लोकतंत्र की अधूरी शर्त: क्या जनप्रतिनिधित्व बिना योग्यता के पर्याप्त है?
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
लोकतंत्र की अधूरी शर्त: क्या जनप्रतिनिधित्व बिना योग्यता के पर्याप्त है?भारत का लोकतंत्र गर्व का विषय है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक प्रयोग — विविधताओं, असमानताओं और जटिलताओं के बीच संचालित। लेकिन हर परिपक्व व्यवस्था की तरह, भारतीय लोकतंत्र के सामने भी कुछ असहज प्रश्न समय-समय पर खड़े होते हैं। ऐसा ही एक प्रश्न फिर से उभर रहा है — "क्या देश चलाने वालों के लिए न्यूनतम योग्यता आवश्यक नहीं होनी चाहिए?"
यह प्रश्न भावनात्मक नहीं, संरचनात्मक है।
# योग्यता हर जगह, सिवाय विधायिका के
आज भारत में:
* एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के लिए शैक्षिक मानदंड है
* शिक्षक, क्लर्क, पुलिसकर्मी — सबके लिए परीक्षा है
* प्रशासनिक अधिकारी बनने के लिए कठोर चयन प्रक्रिया है
लेकिन,
* विधायक बनने के लिए कोई शैक्षिक अनिवार्यता नहीं
* सांसद बनने के लिए कोई न्यूनतम अकादमिक योग्यता नहीं
यानी, शासन की सबसे निर्णायक संस्था — विधायिका — में प्रवेश के लिए केवल लोकप्रिय समर्थन पर्याप्त है। लोकतंत्र में जनता का समर्थन सर्वोच्च है, इसमें संदेह नहीं। परंतु शासन केवल लोकप्रियता से नहीं चलता — वह ज्ञान, विवेक और संस्थागत समझ से संचालित होता है।
# लोकप्रियता ≠ प्रशासनिक क्षमता
"लोकप्रिय होना एक राजनीतिक गुण है। योग्य होना एक प्रशासनिक आवश्यकता।"
कानून बनाना, बजट समझना, नीति निर्धारण करना — ये कार्य केवल भावनात्मक भाषण या सामाजिक प्रभाव से नहीं निभाए जा सकते। आधुनिक शासन तकनीकी, विधिक और आर्थिक जटिलताओं से भरा है।
यदि जनप्रतिनिधि मूल दस्तावेज पढ़ने, नीति के प्रभाव समझने, विधिक शब्दावली पकड़ने में असमर्थ हो — तो वास्तविक शक्ति कहाँ केंद्रित होगी? स्पष्ट उत्तर है:
👉 नौकरशाही
👉 सलाहकार तंत्र
👉 अनौपचारिक शक्ति संरचनाएँ
और यही लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा जोखिम है — "निर्वाचित वैधता का धीरे-धीरे प्रशासनिक निर्भरता में बदल जाना।"
# संविधान निर्माताओं की विवशता बनाम आज की वास्तविकता
संविधान निर्माताओं ने शैक्षिक योग्यता को शर्त नहीं बनाया — यह उनका दूरदर्शी समावेशी निर्णय था। स्वतंत्रता के समय व्यापक निरक्षरता थी; शिक्षा आधारित बाधा लोकतंत्र को अभिजात्य बना सकती थी। वह निर्णय ऐतिहासिक रूप से उचित था। परंतु प्रश्न यह है:
👉 क्या ऐतिहासिक विवशता को स्थायी सिद्धांत बना देना चाहिए?
आज भारत:
✔ शिक्षा के अवसरों से संपन्न
✔ उच्च शिक्षा संस्थानों से समृद्ध
✔ प्रशिक्षित मानव संसाधन से परिपूर्ण
फिर भी यदि शासन के शीर्ष स्तर पर योग्यता की चर्चा असुविधाजनक मानी जाती है, तो समस्या तर्क में नहीं, राजनीति में है।
# समावेशन बनाम दक्षता — झूठा द्वंद्व
शैक्षिक योग्यता की चर्चा को अक्सर सामाजिक बहिष्कार के भय से खारिज कर दिया जाता है। यह चिंता महत्वपूर्ण है, लेकिन पूर्ण सत्य नहीं। योग्यता का अर्थ केवल डिग्री नहीं होता। समाधान हो सकता है:
✅ न्यूनतम कार्यात्मक साक्षरता
✅ विधायी प्रशिक्षण अनिवार्यता
✅ संवैधानिक एवं बजटीय ओरिएंटेशन
✅ सतत क्षमता निर्माण
लोकतंत्र में अधिकार घटाए बिना क्षमता बढ़ाई जा सकती है।
यह विकल्प मौजूद है, पर चर्चा अनुपस्थित है।
# अपराधमुक्त राजनीति — लोकतंत्र का सबसे बड़ा विरोधाभास
भारतीय राजनीति का दूसरा असहज सत्य:
👉 गंभीर आपराधिक आरोपों वाले जनप्रतिनिधि
वर्तमान विधिक सिद्धांत “निर्दोषता की धारणा” पर आधारित है — जो न्याय का मूल है। परंतु जब आरोपित व्यक्ति स्वयं कानून बनाने वाली संस्था में बैठता है, तब नैतिकता और वैधता के बीच टकराव अनिवार्य हो जाता है। "यह प्रश्न न्यायपालिका बनाम राजनीति का नहीं, लोकतांत्रिक विश्वसनीयता का है।"
# लोकतंत्र की गुणवत्ता पर बहस क्यों वर्जित है?
भारतीय लोकतंत्र में चुनावी भागीदारी पर व्यापक गर्व है। लेकिन शासन की गुणवत्ता पर चर्चा अक्सर राजनीतिक असहजता में दब जाती है। "लोकतंत्र केवल मतदान की संख्या से नहीं, निर्णय की गुणवत्ता से भी मापा जाता है।"
यदि:
✔ नीति निर्माण सतही हो
✔ विधायी बहस तकनीकी रूप से कमजोर हो
✔ कानूनों का मसौदा समझ के बिना पारित हो
तो अंततः कीमत कौन चुकाता है?
👉 जनता
👉 अर्थव्यवस्था
👉 संस्थागत स्थिरता
# लोकतंत्र का अगला चरण
भारत का लोकतंत्र अब बाल्यावस्था में नहीं है। वह परिपक्वता की दहलीज पर है। अब आवश्यक प्रश्न यह नहीं कि “कौन चुना गया?” बल्कि यह है:
👉 “शासन कैसे संचालित हो रहा है?”
👉 “निर्णय क्षमता कितनी सुदृढ़ है?”
लोकतंत्र का विकास स्वाभाविक है। जैसे संस्थाएँ विकसित होती हैं, मानदंड भी विकसित होने चाहिए।
# प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं, सक्षम प्रतिनिधित्व आवश्यक
लोकतंत्र की आत्मा जनता का अधिकार है लेकिन लोकतंत्र की स्थिरता शासन की क्षमता पर निर्भर करती है।
भारत को आज:
✔ समावेशी लोकतंत्र चाहिए
✔ परंतु सक्षम लोकतंत्र भी चाहिए
यह बहस लोकतंत्र के विरुद्ध नहीं — "लोकतंत्र की गुणवत्ता के पक्ष में है।"
क्योंकि अंततः,
"लोकप्रियता शासन नहीं चलाती, निर्णय चलाते हैं और निर्णय के लिए योग्यता अपरिहार्य है।"
