मंदी आँच की दाल : एक आम भारतीय स्त्री का महाकाव्य

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 

 मंदी आँच की दाल : एक आम भारतीय स्त्री का महाकाव्य

प्रस्तावना : जब मैं भारतीय स्त्री के बारे में सोचता हूँ

जब मैं एक आम भारतीय स्त्री के बारे में सोचता हूँ, तो मेरे मन में सबसे पहले कोई चेहरा नहीं उभरता। कोई अभिनेत्री, कोई देवी की प्रतिमा, कोई साहित्यिक नायिका नहीं। मेरे भीतर सबसे पहले एक रसोई की धीमी गंध उतरती है। पीतल की देगची में मंदी आँच पर पकती पतली दाल की महक। हींग और जीरे का हल्का छौंक। ऊपर तैरती घी की एक छोटी-सी बूँद, जो जैसे पूरे घर की आत्मा हो।

वह दाल देखने में साधारण होती है। उसमें न मेवों का वैभव है, न मसालों का शोर। पर उसी में वह स्वाद होता है जो किसी पाँच सितारा होटल की चमकदार थाली में भी नहीं मिलता। उसमें एक बार रोटी डुबो लो, तो भूख केवल पेट की नहीं रहती, मन की भी हो जाती है। चावल में मिला लो, तो तृप्ति के बाद भी जीभ कहती है — बस एक कौर और।


भारतीय स्त्री भी वैसी ही है। वह दिखावे की आँधी नहीं, जीवन की धीमी आँच है। वह घर की दीवारों पर टंगी तस्वीर नहीं, उन दीवारों को जोड़े रखने वाला अदृश्य गारा है। वह अक्सर साधारण दिखाई देती है, इतनी साधारण कि दुनिया उसे अनदेखा कर देती है। पर जिस दिन वह घर में नहीं होती, उसी दिन समझ आता है कि घर केवल ईंट, लकड़ी और सीमेंट का ढाँचा नहीं होता; घर एक स्त्री की उपस्थिति से घर होता है।


मैं यह आलेख किसी विचारधारा से नहीं लिख रहा। यह किसी आंदोलन का घोषणापत्र नहीं है। यह उस मौन संसार को प्रणाम है, जो हमारे बीच रहकर भी सबसे कम सुना गया। यह उन स्त्रियों की कथा है जो हर दिन अपने छोटे-छोटे कर्मों से संसार को टूटने से बचाती हैं।


वे स्त्रियाँ जो इतिहास की किताबों में नहीं मिलतीं, पर जिनकी उँगलियों की गंध से इतिहास बचा रहता है।


1. वह सुबह जो उसके उठने से शुरू होती है


भारतीय घरों में सुबह सूरज से पहले नहीं होती, स्त्री से पहले होती है। शहर अभी नींद में डूबा होता है। सड़कों पर धुंध की पतली चादर पड़ी होती है। कहीं दूर किसी मंदिर की घंटी भी नहीं बजी होती। तभी वह उठती है।


उसे कोई अलार्म नहीं जगाता। जिम्मेदारियाँ जगाती हैं। बच्चों का स्कूल, पति का दफ्तर, बूढ़ी सास की दवा, रसोई का काम, पानी भरना, दूध गरम करना — यह सब उसके भीतर किसी अदृश्य घड़ी की तरह टिक-टिक करता रहता है।


वह धीरे से उठती है ताकि किसी की नींद न टूटे। उसके पैर की चप्पल भी आवाज नहीं करती। वह रात भर खुली चोटी को समेटती है। कभी जल्दी में जूड़ा बना लेती है, कभी दो मिनट निकालकर चोटी गूँथती है। कंघी में फँसे बालों को खिड़की से बाहर झटक देती है, जैसे रात भर के सपने हवा में छोड़ रही हो।


फिर वह अपनी साड़ी ठीक करती है। वह साड़ी कोई नई रेशमी बनारसी नहीं होती। वही पुरानी सूती साड़ी होती है, जिसे उसने कल रात तह करके रखा था। पल्लू को वह इस तरह सँभालती है जैसे कोई सैनिक अपना कवच पहनता है। एक छोटी-सी सेफ्टी पिन से उसे ब्लाउज में टिका देती है ताकि काम करते समय फिसले नहीं।


फिर वह आईने के सामने खड़ी होती है। केवल दो क्षण के लिए। वह अपनी बिंदी की डिबिया खोलती है। उँगली पर लाल बिंदी रखती है और माथे के बीचोंबीच सजा देती है। यही उसका श्रृंगार है। यही उसका आत्मविश्वास है। यही उसका मौन उद्घोष है कि वह इस घर की धुरी है।


उसके चेहरे पर कोई महँगा मेकअप नहीं होता। केवल नहाए हुए शरीर की ताजगी होती है। आँखों में नींद की बची हुई नमी होती है। होंठों पर अधूरी मुस्कान होती है। और वही मुस्कान पूरे घर को जगाने के लिए पर्याप्त होती है।


जब वह रसोई में गैस जलाती है, तो सबसे पहले चाय चढ़ाती है। पानी के उबलने की आवाज, अदरक कूटने की धीमी थाप, चायपत्ती की सुगंध — यही भारतीय घरों का वास्तविक संगीत है। उसी संगीत के बीच वह कभी कोई पुराना फिल्मी गीत गुनगुनाती है, कभी भजन, और कभी बिना शब्दों का कोई सुर।


वह आवाज लगाती है — “उठ जाओ, सुबह हो गई।”


उस आवाज में आदेश नहीं होता, अपनापन होता है। वह घर को जगाती नहीं, घर को बाँधती है। बच्चे कंबल में और दुबक जाते हैं, पति करवट बदलता है, पर सब जानते हैं कि दिन की शुरुआत उसी आवाज से होगी।


कभी-कभी मैं सोचता हूँ, यदि एक दिन वह स्त्री सुबह न उठे तो क्या होगा?


