इटावा/जसवंतनगर: बिना वेरिफिकेशन 350 कर्मचारी! सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी की सुरक्षा पर बड़ा सवाल
चीफ एडिटर: एम.एस वर्मा
मनोज कुमार
बिना वेरिफिकेशन 350 कर्मचारी! सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी की सुरक्षा पर बड़ा सवाल
सैफई (इटावा): मानसिक रोग विभाग में भर्ती महिला से दुष्कर्म की सनसनीखेज घटना के बाद अब सफाई व्यवस्था संभाल रही फर्म सन फैसिलिटी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड कठघरे में है। खुलासा हुआ है कि विश्वविद्यालय परिसर में तैनात करीब 350 सफाई कर्मचारियों का पुलिस वेरिफिकेशन तक नहीं कराया गया, जो सीधे-सीधे सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
सितंबर 2022 से फर्म के जरिए सफाई कार्य कराया जा रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर निगरानी लगभग न के बराबर है। हालात यह हैं कि कंपनी का कोई जिम्मेदार अधिकारी नियमित रूप से परिसर में मौजूद नहीं रहता और पूरा सिस्टम सुपरवाइजरों के भरोसे चल रहा है। सूत्र बताते हैं कि कंपनी प्रबंधन की सक्रियता सिर्फ बिल भुगतान तक सीमित रहती है।
👉 सबसे बड़ा सवाल यही है कि संवेदनशील वार्डों में बिना सत्यापन कर्मचारियों की तैनाती कैसे हो रही है? शासन की गाइडलाइन को नजरअंदाज करना क्या किसी बड़ी घटना का इंतजार था?
यह पहला मामला भी नहीं है—
2025 में मोबाइल चोरी कांड में इसी फर्म के कर्मचारी पकड़े गए थे
10 अक्टूबर 2023 को महिला सफाईकर्मी ने सुपरवाइजर पर छेड़छाड़ का मुकदमा दर्ज कराया था
इसके बावजूद न निगरानी सुधरी, न सिस्टम।
विश्वविद्यालय में रोजाना 8-10 जिलों से मरीज पहुंचते हैं। खासकर पीडियाट्रिक्स और गायनी वार्ड जैसे संवेदनशील विभागों में भारी भीड़ रहती है, जहां सुरक्षा की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। ऐसे में बिना वेरिफिकेशन कर्मचारियों की तैनाती को गंभीर लापरवाही माना जा रहा है।
ठेका प्रक्रिया भी सवालों में है। एक साल का अनुबंध लगातार बढ़ाकर करीब 4 साल तक चला दिया गया, जबकि बीच-बीच में टेंडर निरस्त होते रहे। अब नए टेंडर में 25 से ज्यादा फर्में मैदान में हैं।
कुलपति प्रो. अजय सिंह ने ड्रेस कोड और आई-कार्ड अनिवार्य किए, लेकिन सफाई कर्मचारी और वार्ड बॉय पर इसका असर न के बराबर दिख रहा है।
समाजसेवी आशु पांडेय ने साफ कहा— 👉 “बार-बार घटनाएं हो रही हैं, फिर भी फर्म पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं—यह खुद में बड़ा सवाल है।”
वहीं कंपनी के मैनेजर अमित सिंह का तर्क भी सवालों में है। उनका कहना है कि
👉 “पुलिस वेरिफिकेशन शुरू किया गया था, लेकिन कर्मचारियों के विरोध के कारण प्रक्रिया रुक गई।”
अब बड़ा सवाल— क्या विश्वविद्यालय प्रशासन इस लापरवाही पर सख्त कदम उठाएगा?
या फिर व्यवस्था यूं ही जोखिम में चलती रहेगी?
