देश के दोराहे पर स्त्री की हुंकार
लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
देश के दोराहे पर स्त्री की हुंकार
इस समय समूचा देश एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहाँ भारत का वजूद और उसकी अस्मिता सवालों के घेरे में है। कभी आत्मविश्वास से भरा, लोकतांत्रिक मूल्यों पर गर्व करने वाला भारत आज विदेशी ताक़तों के सामने असहज और भीतर से भयग्रस्त दिखाई देता है। यह भय केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और संवैधानिक भी है।
अंदरूनी हालात सांप्रदायिक उन्माद, जातिगत विभाजन और नारी अस्मिता पर लगातार हो रहे हमलों से घिरे हैं। संसद—जो लोकतंत्र की आत्मा मानी जाती है—वहाँ प्रतिपक्ष को बोलने का अवसर नहीं मिलता। बहस की जगह दमन ने ले ली है। तीन महिला सांसदों से सत्ता का भय, लोकसभा में उनके प्रवेश पर रोक, और संवैधानिक पदों की असहज चुप्पी—ये घटनाएँ किसी एक प्रसंग की नहीं, बल्कि लोकतंत्र के ठहराव की गवाही देती हैं।
उधर, बंगाल की मुख्यमंत्री द्वारा संवैधानिक संस्थाओं के दरवाज़े खटखटाना भी सत्ता प्रतिष्ठान को असहज करता है। यह असहजता बताती है कि सवालों से डर बढ़ रहा है।
लेकिन राजनीति के इन गलियारों से बाहर, सड़कों पर एक और दृश्य उभर रहा है—महिलाएँ अब चुप नहीं हैं। नारे लगाती, सवाल करती, सत्ता को घेरती महिलाएँ इस बात का संकेत हैं कि बदलाव की आहट तेज़ हो चुकी है।
उत्तराखंड की अंकिता भंडारी की नृशंस हत्या और उससे जुड़े सत्ता–संरक्षण के आरोपों ने जिस तरह राज्य भर की महिलाओं को आंदोलित किया, वह ‘नए भारत’ की तस्वीर पेश करता है। यदि यही संवेदनशीलता हर यौन हिंसा, हर गुमशुदा बच्ची के मामले में दिखाई दे, तो महिलाओं को कमज़ोर समझने वालों की मुस्कान जल्द ही डर में बदल सकती है।
इतिहास गवाह है कि विश्वविद्यालयों—विशेषकर जेएनयू जैसे परिसरों—में संवाद, बहस और असहमति की संस्कृति ने जनहितैषी आंदोलनों को जन्म दिया। यहीं से स्त्री प्रतिरोध की मुखर आवाज़ भी उभरी। तमाम राजनीतिक हस्तक्षेपों और दबावों के बावजूद यह परंपरा टूटी नहीं है, बल्कि आज अन्य विश्वविद्यालयों तक फैल चुकी है।
यूजीसी से जुड़े विधेयकों के खिलाफ़ देश भर में उठती आवाज़ों में महिला स्वर सबसे स्पष्ट और साहसी है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से लेकर देश के अनेक परिसरों तक छात्राएँ जनगीतों, नारों और आंदोलनों के ज़रिये प्रतिरोध को मज़बूत कर रही हैं। पिछड़े और दलित वर्ग की महिलाएँ भी अब इस पीड़ा को समझ रही हैं—और सड़कों पर हैं।
भारत के राजनीतिक इतिहास में वामपंथी दलों और उनके युवा संगठनों में महिलाओं की निर्णायक भूमिका रही है, जो आज भी जीवित है। लेकिन जब राजनीति और अपराध का गठजोड़, और अपराधियों को मिलता संरक्षण लगातार उजागर हो रहा हो, तब स्वाभाविक है कि हर महिला, हर बच्ची भयभीत हो। यही भय अब संघर्ष में बदल रहा है।
हाल के अंतरराष्ट्रीय खुलासों और वैश्विक सत्ता–संरचनाओं से जुड़े गंभीर आरोपों ने इस चिंता को और गहरा किया है। भारत में भी जब सत्ता, पूंजी और अपराध के रिश्तों की चर्चा होती है, तो ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे नारे खोखले प्रतीत होने लगते हैं।
दिल्ली जैसे महानगरों में गुमशुदा लोगों की सूची में महिलाओं और नाबालिगों की भारी संख्या यह चेतावनी देती है कि बच्चों की सुरक्षा अब केवल सामाजिक नहीं, बल्कि राजनीतिक सवाल बन चुकी है। आशंका स्वाभाविक है—कहीं हम भी संगठित अपराध और यौन शोषण के ऐसे जाल की ओर तो नहीं बढ़ रहे, जिसे सत्ता की मौन स्वीकृति मिली हो।
जब महिला उत्पीड़न के मामलों में आवाज़ उठाने वालों को ही निशाना बनाया जाए, जब बलात्कारियों को संरक्षण और पीड़ितों को चुप कराने की कोशिशें हों, तब यह साफ़ हो जाता है कि संघर्ष टालना अब विकल्प नहीं है।
संविधान ने स्त्रियों को बराबरी का अधिकार दिया है—लेकिन बराबरी से खड़ा होना, सवाल करना, सत्ता को चुनौती देना आज सत्ता को नागवार गुजरता है। इसलिए ज़रूरी है कि इस तंगदिली का संगठित प्रतिरोध हो।
बिल्किस बानो से लेकर महिला पहलवानों और मणिपुर की महिलाओं तक—हर जगह स्त्री के दर्द को नज़रअंदाज़ किया गया। यह इतिहास दर्ज हो चुका है।
आज उत्तराखंड की महिलाएँ हों या विश्वविद्यालयों की छात्राएँ—वे रास्ता दिखा रही हैं। यह देश की आधी आबादी का सवाल है। यदि स्त्री की आज़ादी सुरक्षित नहीं, तो लोकतंत्र केवल एक शब्द बनकर रह जाएगा।
अब समय है ज़ोरदार हुंकार का।
अब समय है ख़ामोशी तोड़ने का।
अब समय है स्त्री–स्वतंत्रता के संघर्ष को ज़िंदा रखने का—क्योंकि इसी में देश का भविष्य सुरक्षित है।