चाय देर से बनेगी। बच्चों की बस छूट जाएगी। किसी का टिफिन अधूरा रह जाएगा। दफ्तर पहुँचने में देर होगी। और तब सबको पहली बार समझ आएगा कि घर अपने आप नहीं चलता। किसी स्त्री की नींद टूटने से चलता है।


2. उसका अधूरा रह गया संसार


हर भारतीय स्त्री के भीतर एक दूसरा जीवन भी होता है। एक ऐसा जीवन जो उसने जिया नहीं, केवल टाल दिया।


वह भी कभी कॉलेज गई थी। उसकी भी सहेलियाँ थीं। उसने भी कभी किसी नोटबुक के आखिरी पन्ने पर अपना नाम अलग-अलग हस्ताक्षरों में लिखा होगा। उसने भी कभी सोचा होगा कि वह अध्यापिका बनेगी, डॉक्टर बनेगी, अधिकारी बनेगी, गायिका बनेगी।


पर फिर जीवन ने उससे कहा — “घर को तुम्हारी जरूरत है।”


और उसने बिना शोर किए अपने सपनों को तह करके संदूक में रख दिया। ठीक वैसे ही जैसे वह अपनी अच्छी साड़ी किसी त्योहार के लिए बचाकर रख देती है।


यह त्याग उसने किसी मजबूरी में ही किया हो, ऐसा भी नहीं। कई बार यह प्रेम था। कई बार यह भरोसा था कि यदि वह बाहर जाएगी तो घर कौन संभालेगा। कई बार यह संस्कार था। कई बार यह परिस्थिति थी। और कई बार यह सब कुछ एक साथ था।


उसने अपने जीवन का सबसे सुंदर हिस्सा दूसरों के जीवन को सुंदर बनाने में लगा दिया।


उसके पास कोई वेतन नहीं आता। कोई प्रमोशन नहीं मिलता। कोई वार्षिक अवकाश नहीं होता। उसका मूल्यांकन कभी नहीं होता। पर यदि एक दिन वह बीमार पड़ जाए, तभी पता चलता है कि वह केवल एक व्यक्ति नहीं, पूरे घर की व्यवस्था है।


कितनी अजीब बात है कि दुनिया उस पुरुष को सफल कहती है जो लाखों कमाता है, पर उस स्त्री को साधारण कह देती है जिसने पूरी पीढ़ी गढ़ दी।


वह बच्चों को केवल खाना नहीं खिलाती, संस्कार भी खिलाती है। वह उन्हें केवल कपड़े नहीं पहनाती, मनुष्यता पहनाती है। वह उन्हें केवल स्कूल नहीं भेजती, जीवन के लिए तैयार करती है।


और यह सब करते हुए वह स्वयं धीरे-धीरे पीछे चली जाती है।


उसकी पसंद की मिठाई घर में सबसे अंत में आती है। उसकी नई साड़ी सबसे बाद में खरीदी जाती है। उसकी थकान सबसे कम महत्वपूर्ण मानी जाती है। उसका बुखार भी अक्सर रसोई में खड़े-खड़े उतर जाता है।


फिर भी उसने शिकायत करना नहीं सीखा।


भारतीय स्त्री का सबसे बड़ा दुख यह नहीं कि उसे बहुत काम करना पड़ता है। उसका सबसे बड़ा दुख यह है कि उसके काम को प्रेम मान लिया जाता है, श्रम नहीं।


## 3. दोपहर का अकेलापन और प्रतीक्षा की छाया


सुबह की भागदौड़ समाप्त होते-होते दोपहर उतर आती है। बच्चे स्कूल जा चुके होते हैं। पति दफ्तर निकल चुका होता है। बर्तन माँज दिए गए होते हैं। झाड़ू लग चुकी होती है। छत पर कपड़े हवा में फड़फड़ा रहे होते हैं।


अब घर में एक अजीब सन्नाटा फैल जाता है।


वह स्त्री उसी घर में अकेली रह जाती है, जिसे उसने सुबह तक जीवन से भर दिया था।


कई बार वह एक कुर्सी पर बैठ जाती है। कई बार दरी बिछाकर थोड़ी देर लेट जाती है। कभी पुराने डिब्बे ठीक करती है। कभी अलमारी की तहें जमाती है। कभी पुराने कपड़ों को काटकर पोछा बनाती है।


भारतीय स्त्री चीजों को फेंकती नहीं। वह टूटे हुए कप से पौधा उगा देती है। पुरानी साड़ी से परदा बना देती है। बच्चों की छोटी हो चुकी कमीज से तकिए का गिलाफ बना देती है। वह केवल वस्तुएँ नहीं बचाती, जीवन बचाती है।


उसका मन दरवाजे की ओर लगा रहता है। उसे पता है कि थोड़ी देर में स्कूल की बस आएगी। थोड़ी देर में दरवाजे पर घंटी बजेगी। और तभी उसका संसार फिर से साँस लेने लगेगा।


जब बच्चे दौड़ते हुए घर में आते हैं और “मम्मी!” कहकर उससे लिपट जाते हैं, तो वह सचमुच खिल उठती है। उसके चेहरे की थकान धुल जाती है।


बच्चों का वह आलिंगन उसके लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं होता।


वह पूछती है — “खाना खाया था? पानी पिया था? किसी ने मारा तो नहीं?”


