तो सत्ता और पूंजी दोनों को भी उसी नैतिक कसौटी पर खरा उतरना होगा। राष्ट्रवाद का अर्थ केवल भावनात्मक एकता नहीं हो सकता; उसका अर्थ आर्थिक न्याय, संसाधनों का संतुलित वितरण और सार्वजनिक उत्तरदायित्व भी होना चाहिए।
दरअसल आज भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि तेल कितना महंगा है या सोना कितना आयात हो रहा है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या विकास का वर्तमान मॉडल सामाजिक विश्वास को बनाए रख पा रहा है? क्योंकि कोई भी राष्ट्र केवल नारों से नहीं चलता; वह इस भरोसे पर चलता है कि संकट के समय त्याग और लाभ दोनों का वितरण न्यायपूर्ण होगा।
यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि राष्ट्रवाद का आह्वान केवल उसके धैर्य को बनाए रखने के लिए है, जबकि आर्थिक शक्ति कुछ हाथों में केंद्रित होती जा रही है, तब लोकतांत्रिक असंतोष गहरा होने लगता है। इतिहास गवाह है कि समाज केवल गरीबी से नहीं टूटते; वे तब टूटते हैं जब उन्हें लगता है कि व्यवस्था न्यायपूर्ण नहीं रही।
इसलिए आज आवश्यकता केवल आर्थिक सुधारों की नहीं, बल्कि नैतिक पारदर्शिता की भी है। जनता को न केवल अपीलें चाहिएँ, बल्कि उत्तर भी चाहिएँ। क्योंकि अंततः राष्ट्र वही मजबूत होता है जहाँ नागरिकों से त्याग माँगने से पहले सत्ता स्वयं जवाबदेही का उदाहरण प्रस्तुत करे।
