महाठग-पुराण: 'विश्व-गुरु' बनने की दौड़ में 'विश्व-धोखेबाज' बनता समाज
महाठग-पुराण: 'विश्व-गुरु' बनने की दौड़ में 'विश्व-धोखेबाज' बनता समाज
"खीरा सिर ते काटिये, मलियत नमक लगाए..." रहीम साहब ने तो केवल कड़वे मुख की सजा बताई थी, पर यहाँ तो पूरी की पूरी बेल ही ज़हरीली हो चुकी है; अब नमक कहाँ-कहाँ लगाओगे?
आज के भारत में 'सत्यमेव जयते' का आदर्श वाक्य सरकारी फाइलों की धूल फांक रहा है, जबकि सड़कों पर 'ठगमेव जयते' का अघोषित नगाड़ा बज रहा है। रहीम दास जी ने जब कहा था— "रहिमन आप ठगाइए और न ठगियन जाई, आप ठगे सुख ऊपजे, और ठगे दुख होय" — तो शायद उनका समाज आज की तुलना में कहीं अधिक सुसंस्कृत और ईमानदार रहा होगा। आज के 'स्मार्ट' दौर में यदि आप 'ठगा' जाना स्वीकार कर लें, तो समाज आपको 'संत' नहीं, 'मूर्ख' की उपाधि देता है। हम एक ऐसे "ठग प्रधान" देश की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ ठगी अब कोई नैतिक पतन नहीं, बल्कि एक अनिवार्य 'मैनेजमेंट स्किल' और सफलता का शॉर्टकट बन चुकी है।
# संस्कार की पहली सीढ़ी: 'जुगाड़' और 'झूठ' का शिलान्यास
हमारी ठगी का सफर माँ की लोरी से नहीं, बल्कि पिता द्वारा स्कूल के फॉर्म में लिखाई गई 'फर्जी जन्मतिथि' से शुरू होता है। उम्र में एक-दो साल की कटौती हमारी पहली 'संवैधानिक ठगी' है, जिसे हम बड़ी मासूमियत से 'भविष्य की सुरक्षा' कहते हैं। इसके बाद शुरू होता है फर्जी जाति प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र और डोमिसाइल का खेल।
इम्तिहान के पेपर लीक होना अब 'न्यूज़' नहीं, बल्कि 'सीजनल इवेंट' बन चुका है। जो बच्चा दिन-रात लालटेन जलाकर मेहनत करता है, वह अंततः उस ठग से हार जाता है जिसने लाखों रुपये देकर 'सॉल्वर' बिठाया होता है। फर्जी यूनिवर्सिटी से लेकर फर्जी डिग्री तक—भारत एक ऐसा बाजार बन चुका है जहाँ ज्ञान से ज्यादा 'कागज का टुकड़ा' कीमती है। सेना, रेलवे, पुलिस और शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्रों में भी जब रिश्वत और सिफारिश ही 'असली योग्यता' बन जाए, तो प्रतिभा खुद को ठगा हुआ महसूस न करे तो क्या करे?
# रिश्तों की नीलामी: शादी-ब्याह का 'धोखाधड़ी' मॉडल
विवाह, जिसे कभी सात जन्मों का आत्मिक बंधन कहा जाता था, अब 'इन्वेस्टमेंट बैंकिंग' का हिस्सा है। यहाँ हर कोई एक-दूसरे को ठगने में लगा है। लड़के वाले सैलरी और ओहदा बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं, लड़की वाले योग्यता और घरेलू कुशलता। शादी से पहले की 'इन्वेस्टिगेशन' और शादी के बाद के 'शॉक' भारतीय वैवाहिक जीवन का अभिन्न अंग हैं। सूचनाओं को छिपाना और गलत तथ्य पेश करना अब 'जरूरी झूठ' की श्रेणी में आता है। जब बुनियाद ही ठगी पर रखी हो, तो इमारत में दरारें पड़ना लाजिमी है।
# लोकतंत्र के चार 'बीमार' स्तंभ: जब रक्षक ही भक्षक बने
लोकतंत्र की छत जिन चार खंभों पर टिकी थी, उनमें अब 'स्वार्थ' और 'भ्रष्टाचार' का घुन लग चुका है:
1. विधायिका (Legislature): वोट मांगना अब 'लोकसेवा' नहीं, बल्कि 'क्रॉडफंडिंग' है। चुनाव से पहले जो वादे किए जाते हैं, वे 'जुमले' की एक्सपायरी डेट के साथ आते हैं। जनता जिसे चुनती है, वह अगले दिन किसी आलीशान रिजॉर्ट में अपनी निष्ठा बेच रहा होता है। यह मतदाता के विवेक की सबसे क्रूर ठगी है।