बच्चे अपनी कॉपियाँ खोलकर दिखाते हैं। वह हर छोटी उपलब्धि पर ऐसे खुश होती है जैसे कोई बड़ी जीत मिल गई हो। बच्चे ने ‘स्टार’ बना लिया, तो उसका दिन सफल हो गया। बच्चे ने कविता याद कर ली, तो उसका मन भर आया।


फिर वह उन्हें खाना परोसती है। पहले उन्हें खिलाती है। खुद बाद में खाती है। कई बार बचा हुआ खाती है। कई बार ठंडी रोटी खाती है। पर उसके चेहरे पर कभी शिकायत नहीं होती।


भारतीय स्त्री के जीवन में प्रेम का अर्थ ही यही है — पहले तुम।


4. उसके हाथों की गंध


भारतीय स्त्री को पहचानना हो तो उसके हाथों को देखिए।


उन हाथों में नेलपॉलिश नहीं भी हो सकती, पर उनमें जीवन की सबसे सुंदर गंध होती है। आटे की गंध। हल्दी की गंध। बच्चों के तेल लगे बालों की गंध। धुले हुए कपड़ों की गंध। मंदिर के फूलों की गंध।


उन हाथों ने जाने कितने माथों का ताप जाँचा है। कितनी बार बुखार में तपते बच्चे के सिर पर रात भर पानी की पट्टियाँ रखी हैं। कितनी बार पति के माथे पर हाथ रखकर पूछा है — “तबीयत ठीक है?”


उन्हीं हाथों ने स्कूल प्रोजेक्ट बनाए हैं। उन्हीं हाथों ने परीक्षा के दिनों में देर रात तक चाय बनाई है। उन्हीं हाथों ने त्योहारों पर रंगोली बनाई है। उन्हीं हाथों ने बूढ़े माँ-बाप के पैर दबाए हैं।


पर उन्हीं हाथों को अक्सर कोई पकड़ता नहीं।


हम उनके हाथों को केवल काम करते हुए देखते हैं। कभी थामते नहीं। कभी चूमते नहीं। कभी यह नहीं कहते कि इन हाथों ने हमारा जीवन आसान बनाया है।


एक भारतीय स्त्री का सबसे बड़ा सौंदर्य उसके हाथों में होता है। क्योंकि वे हाथ केवल शरीर नहीं छूते, भाग्य गढ़ते हैं।


5. शाम की वह थकान जो प्रेम में बदल जाती है


शाम को जब पति घर लौटता है, तब उसके साथ केवल शरीर नहीं लौटता; पूरे दिन की धूल, तनाव, अपमान और संघर्ष भी लौटते हैं।


उसकी शर्ट पर पसीने की हल्की गंध होती है। माथे पर थकान होती है। आँखों में दिन भर का बोझ।


दुनिया उस गंध को पसीना कहेगी। वह स्त्री उसे अपने घर की मेहनत की खुशबू कहती है।


वह दरवाजा खोलती है। पानी देती है। पूछती है — “बहुत थक गए?”


यह प्रश्न छोटा है, पर इसमें संसार का सारा अपनापन छिपा होता है।


उसे याद रहता है कि पति को चाय में चीनी कम पसंद है। उसे याद रहता है कि आज उसके गले में खराश थी, इसलिए अदरक ज्यादा डालनी है। उसे याद रहता है कि महीने का अंत है, इसलिए खर्च थोड़ा सँभालकर करना है।


वह स्त्री छोटी-छोटी बातों से घर को बचाती है।


कई बार पति चुप रहता है। काम का तनाव उसे कठोर बना देता है। वह बिना बात झुँझला पड़ता है। ऊँची आवाज में बोल देता है।


स्त्री चुप रह जाती है। यह चुप्पी उसकी हार नहीं, घर को टूटने से बचाने की उसकी कला है।


भारतीय स्त्री को बहस जीतना नहीं आता। उसे रिश्ते बचाना आता है।


रात को जब वह पति की शर्ट धोने जाती है, तो कई बार वह कॉलर को देर तक देखती रहती है। उस पर दिन भर की धूल लगी होती है। और उसे लगता है कि यह धूल केवल कपड़े की नहीं, उस संघर्ष की है जो उसके परिवार के लिए लड़ा गया।


वह उस शर्ट को साबुन से रगड़ती है, जैसे दिन भर की थकान भी धो देना चाहती हो।


6. प्रेम जो कहा नहीं जाता


भारतीय स्त्रियाँ प्रेम को शब्दों से कम, व्यवहार से अधिक व्यक्त करती हैं।


वे “आई लव यू” कम कहती हैं, पर रात में उठकर देखती हैं कि आपने कंबल ओढ़ा या नहीं। वे फूल कम माँगती हैं, पर आपकी पसंद का खाना बिना बताए बना देती हैं। वे प्रेमपत्र नहीं लिखतीं, पर टिफिन में अतिरिक्त रोटी रख देती हैं क्योंकि उन्हें पता है आज आपको देर हो सकती है।


उनका प्रेम शोर नहीं करता। वह धीमी बारिश की तरह गिरता है।


कभी आपने गौर किया है कि भारतीय स्त्री खुद बीमार होने पर भी सबसे पहले दूसरों की चिंता करती है?


