तमिलनाडु 2026 : अभिनेता विजय का उदय, द्रविड़ राजनीति का पुनर्गठन और भाजपा-विरोध की नई धुरी

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


तमिलनाडु 2026 : अभिनेता विजय का उदय, द्रविड़ राजनीति का पुनर्गठन और भाजपा-विरोध की नई धुरी

तमिलनाडु की राजनीति ने 2026 के विधानसभा चुनावों के बाद जिस प्रकार करवट ली है, वह केवल एक चुनावी परिवर्तन नहीं, बल्कि दक्षिण भारतीय राजनीति के वैचारिक और सांस्कृतिक पुनर्संरचना का संकेत भी है। दशकों तक डीएमके और एआईएडीएमके के बीच घूमती रही सत्ता पहली बार इस गंभीर संभावना के साथ सामने आई कि कोई तीसरी शक्ति न केवल चुनौती दे सकती है, बल्कि सत्ता का केंद्र भी बन सकती है। अभिनेता विजय और उनकी पार्टी टीवीके का उभार इसी ऐतिहासिक परिवर्तन का प्रतीक बनकर उभरा है।


चुनाव परिणामों के बाद सोशल मीडिया पर विजय का सात वर्ष पुराना वीडियो अचानक वायरल हो गया। अपनी फिल्म *सरकार* के ऑडियो लॉन्च कार्यक्रम में विजय मंच से कहते दिखाई देते हैं—“मैं मुख्यमंत्री की तरह अभिनय नहीं करूंगा, बल्कि मुख्यमंत्री बनूंगा।” यह वाक्य केवल फिल्मी संवाद नहीं रह गया; वह तमिलनाडु की राजनीतिक वास्तविकता में बदलता हुआ दिखाई दिया। दक्षिण भारतीय राजनीति में सिनेमा और सत्ता का संबंध नया नहीं है। सी.एन. अन्नादुरै से लेकर एम. करुणानिधि, एम.जी. रामचंद्रन और जे. जयललिता तक, तमिल राजनीति ने फिल्मों के पर्दे से जननेता पैदा होते देखे हैं। लेकिन विजय का उदय ऐसे समय में हुआ है जब पारंपरिक द्रविड़ राजनीति अपने सबसे बड़े संक्रमण से गुजर रही है।


तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 ने राज्य की स्थापित राजनीतिक धुरी को झकझोर दिया। लंबे समय से सत्ता के केंद्र रहे डीएमके और एआईएडीएमके के बीच पहली बार टीवीके सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरी। हालांकि पार्टी स्पष्ट बहुमत से पीछे रह गई। 234 सदस्यीय विधानसभा में टीवीके को 108 सीटें मिलीं, जबकि बहुमत के लिए 118 सीटों की आवश्यकता थी। दूसरी ओर डीएमके को बड़ा राजनीतिक झटका लगा और वह सत्ता से बाहर जाती दिखाई दी। कांग्रेस, जो वर्षों से डीएमके की सहयोगी रही थी, केवल पाँच सीटों पर सिमट गई, लेकिन विडंबना यह रही कि वही सरकार गठन की निर्णायक कुंजी बन गई।


यहीं से तमिलनाडु की राजनीति केवल अंकगणित नहीं, बल्कि वैचारिक और रणनीतिक संघर्ष में बदल गई।


विजय ने कांग्रेस नेतृत्व से समर्थन मांगा। कांग्रेस के भीतर इस पर मतभेद स्वाभाविक थे, क्योंकि डीएमके उसके पुराने और भरोसेमंद सहयोगी रहे हैं। किंतु अंततः कांग्रेस ने टीवीके को समर्थन देने का निर्णय लिया और इसे “धर्मनिरपेक्ष सरकार” बनाने तथा भाजपा-आरएसएस की राजनीति को रोकने की आवश्यकता से जोड़ा। कांग्रेस का यह निर्णय केवल सत्ता-गणित नहीं था; यह दक्षिण भारत में भाजपा के संभावित विस्तार को रोकने की रणनीतिक कोशिश भी थी।