2. कार्यपालिका (Executive): यहाँ नियम केवल आम आदमी को डराने के लिए हैं। एक ईमानदार नौकरीपेशा नागरिक का एक-एक पैसा टैक्सेबल है, जबकि 'इलेक्टोरल बॉन्ड' और 'गुमनाम इलेक्शन फंड' के जरिए अरबों का लेन-देन 'राष्ट्रवाद' के पर्दे के पीछे गुप्त रहता है।
3. न्यायपालिका (Judiciary): न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी अब निष्पक्षता के लिए नहीं, बल्कि तारीखों की ठगी न देखने के लिए लगती है। रसूखदार के लिए रात को अदालतें खुलती हैं, और गरीब इंसाफ की उम्मीद में अपनी नस्लें खपा देता है।
4. ठग-गुरु मीडिया (The Fourth Estate): यह स्तंभ अब लोकतंत्र को सहारा नहीं दे रहा, बल्कि उसे 'सर्कस' में बदल चुका है। न्यूज़ चैनल अब 'खबर' नहीं, 'भय' और 'भ्रम' बेचते हैं। पेड न्यूज़, फेक न्यूज़ और सत्ता की चाटुकारिता—मीडिया ने पाठकों की चेतना को ठगने में पीएचडी कर ली है। यह 'ठग गुरु' आपको वह दिखाता है जो सत्ता चाहती है, वह नहीं जो जनता भुगत रही है।
# 'चोरों को मोर' और खामोश डर का व्यापार
आज का भारत शायद दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहाँ कोई फर्जी अधिकारी बनकर असली अधिकारियों को ठग लेता है। मजे की बात यह है कि जो ठगे जा रहे हैं, वे शिकायत भी नहीं करते। क्यों? क्योंकि वे खुद 'काले धन' के ढेर पर बैठे हैं। जब नकली ईडी या इंकम टैक्स के अधिकारी किसी व्यापारी के घर छापा मारते हैं, तो वह चुपचाप पैसे दे देता है। यह रहीम का 'सुख' नहीं, बल्कि 'पाप के पकड़े जाने का डर' है। "चोरों को मोर पड़ना" अब हमारी सामाजिक व्यवस्था का नया मुहावरा है।
# तू डाल-डाल, मैं पात-पात: व्यवस्था का दोहरा चरित्र
हमारी सरकार पारदर्शिता की बात करती है, लेकिन चुनावी चंदे का स्रोत नहीं बताना चाहती। "सब चलता है, सब चंगा है" के शोर में बुनियादी सवाल गायब हैं। बैंक छोटे कर्जदारों का गला घोंटते हैं, जबकि बड़े मगरमच्छ बैंक को ही ठगकर विदेश भाग जाते हैं। आम आदमी इंकम टैक्स के दायरे में पिस रहा है, और 'शक्तिशाली' लोग टैक्स-फ्री चंदे की मलाई खा रहे हैं।
सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डालना भी अब 'टूलकिट' का हिस्सा माना जा सकता है। डर इतना है कि अभिव्यक्ति से पहले लोग 'माफीनामा' तैयार रखते हैं। यह डर ही ठगों की सबसे बड़ी सफलता है।
# रहीम के 'सुख' की तलाश
रहीम साहब के अनुसार, ठगने वाले को 'दुख' होना चाहिए था, क्योंकि उसकी आत्मा मलीन होती है। लेकिन आज का ठग 'सफलता का शिखर' चूम रहा है और ठगा जाने वाला व्यक्ति 'डिप्रेशन' का शिकार है। एक समाज के रूप में हम तब तक खुश नहीं रह सकते जब तक हम 'चालाकी' को 'बुद्धिमानी' और 'ईमानदारी' को 'बेवकूफी' मानते रहेंगे।
"आज की कड़वी हकीकत यह है कि यहाँ नीयत में खोट और चेहरे पर मुखौटा ही 'सर्वाइवल' का मंत्र है; जिस देश का 'ठग-तंत्र' इतना मजबूत हो, वहाँ रहीम के दोहे केवल किताबों में अच्छे लगते हैं, हकीकत में तो अब 'ठग-विद्या' ही हमारी राष्ट्रीय पहचान बनती जा रही है।"