उसे तेज बुखार हो, तब भी वह पूछेगी — “बच्चों ने खाना खा लिया?”


यह केवल संस्कार नहीं, प्रेम की चरम अवस्था है।


मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि भारतीय स्त्रियाँ अपने भीतर बहुत कुछ दबाकर रख लेती हैं। वे रोती भी हैं तो तकिए में मुँह छिपाकर। वे टूटती भी हैं तो रसोई में काम करते हुए। वे अपने दुखों को आँचल में बाँध लेती हैं ताकि घर पर असर न पड़े।


कितनी विचित्र बात है — जिन स्त्रियों ने सबको सहारा दिया, उन्हें सहारा देने का समय किसी के पास नहीं होता।


7. रात : जब संसार शांत हो जाता है


रात धीरे-धीरे उतरती है। बच्चे सो जाते हैं। रसोई के बर्तन धुल जाते हैं। टेलीविजन बंद हो जाता है। घर का शोर नींद में बदल जाता है।


अब केवल दो लोग बचे होते हैं — पति और पत्नी।


दिन भर के दो थके हुए मनुष्य।


वह उसके पास लेटती है। उसके सीने पर सिर रखती है। उसे दिन भर की गर्मी महसूस होती है। वह कुछ कहना चाहती है। बहुत कुछ। पर कई बार शब्द नहीं मिलते।


तब केवल मौन बोलता है।


वह उसका हाथ पकड़ लेती है। वह उसके बालों में उँगलियाँ फेरता है। बाहर रात गहरी होती जाती है। भीतर दो लोगों का संसार धीरे-धीरे शांत होता जाता है।


उस क्षण में कोई बड़ा संवाद नहीं होता, कोई नाटकीय वचन नहीं होते। केवल दो थके हुए जीवन एक-दूसरे में थोड़ी शरण खोज रहे होते हैं। वह उसकी हथेली की गर्मी में अपना दिन उतार देती है। वह उसकी साँसों की लय में अपने संघर्ष भूलने लगता है।


कभी वह धीमे से पूछती है — “बहुत परेशानी थी आज?” और वह केवल “हूँ” कहकर रह जाता है। पर वह उस एक ध्वनि के भीतर छिपा पूरा दिन पढ़ लेती है। यही तो भारतीय स्त्री का अद्भुत गुण है — वह शब्दों से अधिक मौन समझती है।


वह उसके माथे पर हाथ फेरती है जैसे किसी छोटे बच्चे को सहला रही हो। वह पुरुष, जो दिन भर दुनिया के सामने कठोर बना रहा, उस स्पर्श में कुछ क्षणों के लिए नर्म हो जाता है। उसकी आँखों की थकान ढीली पड़ जाती है।


रात की उस शांति में प्रेम किसी उत्सव की तरह नहीं आता, वह धीरे-धीरे धूप की तरह उतरता है। एक-दूसरे के पास लेटे हुए वे दोनों अपने भीतर की अधूरी बातें महसूस करते रहते हैं।


कई बार वह कुछ कहना चाहती है — अपने डर, अपनी थकान, अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं के बारे में। पर फिर सोचती है, “सुबह इन्हें फिर जल्दी उठना है।” और वह अपनी बातों को वापस मन में रख लेती है।


भारतीय स्त्री का प्रेम कई बार इसी त्याग में सबसे अधिक दिखाई देता है — वह अपनी तकलीफ़ भी इसलिए टाल देती है ताकि सामने वाले की नींद न टूटे।


भारतीय विवाह केवल सामाजिक संस्था नहीं, दो थकानों का एक-दूसरे में विश्राम पाना भी है।


वह उसके कंधे पर सिर रखकर सोना चाहती है क्योंकि पूरे दिन उसने सबको संभाला है; अब वह स्वयं किसी की बाँहों में कुछ देर बच्ची बन जाना चाहती है।


कई बार पति सो जाता है, पर वह देर तक जागती रहती है। उसकी साँसों की लय सुनती रहती है। उसे देखती रहती है। सोचती है — “भगवान, इसे सुरक्षित रखना।”


यही भारतीय स्त्री का प्रेम है। प्रार्थना में बदल चुका प्रेम।


8. तारीफ की भूखी देवी


भारतीय स्त्री को बहुत कुछ नहीं चाहिए। उसे केवल यह चाहिए कि उसके प्रेम को देखा जाए।


जब आप कहते हैं — “आज दाल बहुत अच्छी बनी है”, तो उसके चेहरे पर जो चमक आती है, वह किसी हीरे से अधिक कीमती होती है।


जब आप उसका हाथ पकड़ लेते हैं, तो उसे लगता है कि उसकी सारी मेहनत सफल हो गई। जब आप उसके माथे को चूम लेते हैं, तो उसका पूरा दिन हल्का हो जाता है।


वह महँगे उपहारों से अधिक छोटे स्नेह पर जीवित रहती है।


दुर्भाग्य यह है कि भारतीय पुरुष अक्सर प्रेम को जिम्मेदारी समझ लेते हैं और स्त्रियाँ जिम्मेदारी को प्रेम। इसी गलतफहमी में जीवन बीत जाता है।


स्त्री खाना बनाती रहती है, पुरुष कमाते रहते हैं, बच्चे बड़े होते रहते हैं — पर “धन्यवाद” शब्द कहीं खो जाता है।


कभी किसी भारतीय स्त्री से सचमुच पूछिए — “तुम थक जाती हो क्या?”


