बराबरी की दोस्ती या दबाव की डील? भारत–अमेरिका व्यापार समझौते का सच

लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 


बराबरी की दोस्ती या दबाव की डील? भारत–अमेरिका व्यापार समझौते का सच

अमेरिका के साथ हुए अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर मोदी सरकार बड़ी कामयाबी के दावे कर रही है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि सरकार एक हारी हुई लड़ाई को जीत की तरह पेश करने की कोशिश कर रही है। 7 फरवरी को केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की प्रेस वार्ता ने इस तथाकथित उपलब्धि की पोल खोल दी। न केवल देशहित से जुड़े कई गंभीर सवाल अनुत्तरित रह गए, बल्कि यह भी साफ हो गया कि सरकार के भीतर ही अब तक इस समझौते को लेकर स्पष्टता का घोर अभाव है।

तीन दिन पहले विदेश मंत्री एस. जयशंकर से जब व्यापार समझौते की स्थिति पूछी गई, तो उन्होंने पत्रकारों को वाणिज्य मंत्री के पास भेज दिया। वहीं, पीयूष गोयल से जब रूस से तेल आयात पर सवाल हुआ, तो उन्होंने विदेश मंत्रालय की ओर इशारा कर दिया। सवाल यह है कि क्या सरकार के मंत्रियों के बीच आपसी संवाद पूरी तरह टूट चुका है, या फिर श्रेय–दायित्व से बचने का यह सुनियोजित खेल है? या इससे भी ज़्यादा चिंताजनक यह कि सरकार को खुद नहीं पता कि समझौते में आख़िर है क्या और नहीं क्या।

पीयूष गोयल ने पहले कहा था कि 3–4 दिनों में भारत–अमेरिका ट्रेड डील हो जाएगी। लेकिन उससे पहले ही अमेरिका के वाणिज्य विभाग ने इसकी घोषणा कर दी। बताया जा रहा है कि उस समय तक भारत सरकार के किसी मंत्रालय के पास इस समझौते के फ्रेमवर्क की पूरी जानकारी नहीं थी। उसके बाद अचानक ट्वीट्स की बाढ़ आ गई—मानो पहले जश्न मनाना ज़रूरी हो, समझना बाद में।


वाणिज्य मंत्री ने बताया कि रत्न–आभूषण, हीरे, दवाइयां, जेनेरिक और फार्मा उत्पाद, स्मार्टफ़ोन तथा कई कृषि उत्पादों को अमेरिका में शून्य शुल्क का लाभ मिलेगा। मसाले, चाय, कॉफी, नारियल उत्पाद, फल–सब्ज़ियाँ और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की लंबी सूची भी गिनाई गई। लेकिन सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि क्या निर्यात होगा, असली सवाल है कि क्या आयात होगा और उसकी कीमत कौन चुकाएगा।


सरकार बार–बार यह सफ़ाई दे रही है कि किसानों को नुकसान नहीं होगा, संवेदनशील वस्तुएँ बाहर रखी गई हैं, जीएम उत्पादों की अनुमति नहीं दी गई है। लेकिन बार–बार सफ़ाई देना खुद इस बात का संकेत है कि कुछ छिपाया जा रहा है। भारतीय किसान पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि अगर उनके हितों के ख़िलाफ़ कोई भी क़दम उठाया गया, तो वे फिर सड़कों पर उतरेंगे। शायद इसी डर से सरकार पहले से ही ‘डैमेज कंट्रोल’ में जुट गई है।


पीयूष गोयल ने रोज़गार का नया सपना भी दिखाया—कहा गया कि वस्त्र, चमड़ा, फुटवियर, खिलौने और रत्न–आभूषण जैसे श्रम–प्रधान क्षेत्रों में तेज़ी आएगी, महिलाओं और युवाओं को रोज़गार मिलेगा। लेकिन यह वही पुराना झुनझुना है जिसे हर बड़ी कॉरपोरेट–केंद्रित डील के साथ बजाया जाता है। हकीकत यह है कि सरकार ने यह नहीं बताया कि अगले पांच वर्षों में अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर के उत्पाद खरीदने के वादे का पैसा कहां से आएगा।


इस समझौते के तहत भारत को अपना आयात लगभग तीन गुना बढ़ाना होगा। आयात शुल्क 40–42 बिलियन डॉलर से बढ़कर लगभग 100 बिलियन डॉलर सालाना तक पहुंच सकता है। कमज़ोर रुपये, बढ़ते कर्ज़ और डगमगाती अर्थव्यवस्था के बीच यह धन कहां से आएगा? यह समझौता बराबरी से कम और दबाव की राजनीति से ज़्यादा लगता है।


कांग्रेस ने ठीक ही कहा है कि दोस्ती बराबरी की होती है। अगर कोई दोस्त पहले रोज़ दो थप्पड़ मारे और बाद में एक थप्पड़ कम कर दे, तो उसे रियायत नहीं कहा जा सकता। 3 प्रतिशत के टैरिफ़ को बढ़ाकर 50 प्रतिशत करना और फिर उसे घटाकर 18 प्रतिशत कर देना—और फिर इसे बड़ी जीत बताना—आख़िर किस तरह की कूटनीति है? जिस 3 प्रतिशत टैरिफ़ ने देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूती दी, क्या उसे भुला दिया गया है?


इसी बीच अमेरिका ने एक और झटका दे दिया। 6 फरवरी को डोनाल्ड ट्रम्प के नए कार्यकारी आदेश के तहत अब भारतीय रिफ़ाइनरियों द्वारा रूसी तेल आयात पर अमेरिकी निगरानी लागू कर दी गई है। यह इस समझौते का सबसे ख़तरनाक पहलू है। सवाल यह है कि भारत ने अपनी ऊर्जा नीति पर विदेशी निगरानी क्यों स्वीकार की?


इस आदेश के बाद भारत ने रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदने का फ़ैसला टाल दिया है। ट्रम्प ने चेतावनी दी है कि यदि भारत दोबारा रूसी तेल आयात करता है, तो 25 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क फिर से लगाया जा सकता है। यानी भारत की संप्रभु नीतियों पर अब अमेरिका की सीधी निगरानी होगी। यह स्थिति औपनिवेशिक दौर की याद दिलाती है—जब अंग्रेज़ अपने हितों के लिए भारत का आर्थिक दोहन करते थे।


विडंबना यह है कि इस सबके बीच प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका से हुई इस डील को “ऐतिहासिक” बताते हुए मलेशिया रवाना हो जाते हैं और वहां से कार में बैठकर राष्ट्रपति अनवर इब्राहिम के साथ तस्वीरें साझा कर दोस्ती की मजबूती का संदेश देते हैं। कार में बैठकर दोस्ती दिखाने का यह खेल वे पुतिन के साथ भी कर चुके हैं। लेकिन अब तस्वीरों से आगे की हकीकत देश साफ़ देख रहा है।


यह डील भारत की मजबूती का नहीं, उसकी मजबूरी का प्रतीक बनती जा रही है। सवाल यह नहीं है कि सरकार क्या कह रही है, सवाल यह है कि सरकार किस कीमत पर यह ‘दोस्ती’ निभा रही है।


"देश जवाब चाहता है—और यह जवाब तस्वीरों और ट्वीट्स से नहीं मिलेगा।"