इस फैसले ने डीएमके के भीतर असहजता पैदा की। कई नेताओं ने इसे राजनीतिक विश्वासघात की तरह देखा। लेकिन राजनीति में कई बार प्रत्यक्ष विरोध और अप्रत्यक्ष रणनीति साथ-साथ चलती हैं। यही कारण है कि एम.के. स्टालिन का रुख अपेक्षाकृत संयमित दिखाई दिया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि विजय को सरकार बनाने का अवसर मिलना चाहिए और डीएमके छह महीने तक नई सरकार को काम करते हुए देखेगी। यह बयान केवल राजनीतिक शिष्टाचार नहीं था; इसके भीतर एक गहरी रणनीतिक समझ भी छिपी हुई थी।


स्टालिन जानते थे कि यदि सबसे बड़े दल को अवसर देने के बजाय राजनीतिक अस्थिरता पैदा होती है, तो उसका लाभ अंततः भाजपा को मिल सकता है। इसलिए डीएमके ने प्रत्यक्ष समर्थन न देते हुए भी संवैधानिक प्रक्रिया के सम्मान का पक्ष लिया। यह वही तमिलनाडु है जिसकी राजनीति लंबे समय से केंद्र के राजनीतिक हस्तक्षेप के प्रति संवेदनशील रही है। द्रविड़ आंदोलन की पूरी ऐतिहासिक चेतना ही “उत्तर भारतीय केंद्रीकरण” और सांस्कृतिक वर्चस्व के प्रतिरोध से निकली थी। ऐसे में भाजपा की संभावित भूमिका को लेकर स्वाभाविक राजनीतिक सावधानी दिखाई दी।


इसी बीच राज्यपाल की भूमिका सबसे बड़े विवाद का केंद्र बन गई। विजय द्वारा सरकार बनाने का दावा पेश करने के बावजूद राज्यपाल द्वारा उन्हें तत्काल आमंत्रित न करना और बहुमत के समर्थन-पत्रों पर ज़ोर देना विपक्षी दलों के निशाने पर आ गया। संवैधानिक विशेषज्ञों, विपक्षी नेताओं और अनेक टिप्पणीकारों ने प्रश्न उठाया कि यदि कोई अन्य दल स्पष्ट बहुमत का दावा लेकर सामने नहीं आया है, तो सबसे बड़े दल को पहले अवसर से वंचित क्यों किया जा रहा है?


यहीं से भाजपा पर अप्रत्यक्ष आरोपों का दौर शुरू हुआ। तमिलनाडु में भाजपा स्वयं सत्ता की दौड़ में कहीं दिखाई नहीं दे रही थी, लेकिन राजनीतिक विमर्श में यह धारणा मजबूत होने लगी कि राज्यपाल की सक्रियता या निष्क्रियता भाजपा की रणनीतिक प्राथमिकताओं से प्रभावित है। महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों के हालिया राजनीतिक अनुभवों ने विपक्षी दलों के भीतर यह विश्वास पैदा कर दिया है कि चुनाव परिणामों के बाद भी सत्ता-समीकरण बदले जा सकते हैं।


विजय की रैलियों में हुई भगदड़, उसकी सीबीआई जांच की मांग और विजय से पूछताछ की चर्चाओं को भी इसी राजनीतिक संदर्भ में देखा गया। यह धारणा बनी कि चुनाव बाद टीवीके को अस्थिर करने की कोशिशें हो सकती हैं। दिलचस्प यह रहा कि इन घटनाओं को राष्ट्रीय मीडिया, विशेषकर हिंदी पट्टी के मीडिया संस्थानों में भी व्यापक कवरेज मिला। इससे यह संदेश और मजबूत हुआ कि तमिलनाडु की राजनीति अब केवल क्षेत्रीय नहीं रही; वह राष्ट्रीय सत्ता-समीकरणों का भी हिस्सा बन चुकी है।