संभव है वह पहले हँस दे। फिर शायद उसकी आँखें भर आएँ। क्योंकि वर्षों बाद किसी ने उसकी थकान को देखा होगा।


9. उसकी देह में बसता श्रम


यदि आप किसी भारतीय स्त्री को केवल बाहरी सुंदरता से आँकेंगे, तो आपको बहुत कुछ अधूरा लगेगा। किसी के दाँत टेढ़े होंगे। किसी के बाल झड़ गए होंगे। किसी के हाथ खुरदरे होंगे। किसी की कमर भारी होगी।


पर उसके भीतर उतरिए।


उसके दाँतों के बीच वही सेफ्टी पिन दबती है जिससे वह आपके टूटे बटन लगाती है। उन्हीं हाथों से वह बच्चे का जूता बाँधती है। उन्हीं पैरों से वह पूरे घर में चक्कर लगाती है।


उसकी देह केवल सौंदर्य की वस्तु नहीं, श्रम का मंदिर है।


उसकी कमर इसलिए झुकी है क्योंकि उसने वर्षों तक पानी की बाल्टियाँ उठाई हैं। उसके हाथ इसलिए खुरदरे हैं क्योंकि उसने साबुन और बर्तनों में अपनी त्वचा घोल दी है। उसके पैरों में दरारें इसलिए हैं क्योंकि उसने घर की जमीन को अपने तलवों से सींचा है।


वह मोटी नहीं हुई, जीवन का भार उठाते-उठाते भर गई।


उसकी छाती में केवल दूध नहीं था; वहाँ एक पूरा संसार पलता रहा।


वह घर की नींव है। और नींव कभी दिखाई नहीं देती।


10. भारतीय स्त्री और त्यौहारों का सौंदर्य


यदि भारतीय स्त्रियाँ न होतीं, तो हमारे त्योहार केवल कैलेंडर की तारीखें रह जाते।


दीवाली पर घर की सफाई कौन करता? करवा चौथ पर चाँद का इंतजार कौन करता? होली पर गुजिया कौन बनाता? रक्षाबंधन पर राखी में प्रेम कौन पिरोता?


भारतीय स्त्री त्योहारों को केवल मनाती नहीं, उन्हें जीवित रखती है।


वह सुबह से रात तक काम करती है, पर शाम को आरती की थाली लेकर खड़ी होती है तो उसके चेहरे पर थकान नहीं, प्रकाश होता है।


वह अपने हाथों से घर को मंदिर बना देती है।


उसके बिना भारतीय संस्कृति की कल्पना भी अधूरी है।


11. माँ : पृथ्वी का दूसरा नाम


एक स्त्री जब माँ बनती है, तब वह केवल एक बच्चे को जन्म नहीं देती; वह स्वयं नए जन्म से गुजरती है।


रात-रात भर जागना, बच्चे के रोने पर घबरा जाना, बुखार में काँप उठना, स्कूल के पहले दिन उससे ज्यादा रोना — यह सब माँ होने की भाषा है।


माँ बच्चे को केवल पालती नहीं, अपने भीतर धीरे-धीरे घोल देती है।


बच्चा बड़ा हो जाता है। नौकरी पर चला जाता है। विवाह कर लेता है। पर माँ की आँखों में वह हमेशा वही रहता है जिसे उसने पहली बार गोद में लिया था।


भारतीय माँ का प्रेम समय से परे होता है।


वह बेटे के लिए अपनी पसंद छोड़ देती है। बेटी के लिए अपने गहने बेच देती है। परिवार के लिए अपने सपनों को स्थगित कर देती है।


और बदले में अक्सर उसे क्या मिलता है?


कभी-कभी केवल यह वाक्य — “आप समझती नहीं हो।”


फिर भी वह अगली सुबह उठकर वही करती है जो कल किया था। क्योंकि उसका प्रेम प्रतिफल पर नहीं टिका।


12. वृद्ध होती स्त्री का मौन


भारतीय स्त्री का सबसे मार्मिक रूप तब दिखाई देता है जब वह बूढ़ी होने लगती है।


बाल सफेद हो जाते हैं। आँखों पर मोटा चश्मा चढ़ जाता है। हाथ काँपने लगते हैं। घुटनों में दर्द रहने लगता है।


अब वह पहले की तरह तेज नहीं चल पाती।


जिस स्त्री ने कभी पूरे घर को दौड़ाकर रखा था, वही अब एक कोने में बैठकर धीरे-धीरे ऊन बुनती है। बच्चों के पुराने फोटो देखती है। मंदिर की माला फेरती है।


