सत्ता का 'मौन' और संस्थानों का पतन: विशाखापत्तनम से वैश्विक कूटनीति तक एक विश्लेषण
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
सत्ता का 'मौन' और संस्थानों का पतन: विशाखापत्तनम से वैश्विक कूटनीति तक एक विश्लेषण
आधुनिक लोकतंत्र की जीवंतता उसके विश्वविद्यालयों की वैचारिक स्वतंत्रता और उसकी विदेश नीति के नैतिक साहस से मापी जाती है। किंतु, वर्तमान परिदृश्य में भारत के भीतर और बाहर से आ रही खबरें एक डरावनी हकीकत का संकेत दे रही हैं। विशाखापत्तनम स्थित आंध्र विश्वविद्यालय (AU) के परिसरों में पनपता सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और वैश्विक संकटों पर भारत का 'रणनीतिक मौन', एक गहरे संस्थागत और वैचारिक संकट की ओर इशारा करते हैं।
1. परिसर का विखंडन: शिक्षा के मंदिर में 'सांप्रदायिक प्रयोगशाला'
विश्वविद्यालय तर्क और प्रगतिशील विमर्श के केंद्र होते हैं, न कि कट्टरता की प्रयोगशाला। आंध्र विश्वविद्यालय से आ रही हिंसा, शारीरिक हमलों और छात्र संघों के प्रतीकों के अपमान की खबरें यह दर्शाती हैं कि 'कलम' की जगह 'लाठियों' ने ले ली है।
* नैतिकता का पतन: छात्राओं का डिजिटल उत्पीड़न और सोशल मीडिया पर उनकी गरिमा को तार-तार करना उस 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के खोखलेपन को उजागर करता है, जिसका दंभ दक्षिणपंथी संगठन भरते हैं। यह केवल एक स्थानीय विवाद नहीं, बल्कि उस 'टॉक्सिक' मर्दानगी और वैचारिक अतिवाद का प्रकटीकरण है जो शिक्षा के पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर रहा है।
* प्रशासनिक मिलीभगत: पुलिस अधिनियम की धारा 30 के उल्लंघन और दलित संगठनों के झंडे फाड़ने जैसी घटनाओं पर पुलिस की निष्क्रियता 'मौन समर्थन' की श्रेणी में आती है। जब राज्य के रक्षक ही पक्षपाती हो जाएं, तो हाशिए के समुदायों की आवाज़ का गला घोंटना आसान हो जाता है।
2. 'विश्वगुरु' का छद्म और कूटनीतिक लाचारी
वैश्विक पटल पर भारत की भूमिका आज विरोधाभासों से भरी है। एक ओर हम 'विश्वगुरु' होने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी ओर हमारे रणनीतिक मित्रों पर आए संकट के समय हमारी प्रतिक्रिया केवल 'जन्मदिन की बधाइयों' तक सीमित रह जाती है।
* ईरान संकट और कूटनीतिक शून्यता: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला ख़मनेई की शहादत पर दुनिया स्तब्ध है, लेकिन भारत का नेतृत्व संवेदना के दो शब्द जुटाने में भी विफल रहा। क्या यह 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) है या वाशिंगटन के दबाव में किया गया 'समझौता'?
* साहस का ह्रास: इतिहास गवाह है कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अमेरिकी धरती पर खड़े होकर इराक युद्ध की आलोचना की थी। वर्तमान में, यदि इज़राइल भारतीय नेतृत्व के दौरों को 'हमले के कवर' की तरह इस्तेमाल कर रहा है, तो यह कूटनीतिक जीत नहीं बल्कि 'इस्तेमाल' होने की विवशता है।
3. मीडिया का 'प्रशस्ति-गायन' और तार्किक दिवालियापन
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भारतीय मुख्यधारा मीडिया ने पत्रकारिता के धर्म को त्यागकर 'पीआर (PR) एजेंसी' का स्वरूप ले लिया है।
क्रेडिट की क्रोनोलॉजी: मिसाइल हमलों से भारत के बचे रहने का श्रेय किसी व्यक्ति विशेष को देना वैसा ही है जैसे सूर्य के उगने का श्रेय सरकार को देना। भूगोल और प्रकृति के शाश्वत सत्यों (जैसे हिमालय और समुद्र) को 2014 के बाद का 'मास्टरस्ट्रोक' बताना तार्किक दिवालियापन की पराकाष्ठा है।
साष्टांग पत्रकारिता: जब न्यूज़ एंकर 'स्टेनोग्राफर' बन जाएं और कैमरे के एंगल सत्ता की 'दैवीय छवि' गढ़ने के लिए सेट किए जाएं, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ स्वतः ही ढह जाता है।
4. न्यायपालिका और शिक्षा: अंतिम गढ़ों का गिरना
आंध्र विश्वविद्यालय में भड़कती सांप्रदायिक आग और शीर्ष न्यायिक पदों पर नियुक्तियों में पारदर्शिता का अभाव (जैसा कि जस्टिस सूर्यकांत के मामले में इंगित किया गया है) एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
संस्थानिक पतन: जब विश्वविद्यालय और न्यायपालिका—लोकतंत्र के अंतिम दो सुरक्षा कवच—वैचारिक कट्टरवाद और अनियमितताओं की भेंट चढ़ जाएं, तो आम नागरिक की सुरक्षा का दावा खोखला सिद्ध होता है।
### 'मौन' की भयावहता
मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और देश के केंद्रीय नेतृत्व के लिए यह अग्निपरीक्षा का समय है। मौन रहना हमेशा रणनीति नहीं होती; कभी-कभी यह खौफ और समझौते का साक्ष्य होता है। लोकतंत्र केवल वोट देने का नाम नहीं है, यह सत्ता की आँखों में आँखें डालकर सच बोलने और अपने संस्थानों की शुचिता बचाए रखने का नाम है।
विशाखापत्तनम का विरोध प्रदर्शन देश भर के लिए एक चेतावनी है—यदि आज हमने इन 'सांप्रदायिक प्रयोगशालाओं' और 'सभ्यताओं के पतन' को नहीं रोका, तो आने वाली पीढ़ियों के पास न तो स्वतंत्र सोच बचेगी और न ही कोई विश्वसनीय संस्थान।
