रंगोत्सव शुभ होली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


रंगोत्सव शुभ होली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं 

होलाका के मंत्रों से, होली के रंगों तक,

सभ्यता की सरिता का, बहता यह विस्तार है।

यह केवल ऋतुओं का, नूतन श्रृंगार नहीं,

यह अंतर्मन की जड़ता पर, चेतन का प्रहार है।

होलाका से होली तक, पावन यह त्योहार है।

फाल्गुन की पूर्णिमा, साक्षी है उस अग्नि की,

जहाँ कर्म ही धर्म बना, मीमांसा की वाणी में।

अन्न की आहुति नहीं, वह 'राका' का संचय था,

शिशिर की रिक्तता जली, नूतन कल्याणी में।

अग्नि मात्र दाह नहीं, वह तो एक शोधक है,

जो संचित विकारों को, संकल्पों में ढालती।

दहन से ही सृजन की, एक राह निकलती है,

अग्नि ही तो जड़ता को, वसंत में है पालती।


ॐ नमः शिवाय! गूँजता है दिगंत में,

महादेव ने जहाँ, काम को भी जीत लिया।

वासना को भस्म कर, 'अनंग' को जो जन्म दिया,

प्रेम को शरीर से, भाव-रूप कर दिया।

जब आदियोगी की, दया-दृष्टि पड़ती है,

तब फागुन की बयार, लोक-प्राण बनती है।


और इसी बयार में, गूँजी मुरली कुंज-कुंज,

ब्रज की गलियों में उड़ा, भक्ति का अबीर-पुंज।

जहाँ कृष्ण की चतुराई, राधा के प्रेम में हारी,

बरसाने की लट्ठ बनी, मान की पहरेदारी।

'होरी खेल रहे नन्दनन्दन'—भाव का संचार हुआ,

अद्वैत का दर्शन ही, वहाँ प्रेम का श्रृंगार हुआ।

कान्हा के नील-वर्ण में, राधा की पीत-आभा मिली,

तब जाकर सृष्टि के, रंगों की यह कली खिली।


रिश्तों की धूल को, स्नेह-जल से धो डालें,

रंगों की बौछार से, अहंकार को ढहा दें।

सुख को साझा करें, दुख को बाँट आधा करें,

बिछड़ों को गले लगा, द्वेष को विदा दें।

'घुटने तो मुड़ते हैं, सदा पेट की ही ओर',

आत्मीयता की डोर ही, हमें पास लाएगी।

विविधता के रंगों से, जो इंद्रधनुष उभरेगा,

वही चित्र भारत का, जग को दिखाएगी।


सौहार्द का गुलाल हो, विश्वास की हरियाली हो,

हृदय के निकुंज में, आनंद की सुवास हो।

पुरानी क्लांतियाँ जलें, नए संबंध सब खिलें,

भीतर के वसंत का, शाश्वत निवास हो।

रंगों का यह अभिषेक, शिवमय कर दे हर क्षण,

मंगलमयी होली का, सबको यह संदेश है।

हर हृदय में प्रेम हो, हर मुख पर उल्लास हो,

यही इस संस्कृति का, पावन उपदेश है।


शुभ होली! हर-हर महादेव!

जय श्री राधे-कृष्ण!