उसकी दुनिया छोटी होती जाती है।


पर उसके भीतर प्रेम कम नहीं होता।


बेटा देर से घर आए, तो आज भी वह दरवाजे की आहट सुनती रहती है। बेटी फोन न करे, तो उसका मन बेचैन हो जाता है। पोता बीमार हो जाए, तो वह खुद दवा खाने लगती है।


वृद्ध भारतीय स्त्री एक बुझता हुआ दीपक नहीं, आखिरी क्षण तक जलती हुई लौ होती है।


13. वह स्त्री जो इतिहास में नहीं लिखी गई


हमने इतिहास में राजाओं के नाम लिखे। युद्धों के नाम लिखे। साम्राज्यों के नाम लिखे।


पर उस स्त्री का नाम नहीं लिखा जिसने युद्ध पर जाते हुए पति की आरती उतारी थी। जिसने खेत में काम करते हुए बच्चों को पाला था। जिसने अकाल में खुद भूखा रहकर परिवार को खिलाया था।


भारत की असली सभ्यता राजमहलों में नहीं, रसोईघरों में बची रही।


जब दुनिया टूट रही थी, तब स्त्रियाँ चूल्हे जलाकर घर बचा रही थीं।


जब पुरुष युद्धों में थे, तब स्त्रियाँ बच्चों को भाषा सिखा रही थीं।


जब समाज बदल रहा था, तब स्त्रियाँ परंपरा और करुणा के बीच पुल बना रही थीं।


इसलिए यदि भारत आज भी केवल एक भूगोल नहीं, एक भाव है — तो उसमें सबसे बड़ा योगदान भारतीय स्त्री का है।


14. अंतिम प्रश्न : तुम कौन हो?


आम भारतीय स्त्री, तुम कौन हो?


तुम वह पहली चाय हो जो नींद और जिम्मेदारी के बीच पुल बनाती है। तुम वह दाल हो जो भूख को भोजन से अधिक अपनापन देती है। तुम वह बिंदी हो जो माथे पर नहीं, घर की आत्मा पर सजी होती है। तुम वह सेफ्टी पिन हो जो टूटती चीजों को चुपचाप जोड़ती रहती है।


तुम वह हाथ हो जो बिना थके काम करता है। तुम वह आँख हो जो सबसे अंत में सोती है। तुम वह आँचल हो जिसमें पूरा घर सिर रखकर रो सकता है।


तुम कहाँ से आई हो?


तुम किसी स्वर्ग से नहीं उतरी। तुम इसी मिट्टी से उगी हो। उसी मिट्टी से जिसमें धान उगता है, तुलसी उगती है, और प्रेम उगता है।


तुम इतनी करुणा क्यों हो?


शायद इसलिए कि यदि तुम कठोर हो जातीं, तो यह दुनिया बहुत पहले टूट चुकी होती।


तुम इतनी सहनशील क्यों हो?


शायद इसलिए कि तुम्हारे हिस्से में केवल अपना दुख नहीं, पूरे परिवार का दुख आया।


तुम इतनी सुंदर क्यों हो, जबकि तुमने कभी स्वयं को सुंदर बनाने का समय ही नहीं निकाला?


क्योंकि सौंदर्य चेहरे में नहीं, त्याग में होता है।


और अंत में, तुम्हें मेरा प्रणाम।


उन सभी स्त्रियों को प्रणाम जिनके हाथों की रोटियों पर यह देश पलता है। उन स्त्रियों को प्रणाम जो अपने छोटे-छोटे प्रेम से जीवन को रहने योग्य बनाती हैं। उन माँओं को प्रणाम जो अपनी नींद बेचकर बच्चों के सपने खरीदती हैं। उन पत्नियों को प्रणाम जो थके हुए पुरुषों के लिए घर को आश्रय बनाती हैं। उन बेटियों को प्रणाम जो अपने जाने के बाद भी घर में अपनी हँसी छोड़ जाती हैं।


जब तक किसी रसोई में मंदी आँच पर दाल पकती रहेगी, जब तक कोई स्त्री सुबह उठकर चोटी बाँधती रहेगी, जब तक किसी बच्चे के माथे पर माँ का हाथ रखा जाएगा — तब तक यह संसार पूरी तरह निर्दयी नहीं हो पाएगा।


और शायद इसी आशा पर दुनिया अब तक टिकी हुई है।


15. भारतीय स्त्री और रसोई का आध्यात्म


भारतीय घरों की रसोई केवल खाना बनाने की जगह नहीं होती। वह एक स्त्री का मौन मंदिर होती है। वहीं उसके सबसे अधिक घंटे बीतते हैं। वहीं वह सबसे अधिक खड़ी रहती है। वहीं वह सबसे अधिक जलती है — कभी चूल्हे की आँच से, कभी परिस्थितियों की आँच से, कभी अपने भीतर के अधूरेपन की आँच से।


जब वह आटा गूँधती है, तो केवल गेहूँ नहीं गूँधती; पूरे परिवार का दिन गूँधती है। जब वह सब्ज़ी काटती है, तो अपने समय के छोटे-छोटे टुकड़े भी उसी के साथ कटते जाते हैं। जब वह तड़का लगाती है, तो उसके हाथों की गंध पूरे घर में फैल जाती है।