इस पूरे घटनाक्रम में वामपंथी दलों और छोटे सहयोगी संगठनों की भूमिका निर्णायक सिद्ध हुई। CPI, CPM, VCK और IUML जैसे दलों ने भाजपा को सत्ता से दूर रखने और “धर्मनिरपेक्ष मोर्चे” को मजबूत करने के नाम पर विजय को समर्थन देना शुरू किया। यह समर्थन केवल सरकार बनाने के लिए आवश्यक संख्या जुटाने का प्रयास नहीं था; यह भाजपा-विरोधी वैचारिक ध्रुवीकरण का नया रूप था। इन समर्थन घोषणाओं के बाद टीवीके का आंकड़ा 120 तक पहुँच गया और विजय को स्पष्ट बहुमत मिल गया।


इस पूरी प्रक्रिया ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक तथ्य स्थापित किया—भाजपा विरोध अब केवल चुनावी रणनीति नहीं रह गया है; वह कई क्षेत्रीय दलों के लिए अस्तित्व की राजनीति बन चुका है। तमिलनाडु में विभिन्न विचारधाराओं और राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले दलों का विजय के पीछे खड़ा होना इसी व्यापक राजनीतिक भय और संतुलन की अभिव्यक्ति था।


दूसरी ओर भाजपा समर्थकों ने इस पूरे गठबंधन को अवसरवादी बताया। उनका तर्क था कि कांग्रेस ने अपने पुराने सहयोगी डीएमके के साथ विश्वासघात किया है और केवल भाजपा को रोकने के लिए वैचारिक विरोधाभासों को नजरअंदाज किया गया। लेकिन राजनीति का यथार्थ अक्सर सिद्धांतों से अधिक परिस्थितियों द्वारा संचालित होता है। भारतीय राजनीति में यह पहली बार नहीं हुआ कि राष्ट्रीय स्तर के सहयोगी राज्य स्तर पर अलग रास्ते चुनते दिखाई दिए हों।


विजय के उदय ने एक और दिलचस्प विमर्श को जन्म दिया—तमिल राजनीति में “अभिनेता” की स्थायी शक्ति। करुणानिधि भले लेखक और संवादकार रहे हों, लेकिन एमजीआर और जयललिता ने यह स्थापित किया कि तमिलनाडु में सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, जनभावना का निर्माण करने वाली सांस्कृतिक शक्ति है। विजय उसी परंपरा के नए उत्तराधिकारी के रूप में उभरे हैं। उनके समर्थक उन्हें केवल अभिनेता नहीं, बल्कि “जन-नेता” के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।


हालांकि यह भी सच है कि चुनाव जीतना और शासन चलाना दो अलग बातें हैं। विजय के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपनी लोकप्रियता को प्रशासनिक विश्वसनीयता में बदलने की होगी। जनता ने उन्हें अवसर दिया है, लेकिन तमिलनाडु जैसा राजनीतिक रूप से जागरूक राज्य केवल भावनात्मक करिश्मे के आधार पर लंबे समय तक किसी नेतृत्व को स्वीकार नहीं करता। उन्हें रोजगार, उद्योग, सामाजिक न्याय, क्षेत्रीय अस्मिता और केंद्र-राज्य संबंधों पर स्पष्ट और प्रभावी शासन मॉडल प्रस्तुत करना होगा।


फिर भी इतना स्पष्ट है कि 2026 का चुनाव तमिलनाडु की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ बन चुका है। पहली बार द्रविड़ राजनीति की पारंपरिक द्विध्रुवीय संरचना गंभीर रूप से चुनौतीग्रस्त हुई है। विजय और टीवीके का उदय केवल एक नए दल की सफलता नहीं, बल्कि उस सामाजिक बेचैनी की अभिव्यक्ति है जो तमिल समाज नए विकल्पों की तलाश में महसूस कर रहा था।


तमिलनाडु अब केवल करुणानिधि, जयललिता या स्टालिन की राजनीतिक विरासत का राज्य नहीं रह गया; वह एक ऐसे नए दौर में प्रवेश कर चुका है जहाँ सिनेमा, क्षेत्रीय अस्मिता, भाजपा-विरोध, युवा आकांक्षाएँ और सत्ता-संतुलन—सब मिलकर एक नई राजनीतिक कहानी लिख रहे हैं।