लोकतंत्र बनाम योग्यता: जनादेश की पवित्रता या शासन की गुणवत्ता?

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


लोकतंत्र बनाम योग्यता: जनादेश की पवित्रता या शासन की गुणवत्ता?

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं है कि यहाँ चुनाव होते हैं, बल्कि यह है कि यहाँ शासन की योग्यता पर प्रश्न उठाना भी लगभग असंवैधानिक अपराध जैसा बना दिया गया है।

जैसे ही कोई न्यूनतम शैक्षिक या नैतिक मानदंड की बात करता है, बहस तुरंत भावनात्मक नारेबाज़ी में बदल जाती है —

* “जनता सर्वोच्च है”, 

* “लोकतंत्र सबको अधिकार देता है”, 

* “योग्यता का पैमाना अभिजात्य षड्यंत्र है”।


परंतु मूल प्रश्न अब भी वहीं खड़ा है:


👉 क्या जनादेश ही पर्याप्त योग्यता है?

👉 क्या शासन चलाने के लिए केवल लोकप्रियता ही पर्याप्त है?


## संविधान क्या कहता है — और क्या नहीं कहता


भारतीय संविधान के अनुच्छेद 84 (सांसद) और अनुच्छेद 173 (विधायक) स्पष्ट करते हैं:


✔ नागरिकता

✔ आयु सीमा

✔ अन्य विधिक अयोग्यताएँ


लेकिन,


❌ कोई शैक्षिक योग्यता नहीं

❌ कोई प्रशासनिक प्रशिक्षण अनिवार्यता नहीं


संविधान निर्माताओं का यह निर्णय ऐतिहासिक रूप से तार्किक था। 1947 का भारत व्यापक निरक्षरता, सामाजिक असमानता और शिक्षा-अभाव से जूझ रहा था। "योग्यता आधारित बाधा लोकतंत्र को अभिजात्य बना सकती थी।"


परंतु समस्या निर्णय में नहीं, उसकी स्थायी व्याख्या में है। संविधान ने शैक्षिक योग्यता को निषिद्ध नहीं किया। उसने उसे अनिवार्य भी नहीं किया।


👉 यानी यह नीति का प्रश्न है, संवैधानिक निषेध का नहीं।


## संविधान की आत्मा बनाम उसकी व्याख्या


भारतीय संवैधानिक विमर्श में एक खतरनाक प्रवृत्ति विकसित हुई है — "जो संविधान में नहीं है, उसे संविधान के विरुद्ध मान लेना।"


लोकतंत्र का मूल सिद्धांत प्रतिनिधित्व है। लेकिन लोकतंत्र का लक्ष्य शासन है।


दोनों में अंतर है।


| प्रतिनिधित्व | शासन |

| --------------- | ------------------ |

| जनसमर्थन आधारित | क्षमता आधारित |

| राजनीतिक वैधता | प्रशासनिक दक्षता |

| अधिकार का स्रोत | निर्णय की गुणवत्ता |


यदि विधायिका का सदस्य कानून पढ़ने, नीति समझने, बजट विश्लेषण करने, विधिक शब्दावली पकड़ने में असमर्थ हो —

तो क्या लोकतंत्र मजबूत होगा या निर्वाचित निर्भरता का शिकार?


## लोकप्रियता का मिथक: लोकतंत्र का सबसे बड़ा छल


लोकप्रियता:


✔ भावनात्मक प्रभाव से मिलती है

✔ पहचान राजनीति से मिलती है

✔ प्रचार तंत्र से मिलती है


योग्यता:


✔ ज्ञान से आती है

✔ प्रशिक्षण से आती है

✔ विश्लेषण क्षमता से आती है


* लोकप्रियता भीड़ बनाती है।

* योग्यता निर्णय बनाती है।


आधुनिक शासन:


* वित्तीय अनुशासन

* विधिक जटिलता

* तकनीकी नीति ढाँचा

* अंतरराष्ट्रीय कूटनीति


इन सबका संचालन केवल भाषण कला से नहीं होता हैं।


## संवैधानिक जोखिम: जब अयोग्यता शक्ति बन जाती है


जब विधायिका में ज्ञान-असंतुलन बढ़ता है:


👉 वास्तविक नीति नौकरशाही लिखती है

👉 विधायिका अनुमोदन मशीन बन जाती है

👉 लोकतंत्र औपचारिक रह जाता है


यह लोकतंत्र का पतन नहीं तो और क्या है?


"निर्वाचित वैधता + प्रशासनिक निर्भरता = संरचनात्मक लोकतांत्रिक कमजोरी"


## सुप्रीम कोर्ट की चेतावनियाँ — जिन्हें अनसुना किया गया


भारतीय न्यायपालिका बार-बार संकेत दे चुकी है:


1. ADR केस (2002)


उम्मीदवारों की शैक्षिक व आपराधिक जानकारी अनिवार्य


👉 क्यों?