कितनी विचित्र बात है कि भारतीय पुरुषों को दुनिया भर के व्यंजनों के नाम याद रहते हैं, पर उन्हें यह याद नहीं रहता कि उनकी माँ या पत्नी की उँगलियों में हल्दी की पीली परत स्थायी क्यों हो गई।


एक भारतीय स्त्री अपनी रसोई में सबसे अधिक सृजन करती है। वह कम मसालों में भी स्वाद पैदा कर देती है। महीने के आख़िरी दिनों में बची हुई दाल से भी ऐसा भोजन बना देती है कि बच्चे उँगलियाँ चाटते रह जाएँ। वह घर की आर्थिक स्थिति को सबसे पहले अपनी थाली से समझती है।


यदि पैसे कम हों, तो वह सबसे पहले अपनी इच्छाएँ घटाती है। दूध कम हो, तो अपने हिस्से का बच्चों को दे देती है। मिठाई कम हो, तो कहती है — “मुझे मीठा पसंद ही नहीं।” जबकि सच यह होता है कि उसे सबसे अधिक पसंद होता है।


भारतीय स्त्री का त्याग कभी भाषण नहीं देता। वह केवल चुपचाप थाली बदल देता है।


16. उसकी चुप्पियों में दबे हुए आँसू


भारतीय स्त्रियाँ बहुत कम रोती दिखाई देती हैं, पर शायद सबसे अधिक रोती वही हैं।


वे बाथरूम में रोती हैं। रसोई में बर्तन माँजते समय रोती हैं। रात में सबके सो जाने के बाद तकिए में मुँह छिपाकर रोती हैं। और सुबह उठकर ऐसे चाय बनाती हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो।


उनके जीवन में बहुत सी ऐसी बातें होती हैं जिन्हें वे कभी कह नहीं पातीं। उन्हें अपनी पढ़ाई याद आती है। अपना पुराना घर याद आता है। माँ की गोद याद आती है। वह नाम याद आता है जिससे मायके में उन्हें पुकारा जाता था।


विवाह के बाद भारतीय स्त्री केवल घर नहीं बदलती, वह अपना पूरा भूगोल बदल देती है। उसका कमरा छूट जाता है। उसकी अलमारी छूट जाती है। उसकी बचपन की खिड़की छूट जाती है। उसकी सहेलियाँ छूट जाती हैं।


और सबसे अधिक, उसका वह निश्चिंत बचपन छूट जाता है जिसमें वह केवल बेटी थी।


ससुराल में प्रवेश करते ही वह एक साथ कई भूमिकाओं में बाँट दी जाती है — बहू, पत्नी, भाभी, चाची, माँ।


पर किसी ने उससे यह नहीं पूछा कि वह स्वयं क्या बनना चाहती थी।


फिर भी वह मुस्कुराती रहती है। यही भारतीय स्त्री का सबसे बड़ा चमत्कार है — टूटकर भी दूसरों को संभाल लेना।


17. भारतीय स्त्री और प्रेम की भूख


दुनिया अक्सर समझती है कि भारतीय स्त्रियाँ बहुत सहनशील होती हैं, इसलिए उन्हें अधिक प्रेम की आवश्यकता नहीं होती। यह सबसे बड़ी भूल है।


भारतीय स्त्री प्रेम की भूखी होती है। पर उसका प्रेम माँगने का तरीका अलग होता है।


वह सीधे नहीं कहती कि “मुझे समय दो।” वह केवल पूछती है — “आज इतनी देर कैसे हो गई?”


वह यह नहीं कहती कि “मुझे याद किया?” वह केवल यह पूछती है — “खाना खाया था?”


वह यह नहीं कहती कि “मुझे गले लगा लो।” वह केवल आपके पास बैठ जाती है।


उसकी पूरी भावनात्मक दुनिया संकेतों में चलती है। और दुखद यह है कि भारतीय पुरुष अक्सर उन संकेतों को समझ ही नहीं पाते।


एक स्त्री जब नाराज़ होती है, तो कई बार उसे उपहार नहीं चाहिए होता; केवल यह चाहिए होता है कि कोई उसकी चुप्पी पढ़ ले।


उसकी आँखों के नीचे की थकान पढ़ ले। उसके हाथों की सूखी त्वचा पढ़ ले। उसके भीतर के अकेलेपन को पढ़ ले।


18. वह स्त्री जो कभी छुट्टी पर नहीं जाती


भारतीय स्त्री का जीवन एक ऐसी नौकरी है जिसमें कोई अवकाश नहीं होता।


रविवार भी उसका नहीं होता। त्योहार भी उसका नहीं होता। बीमारी भी उसकी छुट्टी नहीं बनती।


यदि वह बीमार पड़ जाए, तब भी रसोई की चिंता उसे उठाकर खड़ा कर देती है। यदि उसे बुखार हो, तब भी वह बच्चों की यूनिफॉर्म निकालकर रखती है। यदि उसके शरीर में दर्द हो, तब भी वह रात का खाना बनाती है।


क्योंकि भारतीय घरों में स्त्री का आराम अक्सर सबसे अंत में आता है।


और सबसे दर्दनाक बात यह है कि धीरे-धीरे वह स्वयं भी यह मान लेती है कि उसका थकना महत्वपूर्ण नहीं।


