रक्तरंजित आकाश और सिसकती मानवता: जब कायनात ने शोक मनाया
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
रक्तरंजित आकाश और सिसकती मानवता: जब कायनात ने शोक मनाया
इतिहास गवाह है कि जब-जब पृथ्वी पर मानवता कराहती है, तब-तब प्रकृति मूक दर्शक नहीं बनी रहती। कभी महापुरुषों के अवसान पर धरती का कांपना, तो कभी अन्याय की पराकाष्ठा पर घटाटोप बादलों का उमड़ना—यह संकेत है कि 'कायनात' के पास भी एक हृदय है जो हमारे दुखों के साथ धड़कता है। आज जब भारत के आंगन में होली के ढोल-मंजीरे बजने थे और रंगों का उत्सव होना था, तब आकाश पर छाए चंद्र ग्रहण के साये ने सब फीका कर दिया। यह संयोग मात्र नहीं, बल्कि कुदरत का एक गहरा संदेश है।
1. उत्सव पर ग्रहण: प्रकृति का 'मौन विरोध'
होली उल्लास का पर्व है, पर इस बार भोर के गुलाल पर ग्रहण की कालिख भारी पड़ गई। जिस समय हमें एक-दूसरे के गले मिलना था, उस समय आकाश 'रक्ताभ' होकर शायद उस रक्तपात पर आंसू बहा रहा था जो हजारों मील दूर हमारे एक घनिष्ठ मित्र देश, ईरान में बह रहा है। पंडितों ने भले ही कल सुबह होली मनाने का विधान दिया हो, पर उत्सव की वह नैसर्गिक ऊर्जा युद्ध की विभीषिका की भेंट चढ़ चुकी है।
2. ईरान का दर्द और वैश्विक पाखंड
मानवता के स्वयंभू रक्षक अमेरिका ने जिस तरह अयातुल्ला खामेनेई की हत्या कर युद्ध का बिगुल फूँका है, वह अंतरराष्ट्रीय नैतिकता की पराजय है।
हमलों की बर्बरता: महात्मा गांधी चिकित्सालय और बच्चियों के स्कूलों पर बमबारी करना यह सिद्ध करता है कि साम्राज्यवादी ताकतों के लिए 'इंसानियत' शब्द केवल शब्दकोशों तक सीमित है। 700 से अधिक निर्दोषों की मृत्यु केवल संख्या नहीं, बल्कि एक सभ्यता की बुनियाद का हिलना है।
भारत की कूटनीतिक विवशता: दुखद यह है कि 'विश्वगुरु' बनने की आकांक्षा रखने वाला भारत, अमेरिका के भय से अपने पुराने और रणनीतिक मित्र के शोक में दो शब्द संवेदना के भी नहीं कह पा रहा। यह चुप्पी हमारे इतिहास के उन सिद्धांतों पर प्रश्नचिह्न लगाती है जो हमें 'अन्याय के विरुद्ध' खड़े होने की सीख देते थे।
3. तेल की आग और चूल्हों की खामोशी
यह युद्ध केवल दो देशों का नहीं है। यह संसाधनों को हड़पने के साम्राज्यवादी एजेंडे का हिस्सा है।
आर्थिक विभीषिका: जहाँ खनिज तेल के भंडारों में आग लगी हो, वहाँ दुनिया भर के गरीब घरों के चूल्हों का बुझना तय है। तेल की यह आग केवल गाड़ियों को नहीं रोकेगी, बल्कि हमारे विकास, उद्यम और फासलों को बढ़ा देगी।
संसाधनों की लूट: यदि आज हम अन्यायी के विरुद्ध खड़े नहीं हुए, तो यह 'लूट का खेला' कल हमारे अपने दरवाजों तक भी पहुँच सकता है। अमेरिका की यह साम्राज्यवादी भूख हर उस सरकार को गिराने या 'सरेंडर' कराने पर तुली है जो उसके सामने नहीं झुकती।
4. ग्रहण के मायने: आत्ममंथन की घड़ी
प्रकृति ने होली के उमंग पर जो 'ब्रेक' लगाया है, वह हमें सोचने के लिए समय दे रहा है। यह समय केवल पकवान बनाने या रंग खेलने का नहीं है, बल्कि उस रमजान और उस ईरान के दर्द को महसूस करने का है जहाँ मातम और भूख का साया है।
कायनात का यह फैसला—कि आज रंग नहीं उड़ेगा—शायद इसलिए है ताकि हम अपनी खिड़कियों से बाहर झांकें और देखें कि दुनिया जल रही है। रक्ताभ चांद हमें चेतावनी दे रहा है कि संसाधनों की होड़ में यदि हम इंसानियत भूल गए, तो अगला ग्रहण हमारी आत्मा पर लगेगा।
आइए, इस गमगीन माहौल में उन बेगुनाहों के लिए दुआ करें जो युद्ध की आग में झुलस रहे हैं। अन्याय के विरुद्ध बोलना ही आज की सबसे बड़ी 'होली' और सबसे बड़ा 'ईमान' है।
