पूर्व सेनाध्यक्ष की किताब पर सियासी संग्राम: संसद से सड़क तक ‘फ़ोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ पर टकराव
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
पूर्व सेनाध्यक्ष की किताब पर सियासी संग्राम: संसद से सड़क तक ‘फ़ोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ पर टकराव
नई दिल्ली : पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की आत्मकथा ‘फ़ोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ को लेकर देश की राजनीति में तीखा टकराव उभर आया है। मामला अब केवल एक पुस्तक के प्रकाशन या अप्रकाशन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सरकार, विपक्ष, राष्ट्रीय सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रश्नों से जुड़ गया है।
# संसद में उठा विवाद, सरकार ने कहा—किताब प्रकाशित नहीं
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पिछले सप्ताह सदन परिसर में इस पुस्तक की प्रति दिखाते हुए दावा किया कि पुस्तक में गलवान संघर्ष और चीन के साथ 2020 के तनावपूर्ण हालात से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें दर्ज हैं। उनका आरोप है कि उन्हें सदन में उक्त अंश पढ़ने से रोका गया।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सदन में कहा कि उन्हें जानकारी है कि यह पुस्तक अभी प्रकाशित नहीं हुई है। उन्होंने राहुल गांधी से पुस्तक की प्रति सदन में प्रस्तुत करने को कहा। सरकार का आधिकारिक रुख है कि पुस्तक को रक्षा मंत्रालय की आवश्यक अनुमति प्राप्त नहीं हुई है, इसलिए इसे अप्रकाशित माना जाना चाहिए।
# एफआईआर दर्ज, साइबर जांच शुरू
इस बीच दिल्ली पुलिस ने पुस्तक के कथित टाइपसेटेड पीडीएफ संस्करण के ऑनलाइन प्रसार पर एफआईआर दर्ज की है। पुलिस के अनुसार, सोशल मीडिया और कुछ वेबसाइटों पर पुस्तक की डिजिटल कॉपी उपलब्ध होने की सूचना मिली थी। मामले की जांच स्पेशल सेल/साइबर क्राइम प्रकोष्ठ द्वारा की जा रही है।
प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, पुस्तक का प्रकाशन अधिकार पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के पास है। प्रकाशक ने स्पष्ट किया है कि पुस्तक अब तक औपचारिक रूप से प्रकाशित नहीं हुई है। पुलिस डिजिटल फॉरेंसिक विश्लेषण के जरिए यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि पीडीएफ फाइल का स्रोत क्या है, वह किस आईपी पते से अपलोड हुई और क्या इसके पीछे कोई संगठित तंत्र सक्रिय है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि पुस्तक बिना अधिकृत स्वीकृति के प्रसारित हुई है, तो यह कॉपीराइट उल्लंघन, आधिकारिक गोपनीयता नियमों और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के प्रावधानों के तहत जांच का विषय बन सकता है।
# विवाद की जड़: गलवान और निर्णय प्रक्रिया
राहुल गांधी का कहना है कि पुस्तक में जनरल नरवणे ने 2020 के गलवान संकट के दौरान उच्चस्तरीय बैठकों का उल्लेख किया है। विपक्ष का दावा है कि इसमें चीन की गतिविधियों और निर्णय-प्रक्रिया को लेकर संवेदनशील संकेत हैं। हालांकि पुस्तक का आधिकारिक, स्वीकृत संस्करण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध न होने के कारण इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो पाई है।
जनरल नरवणे दिसंबर 2019 से अप्रैल 2022 तक भारतीय सेना के प्रमुख रहे। उनकी आत्मकथा में कथित तौर पर 40 वर्षों की सैन्य सेवा, भारत-चीन सीमा पर अनुभव, पाकिस्तान के साथ सीज़फायर और अन्य रणनीतिक प्रसंगों का उल्लेख है। पुस्तक लगभग 448 पृष्ठों की बताई जा रही है और पूर्व में ऑनलाइन प्लटफॉर्म्स पर ‘अभी उपलब्ध नहीं’ की स्थिति में सूचीबद्ध थी।
# राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज
राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि सरकार पुस्तक की सामग्री से असहज है और इसी कारण इसे सार्वजनिक होने से रोका जा रहा है। उन्होंने एक पुराने सोशल मीडिया पोस्ट का हवाला देते हुए कहा कि स्वयं जनरल नरवणे ने पुस्तक के प्रकाशन की घोषणा की थी। विपक्ष का सवाल है कि यदि पुस्तक अस्तित्व में नहीं है, तो उसकी प्रतियां और डिजिटल संस्करण कैसे सामने आए।
वहीं सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े किसी भी दस्तावेज या सामग्री का अनधिकृत प्रसार गंभीर विषय है और इसकी जांच आवश्यक है।
# व्यापक संदर्भ: सुरक्षा बनाम पारदर्शिता
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब संसद का बजट सत्र चल रहा है और भारत-चीन संबंध, राष्ट्रीय सुरक्षा तथा विदेश नीति जैसे मुद्दे राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि पूर्व सैन्य अधिकारियों की आत्मकथाओं के प्रकाशन में सामान्यतः रक्षा मंत्रालय की पूर्व स्वीकृति की प्रक्रिया होती है, ताकि संवेदनशील सूचनाएं सार्वजनिक डोमेन में न जाएं।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच में क्या सामने आता है—क्या यह महज कॉपीराइट उल्लंघन का मामला है, प्रशासनिक देरी का परिणाम, या फिर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर लीक।
फिलहाल, ‘फ़ोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि संसद, सरकार और विपक्ष के बीच विश्वास तथा जवाबदेही की परीक्षा का प्रतीक बन चुकी है।
