चाबहार से ‘मौन’ तक: क्या भारत की कूटनीति भय और सुविधा के बीच सिमट रही है?

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


चाबहार से ‘मौन’ तक: क्या भारत की कूटनीति भय और सुविधा के बीच सिमट रही है?

कूटनीति में शब्दों का महत्व निर्विवाद है, पर कई बार ‘मौन’ उससे भी अधिक मुखर हो उठता है। हाल के घटनाक्रम—ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei के निधन (या नेतृत्व-संकट) के संदर्भ में भारत की सार्वजनिक प्रतिक्रिया—ने एक बुनियादी प्रश्न को जन्म दिया है: "क्या भारत की विदेश नीति अब सिद्धांत-आधारित स्वायत्तता से हटकर सुविधा-आधारित संतुलन में बदल रही है?"

यह प्रश्न केवल एक शोक-संदेश का नहीं, बल्कि उस व्यापक कूटनीतिक दिशा का है, जिसे भारत ने पिछले एक दशक में अपनाया है।

## चाबहार: साहस का प्रतीक या सीमित विकल्प?


मई 2016 में तेहरान में भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच चाबहार बंदरगाह समझौते पर हस्ताक्षर हुए। उस समय प्रधानमंत्री की उपस्थिति ने इसे केवल व्यापारिक परियोजना नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक वक्तव्य बना दिया। यह पाकिस्तान को बायपास कर मध्य एशिया तक भारत की पहुँच का मार्ग था—रणनीतिक स्वायत्तता का मूर्त रूप।


परंतु 2018 में Donald Trump प्रशासन द्वारा ईरान पर पुनः कठोर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद समीकरण बदल गए। भारत की ऊर्जा आयात-निर्भरता, डॉलर-आधारित वित्तीय तंत्र, और पश्चिमी बैंकिंग जोखिमों ने निर्णय-क्षमता को सीमित किया। चाबहार परियोजना औपचारिक रूप से समाप्त नहीं हुई, किंतु उसकी गति और राजनीतिक आक्रामकता क्षीण पड़ गई।


यहाँ प्रश्न उठता है— "क्या यह व्यावहारिक विवशता थी, या स्वायत्तता की क्रमिक क्षति?"


## त्रिकोणीय दबाव: ईरान, इज़रायल और अमेरिका


भारत आज एक जटिल त्रिकोण में खड़ा है:


* ऊर्जा और भू-मार्ग → ईरान

* रक्षा और तकनीक → Israel

* वैश्विक रणनीतिक साझेदारी → United States


इज़रायल भारत का एक प्रमुख रक्षा आपूर्तिकर्ता है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और इंडो-पैसिफिक रणनीति का केंद्रीय भागीदार है। ऐसे में ईरान-संबंधी कोई भी सार्वजनिक वक्तव्य केवल तेहरान को संदेश नहीं देता; वह वॉशिंगटन और तेल अवीव में भी पढ़ा जाता है।


"भारत की चुप्पी को कुछ लोग ‘भय’ कह सकते हैं, पर इसे ‘जोखिम-प्रबंधन’ भी कहा जा सकता है।"


## मौन: कूटनीति की भाषा या नैतिक दुविधा?


कूटनीति में मौन के अनेक अर्थ होते हैं:


1. तनाव को न बढ़ाने का प्रयास

2. आंतरिक सत्ता-परिवर्तन के प्रति प्रतीक्षा-भाव

3. गोपनीय राजनयिक संवाद को प्राथमिकता देना


परंतु यहाँ नैतिक प्रश्न भी है। भारत स्वयं को ‘विश्वगुरु’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का प्रवक्ता बताता है। यदि वह एक पुराने रणनीतिक साझेदार के राष्ट्रीय शोक पर सार्वजनिक संवेदना तक व्यक्त नहीं करता, तो यह उसके नैरेटिव और व्यवहार के बीच अंतर को उजागर करता है।


राजनीतिक प्रतीकवाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों में महत्व रखता है। कई बार एक ट्वीट भी दशकों की मैत्री का संकेत होता है।


## गुटनिरपेक्षता से मल्टी-अलाइनमेंट तक


स्वतंत्र भारत की विदेश नीति का आधार ‘गुटनिरपेक्षता’ रहा। पंडित नेहरू के समय से लेकर शीतयुद्ध काल तक भारत ने महाशक्तियों के बीच संतुलन साधा।


आज वह नीति ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ में परिवर्तित हो चुकी है—जहाँ भारत क्वाड का हिस्सा है, ब्रिक्स में सक्रिय है, रूस से रक्षा-खरीद जारी रखता है, और पश्चिमी पूँजी को आकर्षित करता है।


यह नई नीति सिद्धांतों से अधिक हित-आधारित है। यह अधिक लचीली है, पर कम वैचारिक। यही परिवर्तन इस बहस का मूल है।


## क्या यह स्वायत्तता का ह्रास है?


इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं।


भारत ने रूस-यूक्रेन युद्ध पर प्रत्यक्ष निंदा से परहेज किया, पर मानवीय सहायता दी। इज़रायल-फिलिस्तीन संघर्ष में संतुलित भाषा अपनाई। अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ाई, पर पूर्ण सैन्य संधि से दूरी बनाए रखी।


ये सब संकेत देते हैं कि भारत अभी भी औपचारिक रूप से स्वतंत्र निर्णय-क्षमता रखता है। परंतु जब किसी संवेदनशील क्षण पर सार्वजनिक मौन दिखाई देता है, तो स्वाभाविक है कि स्वायत्तता पर प्रश्न उठें।


## नैतिकता बनाम राष्ट्रीय हित

अंरराष्ट्रीय संबंधों का यथार्थ कठोर है। राष्ट्र पहले अपने हित देखते हैं। ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा आपूर्ति, तकनीकी सहयोग और आर्थिक विकास—इन सबके बीच भावनात्मक कूटनीति सीमित हो जाती है।

फिर भी, कूटनीति केवल शक्ति-संतुलन नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा और विश्वास का भी खेल है। यदि भारत अपने पुराने मित्रों के कठिन समय में प्रतीकात्मक उपस्थिति भी दर्ज नहीं कराता, तो वह भविष्य के सहयोग के लिए नैतिक पूँजी खो सकता है।

## इतिहास का दर्पण

इतिहास राष्ट्रों को उनके वक्तव्यों से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक व्यवहार से परखता है। भारत की वर्तमान नीति शायद भय की नहीं, बल्कि सावधानी की अभिव्यक्ति हो। परंतु सावधानी और संकोच के बीच रेखा बहुत पतली होती है। चाबहार से लेकर मौन तक की यह यात्रा एक व्यापक संक्रमण का संकेत है— आदर्शवादी स्वायत्तता से व्यावहारिक संतुलन तक।

 प्रश्न यह नहीं कि भारत ने शोक-संदेश क्यों नहीं दिया।

प्रश्न यह है कि क्या भविष्य में भी उसकी विदेश नीति केवल जोखिम-प्रबंधन तक सीमित रहेगी, या वह नैतिक नेतृत्व का साहस भी दिखाएगी?

"कूटनीति में मौन कभी-कभी रणनीति होता है। पर यदि मौन स्थायी हो जाए, तो वह इतिहास में एक टिप्पणी बन जाता है।"