क्योंकि मतदाता को सूचित निर्णय का अधिकार है।


2. Lily Thomas केस (2013)

दोषसिद्ध जनप्रतिनिधि की तत्काल अयोग्यता


👉 संदेश स्पष्ट था:

लोकतंत्र अपराध-संरक्षण तंत्र नहीं बन सकता।


3. Criminalization of Politics Observations


न्यायालय ने कई बार चिंता जताई — राजनीति में अपराधीकरण लोकतंत्र की विश्वसनीयता को नष्ट करता है।


## अपराधमुक्त राजनीति — विधिक बनाम नैतिक टकराव


वर्तमान विधिक सिद्धांत:


👉 आरोपित = निर्दोष जब तक दोष सिद्ध न हो

न्याय के लिए आवश्यक।


परंतु लोकतंत्र के लिए?

जब आरोपित व्यक्ति स्वयं कानून बनाने वाली संस्था में बैठता है:


✔ कानून बनाता है

✔ कानून बदलता है

✔ कानून को प्रभावित करता है


यहाँ न्याय सिद्धांत और लोकतांत्रिक नैतिकता में टकराव अनिवार्य है।


## सबसे बड़ा झूठा तर्क: योग्यता = अभिजात्यवाद


यह तर्क सुनने में लोकतांत्रिक लगता है, परंतु विश्लेषण में कमजोर है। योग्यता का अर्थ:


❌ पीएचडी नहीं

❌ उच्च डिग्री नहीं


योग्यता का अर्थ हो सकता है:


✔ न्यूनतम कार्यात्मक शिक्षा

✔ विधायी प्रशिक्षण

✔ संवैधानिक साक्षरता

✔ बजटीय समझ


यह लोकतंत्र को सीमित नहीं करता — यह उसे सक्षम बनाता है।


## वैश्विक परिप्रेक्ष्य: लोकतंत्र और क्षमता


कई लोकतंत्रों में:


✔ राजनीतिक प्रशिक्षण संस्थान

✔ विधायी शोध तंत्र

✔ अनिवार्य ओरिएंटेशन कार्यक्रम


भारत में?


👉 विधायिका अक्सर राजनीतिक अखाड़ा

👉 नीति विमर्श का स्तर गिरता हुआ

👉 तकनीकी बहस का अभाव


## लोकतंत्र का वास्तविक संकट: योग्यता नहीं, जवाबदेही का भय


योग्यता आधारित चर्चा से सबसे अधिक भय किसे?


✔ पहचान राजनीति

✔ वंशवादी ढाँचे

✔ धनबल आधारित चुनाव

✔ संरचनात्मक सत्ता समूह


क्योंकि:


👉 योग्य प्रतिनिधि प्रश्न पूछते हैं

👉 नीति समझते हैं

👉 तर्क की माँग करते हैं

👉 नियंत्रण कठिन होता है


## संवैधानिक रूप से संभावित समाधान


संविधान संशोधन की आवश्यकता नहीं भी हो सकती।

संभव विकल्प:


✅ 1. न्यूनतम कार्यात्मक साक्षरता मानदंड

केवल पढ़ने–समझने की क्षमता

✅ 2. विधायी प्रशिक्षण अनिवार्यता

शपथ से पूर्व संवैधानिक, विधिक, बजटीय ओरिएंटेशन

✅ 3. सतत क्षमता मूल्यांकन

लोकतंत्र में अधिकार स्थायी हो सकता है, योग्यता नहीं

✅ 4. आपराधिक मामलों पर कठोर पारदर्शिता

मतदाता को वास्तविक जोखिम की जानकारी


## लोकतंत्र की गुणवत्ता बनाम लोकतंत्र की संख्या


भारतीय लोकतंत्र अक्सर अपनी विशालता पर गर्व करता है।


परंतु प्रश्न यह है:


👉 क्या लोकतंत्र केवल भागीदारी है?

👉 या प्रभावी शासन भी?


लोकतंत्र का उद्देश्य:


✔ वैधता

✔ स्थिरता

✔ न्याय

✔ दक्षता


यदि दक्षता लगातार गिरती रहे — तो लोकतंत्र का नैतिक आधार कमजोर होता है।


## सबसे असहज सत्य


* लोकतंत्र में अधिकार जन्मसिद्ध हो सकता है।

* शासन में क्षमता नहीं।

* मतदान समान हो सकता है।

* निर्णय क्षमता नहीं।


## प्रतिनिधित्व की पवित्रता या शासन की जिम्मेदारी?


भारतीय लोकतंत्र अब शैशव अवस्था में नहीं है। उसे भावनात्मक नारे नहीं, संस्थागत परिपक्वता चाहिए। जनादेश महत्वपूर्ण है। परंतु शासन केवल जनादेश से नहीं चलता।


"लोकतंत्र की रक्षा केवल चुनाव से नहीं, निर्णय की गुणवत्ता से होती है और निर्णय की गुणवत्ता के लिए योग्यता अपरिहार्य है।"


👉 "लोकतंत्र सबको सत्ता तक पहुँचने का अधिकार देता है —

लेकिन क्या लोकतंत्र को सक्षम शासन का अधिकार नहीं?"