ट्रेड डील या इतिहास की पुनरावृत्ति? भारत–अमेरिका समझौते के पीछे छुपा औपनिवेशिक पैटर्न

 लखनऊ डेस्क प्रदीप shukla 


ट्रेड डील या इतिहास की पुनरावृत्ति? भारत–अमेरिका समझौते के पीछे छुपा औपनिवेशिक पैटर्न

1605 में जहाँगीर और इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम के दौर से जो कहानी शुरू हुई थी, वह 2025 में भारत–अमेरिका ट्रेड डील तक आ पहुँची है। फर्क सिर्फ़ इतना है कि तब अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी के नाम से आए थे, आज वे “रणनीतिक साझेदारी”, “फ्री ट्रेड” और “वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला” की भाषा बोलते हैं। मंशा तब भी आर्थिक नियंत्रण थी, और आज भी वही है—बस औज़ार बदल गए हैं।

इतिहास बताता है कि अंग्रेज भारत को युद्ध से नहीं, ट्रेड डील से जीत पाए। पहले फैक्ट्रियाँ, फिर गोदाम, फिर सेना, फिर संधियाँ—और अंततः सत्ता। भारत की सबसे बड़ी भूल यह थी कि उसने व्यापार को केवल व्यापार समझा, सत्ता की राजनीति नहीं।

आज भारत–अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते को जिस तरह “ऐतिहासिक उपलब्धि” बताया जा रहा है, उसमें वही पुरानी भूल दोहराई जा रही है।

## तब भी ‘फ्री ट्रेड’, आज भी ‘फ्री ट्रेड’

अंग्रेजों के आने से पहले भारत का व्यापार मुक्त और प्रतिस्पर्धी था। खरीदार कई थे, इसलिए कीमत भारत तय करता था। आज भी भारत एक बड़ा बाज़ार है, लेकिन खरीदारों की संख्या सीमित की जा रही है—और शर्तें बाहर से तय हो रही हैं।

आज के भारत–अमेरिका समझौते में कहा जा रहा है कि भारतीय निर्यातकों को शून्य शुल्क का लाभ मिलेगा। यह वही भाषा है जो कभी अंग्रेज बोलते थे—हम आपके माल को दुनिया तक पहुँचाएंगे। लेकिन सवाल वही पुराना है:

👉 किस कीमत पर?

👉 किस शर्त पर?

👉 किसके नियंत्रण में?

सरकार यह तो बता रही है कि भारत क्या निर्यात करेगा, लेकिन यह नहीं बता रही कि भारत क्या-क्या आयात करने को बाध्य होगा और उसका भुगतान कैसे करेगा। पाँच सौ बिलियन डॉलर के आयात का वादा—कमज़ोर रुपये और बढ़ते कर्ज़ के दौर में—सीधे-सीधे भारत को आर्थिक निर्भरता की ओर धकेलता है।

## सेना की जगह अब निगरानी

अंग्रेजों ने भारतीय सैनिकों को भर्ती किया, फिर उसी सेना को भारतीय राजाओं के खिलाफ़ इस्तेमाल किया। आज बंदूक की जगह निगरानी तंत्र है।

अमेरिका द्वारा रूसी तेल पर भारतीय रिफ़ाइनरियों की निगरानी का आदेश इस डील का सबसे खतरनाक पहलू है। यह व्यापार नहीं, संप्रभुता में हस्तक्षेप है। जिस दिन कोई विदेशी ताक़त यह तय करने लगे कि भारत किससे तेल खरीदेगा और किससे नहीं—उस दिन स्वतंत्र विदेश नीति केवल भाषण बनकर रह जाती है।


यह वही स्थिति है जब अंग्रेज भारतीय राजाओं से कहते थे: “आप सेना क्यों रखें? हम आपकी रक्षा करेंगे।” आज कहा जा रहा है: “आप ऊर्जा नीति क्यों तय करें? हम निगरानी करेंगे।”


## तब कच्चा माल, आज डेटा


औपनिवेशिक दौर में भारत कच्चा माल देता था, मुनाफ़ा बाहर जाता था। आज भारत डेटा देता है, सस्ता श्रम देता है, बाज़ार देता है—और मुनाफ़ा फिर बाहर जाता है।


आज की ट्रेड डील्स में टेक्नोलॉजी, डिजिटल सर्विसेज़ और डेटा का सवाल सबसे बड़ा है। जिस देश की डिजिटल रीढ़ किसी और के हाथ में हो, वह राजनीतिक रूप से स्वतंत्र नहीं रह सकता। यह नई किस्म की गुलामी है—डिजिटल और आर्थिक गुलामी।


## बराबरी की दोस्ती या नियंत्रित साझेदारी?


सरकार इसे दोस्ती बता रही है। लेकिन दोस्ती में शर्तें एकतरफा नहीं होतीं। अगर एक देश दूसरे की ऊर्जा नीति, व्यापार नीति और आयात निर्णयों पर निगरानी रखे—तो वह साझेदारी नहीं, असमान संबंध है।


इतिहास गवाह है—अंग्रेज भी शुरुआत में मित्र थे, साझेदार थे, रक्षक थे। जब तक भारत समझ पाया, तब तक सत्ता हाथ से निकल चुकी थी।


## सबक साफ़ है


भारत को व्यापार से डर नहीं है। भारत को डर होना चाहिए असमान व्यापार से।


अगर ट्रेड डील

—स्थानीय उद्योग कमजोर करे,

—किसानों को आशंकित करे,

—विदेश नीति को बंधक बनाए,

—और आर्थिक निर्णयों पर बाहरी निगरानी स्वीकार करे,


तो वह विकास नहीं, धीमी गुलामी है। पहले गुलामी बंदूक से आई थी। आज गुलामी अनुबंध, निगरानी और बैलेंस शीट से आती है।


"इतिहास चेतावनी दे रहा है—सवाल यह है कि क्या भारत इस बार सुनेगा?"