उसे याद ही नहीं रहता कि आख़िरी बार उसने केवल अपने लिए क्या किया था।


कभी-कभी वह अलमारी खोलकर अपनी पुरानी साड़ी को हाथ लगाती है। पुरानी तस्वीरें देखती है। कॉलेज का कोई गीत सुनती है। और कुछ क्षणों के लिए उसकी आँखों में वही पुरानी लड़की लौट आती है जो कभी सपने देखा करती थी।


फिर प्रेशर कुकर की सीटी बजती है, और वह लड़की फिर से रसोई में चली जाती है।


19. बेटी : घर की सबसे कोमल रोशनी


भारतीय घरों में बेटियाँ केवल बच्चे नहीं होतीं, वे घर की भाषा होती हैं।


वे पिता की थकान पहचान लेती हैं। माँ की चुप्पी समझ लेती हैं। भाई की ज़िद सह लेती हैं। दादा-दादी की दवाइयाँ याद रखती हैं।


और फिर एक दिन वे विदा हो जाती हैं।


जिस घर में उनकी हँसी गूँजती थी, वहाँ अचानक एक अजीब सन्नाटा भर जाता है। माँ उनकी अलमारी खोलती है। पिता उनके पुराने खिलौने देखते हैं। कमरे में उनकी चुन्नी की हल्की गंध रह जाती है।


भारतीय पिता अक्सर रोते नहीं, पर बेटी की विदाई पर उनके भीतर कुछ स्थायी रूप से टूट जाता है।


और भारतीय माँ? वह विदाई के बाद भी कई दिनों तक अतिरिक्त रोटी बना देती है, फिर याद आता है कि बेटी अब इस घर में नहीं रहती।


20. पत्नी : केवल संबंध नहीं, आश्रय


भारतीय पत्नी केवल वैवाहिक संबंध नहीं होती; वह पुरुष के टूटने की जगह होती है।


जब दुनिया पुरुष से कहती है कि “मजबूत बनो”, तब वही स्त्री उसे रोने की जगह देती है। जब दुनिया उसकी असफलताओं पर हँसती है, तब वही कहती है — “कोई बात नहीं, सब ठीक हो जाएगा।”


वह उसके आत्मविश्वास की आख़िरी दीवार होती है।


कई पुरुष अपने जीवन में बहुत कुछ बन जाते हैं — अधिकारी, व्यापारी, नेता, लेखक — पर घर लौटते समय वे केवल एक थका हुआ मनुष्य रह जाते हैं। और उस मनुष्य को सबसे पहले जो सहारा मिलता है, वह एक स्त्री की उपस्थिति होती है।


इसलिए भारतीय विवाह केवल सामाजिक अनुबंध नहीं है। यह दो अपूर्णताओं का एक-दूसरे में आश्रय ढूँढ़ लेना है।


21. भारतीय स्त्री का अदृश्य धर्म


भारतीय स्त्री का धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं है। उसका सबसे बड़ा धर्म है — सबको जोड़े रखना।


वह रिश्तों के बीच पुल बनाती है। भाइयों की लड़ाई शांत करती है। बूढ़े माता-पिता और नई पीढ़ी के बीच संतुलन बनाती है। घर में त्योहारों की गर्माहट बचाए रखती है।


यदि वह न हो, तो परिवार बहुत जल्दी केवल साथ रहने वाले व्यक्तियों का समूह बन जाए।


वह हर टूटती चीज़ को जोड़ती रहती है — कभी कपड़े, कभी बटन, कभी रिश्ते, कभी मन।


और यही कारण है कि भारतीय स्त्री केवल व्यक्ति नहीं, संस्कृति है।


22. अंतिम प्रणाम : तुम हो, इसलिए दुनिया अभी सुंदर है


हे आम भारतीय स्त्री,


तुम्हारे पास कोई सिंहासन नहीं, फिर भी तुम घरों की रानी हो। तुम्हारे सिर पर कोई मुकुट नहीं, फिर भी तुम्हारे बिना परिवार अधूरा है। तुम्हारा नाम इतिहास की किताबों में नहीं लिखा गया, फिर भी सभ्यता तुम्हारी हथेलियों पर टिकी रही।


तुमने अपने हिस्से की नींद देकर बच्चों के सपने बचाए। तुमने अपने हिस्से की इच्छाएँ छोड़कर परिवार की ज़रूरतें पूरी कीं। तुमने अपने आँसू छिपाकर घर में मुस्कान बचाए रखी।


तुम्हारे हाथों की रोटियों पर यह देश पलता है। तुम्हारी प्रार्थनाओं पर यह समाज टिका है। तुम्हारी सहनशीलता पर यह परिवार जीवित हैं।


यदि दुनिया में ईश्वर कहीं दिखाई देता है, तो शायद सबसे अधिक वह एक भारतीय स्त्री की आँखों में दिखाई देता है — उस समय जब वह रात को सोते हुए बच्चे का माथा चूमती है।


तुम्हें मेरा शत-शत प्रणाम।


तुम केवल स्त्री नहीं हो। तुम घर की पहली रोशनी हो। तुम चूल्हे की अंतिम आँच हो। तुम वह मौन प्रार्थना हो जो हर भारतीय घर में बिना शब्दों के रोज़ बोली जाती है।


और जब तक यह प्रार्थना जीवित है, तब तक दुनिया में करुणा बची रहेगी।