जब स्पीकर सत्ता का प्रवक्ता बन जाए

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


जब स्पीकर सत्ता का प्रवक्ता बन जाए

भारतीय संसद का इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि लोकसभा अध्यक्ष का पद सत्ता के लिए नहीं, संविधान के लिए होता है। यह कुर्सी सरकार की सुविधा नहीं, लोकतंत्र की मर्यादा की प्रहरी होती है। लेकिन पिछले कई वर्षों में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने जिस तरह इस पद की गरिमा को क्षतिग्रस्त किया है, वह केवल पक्षपात नहीं, संवैधानिक अवमानना की श्रेणी में आता है।

ओम बिरला का आचरण यह संकेत देता है कि वे अध्यक्ष नहीं, सत्ता के प्रबंधक बन चुके हैं। संसद में विपक्ष की आवाज़ को बार-बार कुचलना, नेता विपक्ष को बोलने से रोकना, और सदन को सरकार के बचाव-कवच में बदल देना—यह सब किसी एक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि एक निरंतर राजनीतिक व्यवहार है।

इतिहास गवाह है कि जो संवैधानिक पदाधिकारी सत्ता के सामने झुकते हैं, उनका अंत अक्सर अपमानजनक होता है। राज्यसभा में उपराष्ट्रपति–सभापति के रूप में प्रधानमंत्री के प्रति दिखाई गई अति-समर्पित निष्ठा का हश्र देश ने हाल ही में देखा है। पद गया, प्रतिष्ठा गई, और अंततः सार्वजनिक जीवन से निर्वासन जैसा हाल हुआ। सत्ता की चापलूसी कभी सुरक्षा नहीं देती—वह केवल त्याग के लिए तैयार मोहरा बनाती है। अब वही कहानी लोकसभा में दोहराई जा रही है।

# अविश्वास प्रस्ताव: व्यक्ति के खिलाफ नहीं, व्यवस्था के खिलाफ


बजट सत्र के दौरान लगातार हो रहे हंगामे के बीच विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ रूल 94(सी) के तहत अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस सौंपा है। इस नोटिस पर 118 सांसदों के हस्ताक्षर हैं—जबकि आवश्यकता मात्र 50 की थी। यह संख्या बताती है कि मामला व्यक्तिगत नाराज़गी का नहीं, संसदीय असंतोष का विस्फोट है।

राहुल गांधी द्वारा इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर न करने को लेकर भ्रम फैलाने की कोशिशें की जा रही हैं, जबकि संसदीय परंपरा स्पष्ट है। इससे पहले राज्यसभा सभापति के खिलाफ प्रस्ताव के समय नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और सोनिया गांधी ने भी हस्ताक्षर नहीं किए थे। यह मर्यादा है, पलायन नहीं।


यह प्रस्ताव इसलिए लाया गया क्योंकि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान विपक्षी नेताओं—खासकर राहुल गांधी—को बोलने से रोका गया। इसके साथ ही आठ सांसदों के निलंबन का मुद्दा भी इसमें शामिल है। यह सब मिलकर यह दर्शाता है कि लोकसभा अध्यक्ष अब सदन के संरक्षक नहीं, सत्ता के फ़िल्टर बन चुके हैं।


# जब स्पीकर कहे—प्रधानमंत्री को सदन में ख़तरा है


सबसे चौंकाने वाला क्षण वह था जब लोकसभा अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री को सदन में आने से यह कहकर रोक दिया कि उन्हें “ख़तरा” है। यह कथन केवल हास्यास्पद नहीं, संवैधानिक रूप से खतरनाक है। अगर सदन में प्रधानमंत्री सुरक्षित नहीं हैं, तो इसका अर्थ यह है कि—


* या तो सदन अराजक है,

* या अध्यक्ष अपने दायित्व निभाने में अक्षम हैं।


दोनों ही स्थितियों में, ऐसा व्यक्ति अध्यक्ष बने रहने के योग्य नहीं है।


शिवसेना (यूबीटी) सांसद अरविंद सावंत का यह कथन कि “सदन में विपक्ष को बोलने से रोकना लोकतंत्र के मूल पर चोट है,” कोई राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि संवैधानिक चेतावनी है। संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच है। वहां अगर केवल सत्ता बोले और विपक्ष चुप कराया जाए, तो फिर चुनाव मात्र एक औपचारिक कर्मकांड रह जाता है।


# मार्च की बहस और संभावित पतन


जब अविश्वास प्रस्ताव पर बहस होगी, तब ओम बिरला सदन की अध्यक्षता नहीं करेंगे। यह अपने आप में एक ऐतिहासिक क्षण होगा—जब लोकसभा का अध्यक्ष अपने ही आचरण के कारण सदन से अनुपस्थित रहेगा।


भाजपा का बहुमत फिलहाल जेडीयू और तेलुगु देशम पार्टी के सहारे टिका है। राजनीतिक अंकगणित स्थिर नहीं होता। ज़रा सी दरार, ज़रा सी असहमति—और सत्ता का गणित बदल सकता है। भाजपा के भीतर से आ रही सूचनाएँ भी यही संकेत देती हैं कि ओम बिरला की वापसी को लेकर स्वयं शीर्ष नेतृत्व उत्साहित नहीं है।


राजनीति में सबसे असुरक्षित वही होता है जो यह मान बैठता है कि उसकी निष्ठा उसे अछूत बना देगी। इतिहास बताता है—जब सत्ता को अपनी छवि सुधारने के लिए बलि चाहिए होती है, तो वह सबसे पहले अत्यधिक वफ़ादारों को ही चुनती है।



"जो लोकसभा अध्यक्ष सत्ता की ढाल बन जाए, वह अंततः सत्ता की बलि बनता है—और संविधान उसका साक्षी रहता है।"