जब पुराने घाव फिर से खुलते हैं: ट्रॉमा रीएक्टिवेशन को समझना
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
जब पुराने घाव फिर से खुलते हैं: ट्रॉमा रीएक्टिवेशन को समझना
एप्स्टाइन फ़ाइलों के सार्वजनिक होने के बाद अनेक महिलाएँ और युवतियाँ अचानक भीतर से हिल गई हैं। वर्षों पहले जिन घटनाओं को उन्होंने किसी तरह पीछे छोड़ दिया था, वे फिर से सामने आ खड़ी हुई हैं — नामों के साथ, चेहरों के साथ, सत्ता के प्रतीकों के साथ।
* यह कमज़ोरी नहीं है।
* यह मन की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।
मनोविज्ञान में इसे “ट्रॉमा रीएक्टिवेशन” कहा जाता है। जब किसी पुराने शोषण से जुड़े संकेत — व्यक्ति, स्थान, शब्द, सत्ता की छवियाँ — फिर सामने आते हैं, तो मस्तिष्क उन्हें “अतीत” में सुरक्षित रखकर नहीं देख पाता। वह उन्हें वर्तमान की तरह अनुभव करने लगता है। शरीर भी उसी तरह प्रतिक्रिया देता है — दिल की धड़कन तेज़, नींद में व्यवधान, घबराहट, अचानक शर्म या डर का लौट आना। यह यादों की वापसी है, न कि आपकी अस्थिरता।
## आत्मग्लानि क्यों लौटती है?
शोषण की परिस्थितियाँ अक्सर शक्ति के असंतुलन से भरी होती हैं — उम्र, पद, आर्थिक निर्भरता, सामाजिक दबाव। उस समय विरोध करना संभव नहीं होता, या बहुत ख़तरनाक होता है। फिर भी बाद में दिमाग़ पूछता है:
* “मैंने तब क्यों नहीं बोला?”
* “मैं वहाँ क्यों थी?”
* “क्या मैंने कुछ गलत किया?”
ये प्रश्न पीड़िता की गलती नहीं, बल्कि मन का एक रक्षा तंत्र हैं।
जब नियंत्रण छिन जाता है, तो दिमाग़ कभी-कभी “अगर मेरी गलती थी, तो शायद मैं भविष्य में इसे रोक सकती हूँ” जैसी धारणा बना लेता है। असहायता से यह भ्रम कम डरावना लगता है।
लेकिन सच्चाई साफ़ है: "जहाँ सत्ता, भय और निर्भरता का असंतुलन हो, वहाँ सहमति स्वतंत्र नहीं होती।" जिम्मेदारी हमेशा अपराधी की होती है।
## समाज की प्रतिक्रिया और द्वितीयक आघात
जब ऐसी फाइलें खुलती हैं, तो सिर्फ तथ्य सामने नहीं आते — प्रतिक्रियाएँ भी आती हैं।
* कुछ लोग संदेह करते हैं।
* कुछ तुलना करते हैं।
* कुछ पीड़िताओं को फिर से जज करते हैं।
इसे मनोविज्ञान में “द्वितीयक आघात” (Secondary Trauma) कहा जाता है — चोट के बाद समाज से मिलने वाला अतिरिक्त घाव। यह आत्मसम्मान को हिला सकता है, निराशा को गहरा कर सकता है, और कभी-कभी आत्महत्या जैसे विचार भी ला सकता है। यदि ऐसे विचार आएँ, तो यह संकेत है कि दर्द बहुत अधिक हो गया है। यह आपकी कमजोरी नहीं है। यह मदद की ज़रूरत का संकेत है।
## सच का उजागर होना: दर्द और उपचार साथ-साथ
जब अपराध के पैटर्न सार्वजनिक होते हैं, तो कहानी निजी नहीं रहती। वह संरचनात्मक अन्याय बन जाती है। इससे दो बातें होती हैं:
1. जिम्मेदारी स्पष्ट होती है।
2. पीड़िताओं की आवाज़ को संदर्भ और विश्वसनीयता मिलती है।
शुरुआत में यह असहनीय लग सकता है, पर लंबे समय में सच बोझ को सही जगह रखता है — अपराधी पर, न कि पीड़िता पर।
## अगर मन बहुत भारी हो…
अकेले सहना ज़रूरी नहीं है।
* किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना
* ट्रॉमा-इनफॉर्म्ड काउंसलिंग लेना
* पीयर सपोर्ट समूह से जुड़ना
* नियमित श्वास अभ्यास (धीमी, गहरी साँसें)
* शरीर को सुरक्षा के संकेत देना (ग्राउंडिंग तकनीकें, जैसे पैरों का ज़मीन से संपर्क महसूस करना)
ये छोटे कदम मस्तिष्क को वर्तमान में लौटने में मदद करते हैं। यदि कभी विचार खतरनाक दिशा में जाने लगें, तो तुरंत पेशेवर सहायता लें। आपात स्थिति में स्थानीय आपात सेवा से तुरंत जुड़ना जीवनरक्षक हो सकता है।
## अंत में
आप जो महसूस कर रही हैं, उसका कारण है। और वह कारण आपकी गलती नहीं है।
* आप टूटी नहीं हैं।
* आप चोटिल हैं।
* और चोट का उपचार संभव है।
सच सामने आना दर्द को तेज़ कर सकता है, लेकिन वही सच धीरे-धीरे भार को वहाँ रख देता है जहाँ वह होना चाहिए — अपराधी की जिम्मेदारी पर, न कि आपके आत्ममूल्य पर।
आपकी मौजूदगी मायने रखती है। यह दौर स्थायी नहीं है। साहस कभी शोर नहीं करता — वह अक्सर मदद माँगने के रूप में प्रकट होता है।
